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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 498 of 675

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Page 498
  • अष्टावक्रगीता * ४९७

अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपमें स्थित हूँ॥ ७॥

एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ॥ ८॥

जिसने अभ्यासके द्वारा अपनेको ऐसा बना लिया, वह कृतार्थ हो जाता है। जिसका ऐसा स्वभाव ही है, वह स्वतः कृतार्थ है॥ ८॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामेवमेवाष्टकं नाम द्वादशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १२॥


तेरहवाँ प्रकरण

स्वरूपस्थितिका आनन्द

अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम्।
त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥ १॥

‘आत्माके सिवाय अन्य कोई वस्तु है ही नहीं’—ऐसे बोधसे जो स्वरूपस्थिति प्राप्त होती है, वह केवल कौपीनधारी होनेपर भी दुर्लभ है। इसलिये त्याग-ग्रहणका परित्याग करके मैं मौजमें रहता हूँ॥ १॥

कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्॥ २॥

कहीं तो शरीरको कष्ट होता है और कहीं जिह्वाको तथा कहीं मनको। इसलिये उन सबको छोड़कर मैं अपने स्वरूपमें सुखपूर्वक स्थित हूँ॥ २॥

कृतं किमपि नैव स्यादिति सञ्चिन्त्य तत्त्वतः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे यथासुखम्॥ ३॥

शरीर, अन्तःकरणादिके द्वारा किया हुआ कर्म वस्तुतः कुछ नहीं है, ऐसा निश्चय करके जब जो कर्तव्य सामने आ जाता है, उसे करके मैं मौजमें रहता हूँ॥ ३॥