श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
by महर्षि व्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
बानबेवाँ अध्याय
२६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण-
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बानबेवाँ अध्याय
देवताओंको गणेशजीसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, देवताओं आदिद्वारा गणेशजीकी द्वादश
मूर्तियोंकी स्थापना, गणेशजीके सुमुख आदि द्वादश नामोंके स्मरणका माहात्म्य,
उपासनाखण्डके श्रवणकी महिमा तथा उपासनाखण्डका उपसंहार
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे वे सभी गणेशजीको
प्रणाम करके और उनका स्तवन करके उन गणाध्यक्षसे
पुनः बोले- 'आज हम लोग अत्यन्त धन्य हो गये हैं।
हमारी तपस्या धन्य है, हमारा दान देना धन्य है, हमारा
ज्ञान धन्य है, हमारे द्वारा किये गये यज्ञ-यागादि धन्य
हैं, हमारे पूर्वज धन्य हैं और आज हमारे नेत्र धन्य हो
गये हैं, जिनके द्वारा गजानन भगवान्का दर्शन किया
गया है।' इस प्रकार उन देवों आदिके अमृतरूपी वचनों
तथा उनके द्वारा की गयी स्तुतियोंसे वे द्विरदानन भगवान्
गणेश अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये और उन सुनते हुए
कश्यपपुत्रोंसे गम्भीर वाणीमें बोले - ॥ १-३॥
[हे कश्यपपुत्रो!] आप सब लोगोंने मुझ निर्गुणका
विग्रहके रूपमें जैसा प्रत्यक्ष दर्शन किया है, वैसा स्वरूप
मैंने ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवताओंको भी नहीं
दिखाया है। मैं तुम लोगोंके द्वारा की गयी इस स्तुतिसे
अत्यन्त प्रसन्न हूँ और वर देनेके लिये यहाँ उपस्थित
हुआ हूँ, आप लोगोंको जो-जो भी अभीष्ट हो, उस
सबका आप मुझसे वरण कर लें ॥ ४-५॥
हे मुनीश्वर ! उन भगवान् गणेशके द्वारा इस प्रकार
कहे गये उन कश्यपपुत्रोंमें जिसका जो अभिलषित था,
वह उसने उन गजाननसे माँगा ॥ ६ ॥
मेरे चार मुखोंके द्वारा भी उन वरदानोंका असंख्य
होनेके कारण यथार्थ वर्णन नहीं किया जा सकता। अतः
मैंने संक्षेपमें ही आपको बताया ॥ ७॥
जिन-जिन वरोंको कश्यपपुत्रोंने गणेशजीसे माँगा
था, उन सभीको वे वर उन्होंने प्रदान किये। गणेशजी उन
सभीसे पुनः बोले- 'यह स्तोत्र मुझे अत्यन्त प्रिय है, जो
व्यक्ति तीनों सन्ध्यासमयोंमें इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह
विद्यावान् तथा पुत्रवान् हो जायगा। वह आयु, आरोग्य,
ऐश्वर्य, कीर्तिका विस्तार, विजय एवं अभ्युदयको प्राप्त
करेगा और अपनी सभी अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर
लेगा तथा अन्तमें परम पदको प्राप्त करेगा' ॥ ८-९ ॥
वे गणोंके अधिपति गणेशजी पुनः बोले- 'जो
व्यक्ति तीन दिनोंतक तीनों संध्याकालोंमें इस स्तोत्रका
पाठ करेगा, उसके सभी कार्य सिद्ध हो जायँगे ॥ १०॥
जो आठ दिनोंतक इन आठ श्लोकोंका एक बार
पाठ करेगा और चतुर्थी तिथिको आठ बार इस स्तोत्रको
पढ़ेगा, वह आठों सिद्धियोंको प्राप्त कर लेगा ॥ ११ ॥
जो एक मासतक प्रतिदिन दस बार इस स्तोत्रका
पाठ करेगा, वह राजाके द्वारा बन्धनमें डाले गये
प्राणदण्डके भागी व्यक्तिको उस बन्धनसे मुक्त कर
डालेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १२ ॥
इस स्तोत्रके पाठसे विद्याका अभिलाषी विद्याको
