गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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त्वय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः।
उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः॥ ११॥
तुम अनन्त महासमुद्र हो और तुममें यह विश्व एक नन्हीं-सी तरंग। यह स्वभावसे ही उठे या न उठे, इससे न तो तुम्हारा कोई लाभ है और न हानि॥ ११॥
तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत्।
अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥ १२॥
वत्स! तुम केवल चित्स्वरूप हो। यह जगत् तुमसे भिन्न नहीं है। ऐसी स्थितिमें किसे, कहाँ, क्यों हेय और उपादेयकी कल्पना हो॥ १२॥
एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि।
कुतो जन्म कुतः कर्म कुतोऽहङ्कार एव च॥ १३॥
तुम एक अविनाशी, शान्त एवं निर्मल चिदाकाश हो। तुममें जन्म कहाँ? कर्म कहाँ? और अहंकार ही कहाँ?॥ १३॥
यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे।
किं पृथग्भासते स्वर्णात्कटकाङ्गदनूपुरम्॥ १४॥
जो कुछ तुम देखते हो उस दीखनेवाले पदार्थके रूपमें एकमात्र तुम्हीं प्रतीत हो रहे हो। क्या कड़े, बाजूबन्द और पायजेब स्वर्णसे पृथक् प्रतीत होते हैं?॥ १४॥
अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति सन्त्यज।
सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव॥ १५॥
यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ, इस बँटवारेको छोड़ दो। सब आत्मा ही है—ऐसा निश्चय करके निःसंकल्प और सुखी हो जाओ॥ १५॥
तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः।
त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन॥ १६॥
तुम्हारे निज स्वरूपके अज्ञानसे ही विश्वकी सत्ता है। परमार्थतः