गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- अष्टावक्रगीता * ४९९
चौदहवाँ प्रकरण
आत्मज्ञानी अवधूत पुरुषकी स्थिति
प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाद्भावभावनः ।
निद्रितो बोधित इव क्षीणसंसरणो हि सः ॥ १ ॥
जिसका चित्त स्वभावसे ही शून्य (विषयचिन्तनरहित) है और जो उपेक्षापूर्वक विषयोंमें इस तरह बरत लेता है कि मानो कोई गाढ़ी नींदसे जगाया हुआ पुरुष आलस्यभरे शरीरसे काम कर रहा हो—ऐसा पुरुष संसारसे रहित ही है॥ १॥
क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः ।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा ॥ २ ॥
जब मेरी स्पृहा ही नष्ट हो गयी तब धन क्या, मित्र क्या और मेरे लिये विषयरूप लुटेरे भी क्या? मेरे लिये शास्त्र क्या और विज्ञान भी क्या?॥ २॥
विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे ।
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्ता मुक्तये मम ॥ ३ ॥
साक्षी पुरुषको जो ईश्वर और परमात्मासे अभिन्न है, जान लेनेपर जब बन्ध और मोक्ष दोनोंकी आस्था नष्ट हो गयी, तब मुझे मुक्तिके लिये क्या चिन्ता हो सकती है?॥ ३॥
अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः ।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ ४ ॥
जो भीतरसे तो विकल्पशून्य है और बाहरसे भ्रान्तपुरुषके समान स्वच्छन्द आचरण करता है, उसकी उन-उन अनिर्वचनीय अवस्थाओंको वैसे लोग ही जानते हैं॥ ४॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शान्तिचतुष्टयं नाम चतुर्दशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १४ ॥