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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

Page 495 of 675

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Page 495

४९४ * गीता-संग्रह *


रहित हो जाता है और उसे अनायास ही शान्ति प्राप्त होती है॥ १॥

ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी।
अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते॥ २॥
ईश्वर ही सबका निर्माता है, दूसरा कोई नहीं। जो ऐसा निश्चय कर लेता है, उसकी सारी आशाएँ भीतर ही गल जाती हैं, वह शान्त हो जाता है और उसकी कहीं भी आसक्ति नहीं होती॥ २॥

आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी।
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वाञ्छति न शोचति॥ ३॥
समयपर आपत्तियाँ और सम्पत्तियाँ दैव (प्रारब्ध)-से होती हैं, ऐसा जो निश्चय कर लेता है, वह सदा तृप्त रहता है। उसकी इन्द्रियाँ सदा स्वस्थ रहती हैं। न तो वह अप्राप्तकी प्राप्तिकी इच्छा करता है और न तो नष्ट वस्तुके लिये शोक ही करता है॥ ३॥

सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी।
साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते॥ ४॥
सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु दैवसे ही होते हैं, जो ऐसा निश्चय कर लेता है, उसकी दृष्टिमें साध्य कुछ नहीं रहता। उसे परिश्रम नहीं होता और कर्म करनेपर भी वह लिप्त नहीं होता॥ ४॥

चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥ ५॥
इस संसारमें चिन्तासे ही दुःख होता है, अन्यथा नहीं। जिसने ऐसा निश्चय कर लिया है, वह चिन्ताहीन साधक सुखी एवं शान्त हो जाता है, उसको कहीं भी स्पृहा नहीं होती॥ ५॥

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी।
कैवल्यमिव सम्प्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्॥ ६॥
न मैं देह हूँ, न देह मेरा है, मैं तो शुद्ध बोधस्वरूप हूँ, जिसको