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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 494
  • अष्टावक्रगीता * ४९३

त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा।
अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते॥ ५॥

तुम एक एवं शुद्ध चेतन हो और यह विश्व जड़ तथा असत् है। अविद्या भी कुछ नहीं है। फिर तुम किस वस्तुको जाननेकी इच्छा करते हो?॥ ५॥

राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च।
संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि॥ ६॥

राज्य, पुत्र, स्त्री, शरीर और सुख—इनमें तुम जन्म-जन्म आसक्त रहे हो, परंतु तुम्हारे आसक्त रहनेपर भी ये नष्ट हो गये॥ ६॥

अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा।
एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः॥ ७॥

धन, भोग अथवा पुण्य-कर्म—ये सब अब बहुत हो चुके हैं, बस करो। इस संसारके घोर जंगलमें इन साधनोंसे मनको शान्ति नहीं मिली॥ ७॥

कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।
दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम्॥ ८॥

न जाने कितने जन्मोंतक तुमने शरीर, मन एवं वाणीसे परिश्रम और क्लेशप्रद कर्मोंका अनुष्ठान किया है, अब तो उनसे उपराम हो जाओ॥ ८॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां गुरुप्रोक्तमुपशमाष्टकं नाम दशमं प्रकरणं समाप्तम्॥ १०॥


ग्यारहवाँ प्रकरण

शान्तिप्राप्तिके उपाय

भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी।
निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति॥ १॥

भावसे अभाव और अभावसे भावरूप विकार स्वभावसे ही होते रहते हैं। जो ऐसा निश्चय कर लेता है, वह विकार एवं क्लेशसे