गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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* गीता-संग्रह *
पन्द्रहवाँ प्रकरण
मोक्षका मर्म तथा अद्वैत निरूपण
यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान्।
आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति॥ १॥
सात्त्विक-बुद्धिसे सम्पन्न जिज्ञासु पुरुषको जैसे-तैसे थोड़ेमें भी समझा दो तो वह कृतार्थ हो जाता है और इससे हीन पुरुष तो जीवनभर जिज्ञासा करता फिरे तो भी मोहग्रस्त ही रहता है॥ १॥
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः।
एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु॥ २॥
विषयोंका नीरस हो जाना ही मोक्ष है, विषयमें रस आना ही बन्धन है; बस इतना ही तत्त्वज्ञान है। (इसे जानकर) जो इच्छा हो करो॥ २॥
वाग्मिप्राज्ञमहोद्योगं जनं मूकजडालसम्।
करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षुभिः॥ ३॥
यह तत्त्वबोध वक्ताको मूक, प्राज्ञको जड़ और महान् उद्योगीको आलसी बना देता है। इसलिये भोग चाहनेवालोंने इसका परित्याग कर दिया है॥ ३॥
न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान्।
चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर॥ ४॥
न तुम देह हो और न देह तुम्हारा है, न तुम कर्ता हो और न तुम भोक्ता। तुम सदा एकरस चेतन साक्षी हो। निरपेक्ष होकर सुखसे विचरो॥ ४॥
रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन।
निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर॥ ५॥
राग-द्वेष मनके धर्म हैं और यह मन कदापि तुम्हारा नहीं है।