गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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चित्त किसी भी दृष्टिमें आसक्त नहीं है, तब मोक्ष है॥ ३॥
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा॥ ४॥
जब अहंभावका बाध है, तब मोक्ष है, जब कहीं भी अहंभाव है, तब बन्धन है—ऐसा जानकर अपेक्षासे न तो किसीको पकड़ो और न छोड़ो॥ ४॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां गुरुप्रोक्तं बन्धनमोक्षव्यवस्था-नामाष्टमं प्रकरणं समाप्तम्॥ ८॥
नौवाँ प्रकरण
वासना ही सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंका कारण
कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती॥ १॥
'यह किया और यह नहीं किया'—ये द्वन्द्व कब, किसके शान्त हुए हैं? (कभी किसीके नहीं) ऐसा जानकर निर्वेदसे त्यागपरायण हो जाओ, कोई व्रत मत लो। (दृश्यकी किसी प्रतीतिके प्रति कुछ करने या न करनेका आग्रह मत करो। ज्ञानका फल अनाग्रह है)॥ १॥
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गता॥ २॥
हे तात! कोई बिरला ही धन्य महापुरुष ऐसा होता है, जिसकी लोगोंके रंग-ढंग देखकर जीनेकी, भोगनेकी और जाननेकी इच्छाएँ शान्त हो गयी हैं। (कर्तव्य, प्राप्तव्य, ज्ञातव्य आदि ज्ञानीको नहीं रहते)॥ २॥
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम्।
असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति॥ ३॥
यह सम्पूर्ण जगत् मानसिक, दैविक एवं भौतिक तापसे दूषित तथा अनित्य है। इसमें कुछ सार नहीं है, यह निन्दित एवं त्याज्य