प्राप्त करता है। पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाला पुत्र प्राप्त
करता है, भार्याकी कामनावाला भार्या प्राप्त करता है तथा
धनार्थी व्यक्ति धन प्राप्त करता है। परम श्रद्धा-भक्तिके
साथ भगवान् गणेशजीका ध्यान करते हुए इस स्तोत्रका
प्रतिदिन इक्कीस बार पाठ करनेसे सम्पूर्ण मनोरथोंकी
प्राप्ति होती है।' इस प्रकार कहनेके अनन्तर सम्पूर्ण
जगत्के आधार, सुन्दर मुखवाले वे भगवान् गजानन
सभीके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये ॥ १३-१४१/२॥
तदनन्तर देवताओंने सुन्दर मुखमण्डलवाली एक
मूर्तिका निर्माण किया और उसे रत्ननिर्मित एक विशाल
मन्दिरमें प्रतिष्ठापित किया और अत्यन्त विख्यात उनका
'सुमुख' यह नाम रखा। उस मूर्तिका पूजन करके तथा
उसे प्रणाम करके सभी देवता अपने-अपने स्थानोंके
लिये चले गये। अपने-अपने कर्तव्योंमें तत्पर रहनेवाले
उन सभी मुनियोंने भी [गणेशजीकी एक उत्तम मूर्तिकी
स्थापना करके उसकी] पूजा की और 'एकदन्त' यह
प्रसिद्ध नाम रखा ॥ १५-१७१/२ ॥
गन्धर्वों तथा किन्नरोंने अत्यन्त श्रेष्ठ सुवर्णमय
मन्दिरमें गणेशजीकी एक दूसरी उत्तम प्रतिमा स्थापित
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उ०ख०-अ०१२ ] * देवताओंको गणेशजीसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति * २६९
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की और अनेक प्रकारसे उसकी भलीभाँति पूजा करके
उस मूर्तिका 'कपिल' यह उत्तम नाम रखा। इसी प्रकार
गुह्यकों, चारणों तथा सिद्धोंने गणेशजीकी एक दूसरी
मूर्तिका निर्माण किया और उस श्रेष्ठ मूर्तिकी बहुत बड़े
मन्दिरमें स्थापना की। स्थापना-प्रतिष्ठाके अनन्तर उन्होंने
प्रणाम किया और उसका पूजन किया। उन सभीने
यथार्थ नामवाला उसका 'गजकर्ण' यह प्रसिद्ध नाम
रखा। उसके कृपाप्रसादसे वे सभी विमानपर आरूढ़
होकर देवलोकको गये॥ १८-२१॥
मनुष्योंने 'लम्बोदर' इस नामसे गणेशजीकी मूर्ति
स्थापित की। वन्य जीवों ने एक दूसरी श्रेष्ठ मूर्ति स्थापित
की और 'विकट' इस नामसे उसकी पूजा की। तदनन्तर
वे वनको चले गये। इसी प्रकार पर्वतों तथा वृक्षोंने एक
दूसरी मूर्तिकी स्थापनाकर उसकी पूजा की तथा उसका
'विघ्ननाशन' यह नाम रखकर वे पृथ्वीमें अवस्थित हो
गये। उन गणेशजीकी कृपासे वे पर्वत तथा वृक्ष भी
कीर्तिको प्राप्त हुए॥ २२-२४॥
सभी पक्षियोंने रत्नमयी तथा स्वर्णमयी मूर्तिकी स्थापना
की। उन्होंने उस मूर्तिका 'गणाधिप' यह नाम रखा, तदनन्तर
उस मूर्तिका पूजन किया और उसे प्रणाम किया॥ २५॥
सभी सर्पोंने गणनायक गणेशजीकी एक मूर्ति
स्थापित की और उन्होंने उसका 'धूम्रकेतु' यह प्रसिद्ध
नाम रखा। सभी जलाशयोंने एक शुभ प्रतिमाकी स्थापना
की और उस मूर्तिका 'गणाध्यक्ष' यह नाम रखकर बड़े
ही महोत्सवके साथ उसका पूजन किया॥ २६-२७॥
कृमि तथा कीटादिगणोंने और वनस्पतियों एवं
ओषधियोंने मिलकर गणेशजीकी एक श्रेष्ठ मूर्ति स्थापित
की, जो 'भालचन्द्र' नामसे प्रसिद्ध हुई॥ २८॥
दूसरे सचेतन प्राणियोंने विनायक गणेशजीकी एक
महान् मूर्ति बनाकर रत्ननिर्मित मन्दिरके मध्य उसकी प्रतिष्ठा
की, गणेशजीकी वह मूर्ति 'गजानन' इस नामसे विख्यात
हुई। उस मूर्तिका उन्होंने भक्ति-भावपूर्वक पूजन किया।
वह 'गजानन' नामक गणेश-प्रतिमा सभीकी सभी
अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली है। जिन-जिन सचेतन
प्राणियोंने उस गजानन नामक महामूर्तिका पूजन किया था,
वे अपनी-अपनी जातिमें महान् कीर्तिको प्राप्त हुए। भगवान्
गणेशजीकी कृपासे सभी अपने-अपने कार्यमें दक्ष हुए
तथा अत्यन्त सुखी हो गये॥ २९-३० १/२॥
[ब्रह्माजी बोले-हे व्यासजी!] गणेशजीके प्रत्येक
नामका वर्णन करनेकी सामर्थ्य मुझमें नहीं है। उनके
अनन्त नामोंमेंसे सार-सार ग्रहणकर उनके सहस्रनाम
स्तोत्रकी रचना की गयी है। उन सहस्र नामोंमें भी जो
बारह नाम सारभूत हैं, उनका मैंने निरूपण किया है। हे
ब्रह्मन्! जैसे समुद्र-मन्थनके समय (अनन्त रत्नोंमेंसे)
रत्नसागर समुद्रसे चौदह प्रधान रत्न निकले हैं, वैसे ही
ये बारह नाम हैं। इस प्रकार मैंने संक्षेपमें गणेशजीकी
नाम-महिमा बतलायी, उन्हें विस्तारसे बतलानेमें न तो
(हजार मुखवाले) शेष समर्थ हैं, न भगवान् महादेव
समर्थ हैं, न मैं (ब्रह्मा) समर्थ हूँ और न विष्णु ही समर्थ
हैं तो फिर हे सत्यवतीनन्दन व्यासजी! अन्य इन्द्रादि
देवताओं, मशक आदि प्राणियों, यक्षों तथा राक्षसोंकी
क्या गणना? इसलिये सभी कार्यों [के आरम्भ]-में
भगवान् गजाननका पूजन करना चाहिये॥ ३१-३५॥
जो विघ्नोंका समूल उच्छेद करनेवाले देवाधिदेव
गणेशजीका पूजन नहीं करता है, वह दुरात्मा चाण्डालके
समान दूरसे ही परित्याज्य है॥ ३६॥
मुनि बोले-[हे ब्रह्मन्!] उन बारह नामोंका
आप मुझसे क्रमशः कथन कीजिये। उन नामोंका श्रवण
करने तथा पाठ करनेसे सब कार्य निर्विघ्नतासे सम्पन्न
हो जाते हैं॥ ३७॥
ब्रह्माजी बोले-सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण,
लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशन, गणाधिप, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष,
भालचन्द्र तथा गजानन-इन बारह नामोंका जो विद्यारम्भ,
विवाह, प्रवेश, यात्राप्रस्थान, संग्राम तथा संकटके समय
पाठ करता है अथवा इन्हें सुनता है, तो उसके कार्यमें
कोई विघ्न उपस्थित नहीं होता॥ ३८-४०॥
सभी विघ्न-बाधाओंको शान्त करनेके लिये श्वेत
वस्त्र धारण करनेवाले, चन्द्रमाके समान श्वेत आभावाले,
चार भुजाओंको धारण करनेवाले तथा प्रसन्न मुखमण्डलसे
समन्वित भगवान् गणेशका ध्यान करना चाहिये॥ ४१॥
करोड़ों कन्यादानोंके करनेसे, करोड़ों यज्ञ तथा
व्रत-उपवास करनेसे, विविध प्रकारकी तपस्याओं, सभी
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२७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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तीर्थों तथा पुण्यक्षेत्रोंकी यात्राओंसे, हजार भार (एक | निरूपण कर दिया। उन्होंने भी गणेशजीकी उपासनाके
तौल) सुवर्णका दान करनेसे तथा अन्य करोड़ों प्रकारके | फलका अन्त नहीं पाया और न ही वे गणेशजीकी नाम-
दानोंसे, कृच्छ्र, तप्तकृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायण व्रतोंको | महिमाको पूर्ण रूपसे जान पाये ॥ ५१ १/२ ॥
करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह गणेशजीके इन | भृगुजी बोले-हे राजन्! इस प्रकारसे
बारह नामोंके पाठ करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यके सौवें | गणेशजीकी वह अद्भुत महिमा मैंने आपको बतलायी,
