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ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary

by आचार्य ब्रह्मगुप्त

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DevanagariHindipublished737 pages

About this granth

The Brahmasphuta Siddhanta (ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त) is the great astronomical and mathematical treatise of Brahmagupta (born 598 CE), completed in 628 CE at Bhillamala (modern Bhinmal, Rajasthan) when he was thirty. It holds a special place in the history of mathematics as the first text to treat zero as a number, with rules for adding, subtracting and multiplying with it, and to set out rules for positive and negative quantities. It also gives the formula for the area of a cyclic quadrilateral and the bhavana method for square-nature equations.

Its chapters deal with the mean and true motions of the planets, the three problems of time, place and direction, lunar and solar eclipses, risings and settings, the moon's crescent, planetary and stellar conjunctions, arithmetic and the kuttaka, shadows, the sphere and instruments.

This scan is Volume I of the 1966 edition from the Indian Institute of Astronomical and Sanskrit Research, New Delhi, with the Vasana, Vijnana and Hindi commentaries, prepared by an editorial board led by Acharya Ram Swarup Sharma, with a foreword by Dr. Sampurnanand and an introduction by Dr. Satya Prakash. It has 737 pages.

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( ३०१ )
¹पृष्टो ⁷नेष्टो वेध्यो ज्यामध्यसंस्थाया।²
³द्रष्टृचा ⁴द्रष्टांतरं न ⁶तज्या धनुषि छायोन्नत ज्याया ॥ ११ ॥⁵
⁴ज्यार्द्धे ¹द्रष्टिं ²दृग्ज्यान्नत ⁵जीवा शंकुमन्नतज्या च।⁶
धनुषि ⁷प्रकल्पयोज्यां ⁶यष्ट्युक्तं नाडिकाद्यंता ॥ १२ ॥³
अवलंबनं शलाकां ज्यार्द्धं ⁴यष्टि प्रकल्पवा धनुषि।
²भूम्युच्छ्रायं ⁵बहुशो ⁶यष्ट्युक्तं रानयेत्कर्णैः ॥ १३ ॥⁷

