गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* अष्टावक्रगीता * ५०५
विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः।
ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान्॥ ६॥
विरक्त पुरुष विषयमें द्वेष करता है और रागी पुरुष विषयोंके लिये मचलता रहता है, परंतु जो ग्रहण और त्यागके भावसे रहित है, वह तो न विरक्त है और न रागी है॥ ६॥
हेयोपादेयता तावत्संसारविटपाङ्कुरः।
स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम्॥ ७॥
त्याज्य और ग्राह्यका भेद संसाररूप वृक्षका अंकुर है, जबतक अविवेकजन्य स्पृहा जीवित रहती है, तभीतक इसका अस्तित्व रहता है॥ ७॥
प्रवृत्तौ जायते रागो निवृत्तौ द्वेष एव हि।
निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमानेवमेव व्यवस्थितः॥ ८॥
प्रवृत्तिमें राग हो जाता है और निवृत्तिमें द्वेष हो जाता है, परंतु विवेकी पुरुष तो बालकके समान निर्द्वन्द्व होकर यों ही (प्रवृत्ति-निवृत्तिमें समान) रहता है॥ ८॥
हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया।
वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति॥ ९॥
रागी पुरुष दुःखसे छूटनेकी इच्छासे संसारका त्याग करना चाहता है, परंतु वीतराग पुरुष दुःखरहित होनेके कारण संसारमें भी खेदका अनुभव नहीं करता॥ ९॥
यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा।
न च योगी न वा ज्ञानी केवलं दुःखभागसौ॥ १०॥
जिसको अपनी मुक्तिका भी अभिमान है और शरीरमें भी ममता है—वह न तो योगी है न ज्ञानी, केवल दुःखका ही वह हकदार है॥ १०॥