भागके बराबर भी नहीं है ॥ ४२-४३ १/२ ॥ | जिसे प्रसन्न हुए ब्रह्माजीने व्यासजीके समक्ष निरूपित
जो मनुष्य प्रातःकाल उठ करके शौच-स्नान | किया था। हे राजन्! सोमकान्त ! [गणेशपुराणके]
आदिसे निवृत्त हो पवित्र होकर समाहित चित्तसे श्रद्धा- | इस उपासनाखण्डका मैंने वर्णन किया, यदि आपको
भक्तिपूर्वक इन बारह नामोंका पाठ करता है, उस | श्रवण करनेमें श्रद्धा हो तो मैं गणनाथ गणेशजीके
व्यक्तिको कोई भी विघ्न बाधा नहीं पहुँचाते। उसके | अन्य चरितको भी बताऊँगा, जो कि सम्पूर्ण पापोंका
सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं और अन्तमें वह मोक्ष प्राप्त | नाश करनेवाला है ॥ ५२-५४ ॥
करता है ॥ ४४-४५ ॥ | सूतजी बोले-हे शौनक आदि महर्षियो ! इस
उसके दर्शन करनेसे सभी लोग पवित्र हो जाते हैं। | प्रकारसे मैंने विविध कथाओं तथा उनके मध्य आनेवाली
इसलिये हे मुने ! शाक्त समुदायवाले हों, शैव हों या वैष्णव | अवान्तर कथाओंसे समन्वित गणेशजीकी उस उपासनाका
हों—सभी गणेशजीके इन द्वादश नामोंका पाठ करके | वर्णन आपके समक्ष किया, जिसका वर्णन ब्रह्माजीने
अपने सभी कार्योंको करते हैं, तो फिर गणेशजीको अपना | महर्षि वेदव्यासके लिये किया था और उसी पापनाशक
इष्ट माननेवाले गाणेश-सम्प्रदायके लोग ऐसा करें तो | उपासनाका निरूपण महर्षि भृगुने राजा सोमकान्तके
इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है ? ॥ ४६-४७ ॥ | समक्ष किया था ॥ ५५-५६ ॥
हे ब्रह्मन्! इन बारह नामोंमेंसे किसी एक भी | जो व्यक्ति इस श्रेष्ठ गणेशपुराणका श्रवण करता
नामका उच्चारण कार्यके प्रारम्भमें किये बिना कोई भी | है, वह सभी आपत्तियोंसे मुक्त होकर, अनेक भोगोंका
कार्य सिद्ध नहीं होते। इसलिये किसी एक नामका | उपभोग करके, पुत्र-पौत्रादिसे सम्पन्न होकर ज्ञान-
उच्चारण अवश्य करना चाहिये ॥ ४८ ॥ | विज्ञानसे समन्वित हो जाता है और गणेशजीकी कृपासे
जो दुष्ट हैं, नास्तिक हैं, उनके भी जो-जो कार्य | उत्तम मुक्ति प्राप्त करता है। सैकड़ों करोड़ कल्प बीत
सिद्ध होते हैं, [उसमें गणेशानुग्रह ही मुख्य हेतु है], वे | जानेपर भी उसका [इस संसारमें] पुनरागमन नहीं
(नास्तिकादि) भी [वास्तवमें] नाम-महिमाको जाने | होता ॥ ५७-५८ १/२ ॥
बिना ही अर्थात् अज्ञानमें गणेशजीके बीजमन्त्रका उच्चारण | जो व्यक्ति अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक इस गणेश-
करके अपना कार्य करते हैं ॥ ४९ ॥ | पुराणको सुनाता है तथा जो सुनता है—दोनों ही इस
हे मुने ! इस प्रकार मैंने आपके समक्ष गणेशजीकी | पुराणके सुनने-सुनानेसे मिलनेवाले कहे गये फलको
सम्पूर्ण महिमाको अत्यन्त संक्षेपमें बतलाया और उनकी | प्राप्त करते हैं, जिस प्रकार राजा सोमकान्तने अत्यन्त
उपासनाका जो विविध प्रकारका फल है, उसका भी | श्रद्धा-भक्तिपूर्वक इस पुराणको सुननेसे [अभीष्ट] फलको
अपनी बुद्धिके अनुसार निरूपण किया ॥ ५० ॥ | प्राप्त किया था, वैसे ही आप लोग भी सर्ववेत्ता और
भगवान् विष्णुने जितना कहा था, उतनेका मैंने | सुखी हो जायेंगे ॥ ५९-६० ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ब्रह्मा एवं व्यास और भृगु तथा सोमकान्तके संवादमें गजानन नाम-
निरूपण' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणका उपासनाखण्ड पूर्ण हुआ ॥