११. (घ) १. धनुषपृष्टेनेष्टौ वेध्यो (ग) धनुष प्रिष्टं नेष्टौवेध्यो for (पृष्टोनेष्टौ वेध्यो)
२. संस्थया (ग) (च) (ङ) for (संस्थाया)
३. दृष्टचा (ग) दृष्टघा (ङ) for (द्रष्टृचा) (वि - पहली पंक्ति का अंतिम पद)
४. इष्टांतरं (ग) (ङ) for (द्रष्टांतरं) ५. ज्यायाः (ङ) for (ज्याया)
(ग) (वि०—इसकी क्रमसंख्या १४ है)
(च) १. धनुषपृष्टे for (पृष्टो) ३. दृष्टघा for (द्रष्टृचा)
६. तद्यां for (तज्या) ५. ज्यायाः for (ज्याया)
(ङ) १. धनुषः पृष्ठे द्रष्ट्रा for (पृष्टो नेष्टो) ७. वेध्या for (वेध्यो)
३. ४. इष्टांतरं for (द्रष्टृचा द्रष्टांतरं) ३. दृष्टचा for (द्रष्टृचा)
१२. (घ) १. दृष्टिं (ग) यष्टि for (द्रष्टिं) २. दृग्ज्या (ग) दृग्ज्यां (ङ) for (दृग्ज्या)
३. नाडिकाद्यन्ता (ग) नाडिकाद्यं च for (नाडिकद्यंता)
(ग) ४. ज्यार्द्ध (ङ) for (ज्यार्द्धे) ५. नतजीवां for (न्नतजीवा)
६. ज्यां च for (ज्याच) ७. प्रकल्प्य for (प्रकल्प)
८. योज्यं for (योज्यां) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या १५ है)
(च) १. दृष्टि for (द्रष्टि) २. दृग्ज्या for (द्रग्ज्या)
५. न्ततजीवाँ for (न्नतजीवा) ६. ज्याव for (ज्याच)
(ङ) १. दृष्टेर् for (द्रष्टिं) ६. यद्युक्तं for (यष्ट्युक्तं)
१३. (घ) १. ज्यार्द्दे for (ज्यार्द्धं)
२. भूम्युच्छ्रायं (ग) भूम्युद्ध्राया for (भूम्युच्छ्रायं)
(ग) २. अवलंबन for (अवलंबनं) ४. प्रकल्प्य (ङ) for (प्रकल्पं)
५. द्वाहुःशो for (बहुशो) ६. येष्ट्युक्तं for (यष्ट्युक्तं)
(वि० - इसकी श्लोक संख्या १६ है)
(च) २. भूम्युद्ध्रायं for (भूम्युच्छ्रायं) ७. करणैः (ङ) for (कर्णैः)
(ङ) २. भूम्युच्छ्राया for (भूम्युच्छ्रायं) ५. ल्लम्बो for (बहुशो)
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( ३०४ )
यष्टि व्यासाद्धं$^४$ तु विवृत्तं भगणांशांकितं$^१$ कृत्वा$^७$ ।
यष्टिकीलप्रोते$^२$ मूले$^५$ पृथग्भगग्रयो$^६$ विद्धे$^३$ ॥ २१ ॥
ताभ्यां$^१$ सूर्यशशांकौ वेध्यावर्ग$^४$स्थितेन सूत्रेण ।
सूत्रज्यायांतरां शायेतेऽर्क$^५$ विभाजिता स्थितयः$^३$ ॥ २२ ॥
सूत्राद्धंगुणा त्रिज्या यष्टिहता$^१$ फलधनुर्द्धिगुणितं$^२$ वा ।
रविचंद्रातरमिष्टव्यासाद्धोल्लित$^३$वृत्तस्य ॥ २३ ॥
मध्यधृतायायष्टे लंबकशंकुप्रवेशनिर्गमने ।
क्रांतिवशात्प्राच्यपरे मत्साद्याम्योत्तरे$^१$ साध्ये ॥ २४ ॥
२१. (घ) १. भगणांशकांकितं (ग) (च) for (भगणांशांकितं)
२. यष्टी (ग) (ङ) (च) for (यष्टि)
३. विद्धे (ग) विधि: (विधेः) for (विद्धे)
(ग) ४. व्यासाद्धू वि (ङ) for (व्यासाद्धात्तुवि)
५. मूल for (मूले) ६. प्रथग्रयो (च) for (पृथग्भगग्रयो)
(वि०—इसकी श्लोकसंख्या २४ है)
(च) ४. भुविवृत्तं for (तुविवृत्तं)
७. क्रत्वा for (कृत्वा) ३. विद्धं for (विद्धे)
(ङ) १. भगणांशकं for (भगणांशांकितं) ६. पृथगग्रयो for (पृथग्भगग्रयो)
३. बंद्धे for (विद्धे)
२२. (घ) १. वाभ्यां for (ताभ्यां)
२. ज्यायंतरांशा (ग) (च) (ङ) for (सूत्रज्यायांतरांशा)
३. स्तितयः (ग) (च) (ङ) for (स्थितयः)
(ग) ४. वग्र (च) (ङ) for (वर्ग) ५. येनेऽर्क for (येतेऽर्क)
(वि०—इसकी श्लोकसंख्या २५ है)
(च) ५. येतेऽर्कं for (येतेऽर्क)
२३. (घ) १. हृता (ग) (ङ) (च) for (हता)
२. द्विगुणितं (ग) (ङ) (च) for (द्धिगुणितं)
३. व्यासाद्धोल्लिखित (ग) (ङ) (च) for (व्यासाद्धोल्लित)
(ग) ४. रविचंद्रांतर (च) for (रविचंद्रातर) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या २६ है)
२४. (घ) १. मत्स्याद्यामोत्तरे (ङ) (ग) मत्स्याद्याम्योत्तरे for (मत्साद्याम्योत्तरे)
(ग) २. (वि०—इसकी श्लोकसंख्या २७ है)
(च) १. मत्स्याद्यामोत्तरे for (मत्साद्यामोत्तरे)

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ं: It has प्र, ोmatra, thenशwithच? Or हwithय? Wait, look at line 14: ४. प्रोज्यपद for (प्रोह्यपद)In line 10:प्रोthenश्च? Wait, श्+चisश्च. Yes, प्रोश्चपदं`!

Let's check line 13:
(च) १. शंकुतलग्नांतर for (शंकुतलनांतर) २. दिशौ for (दिशो)
Wait, does it say (शंकुतलनांतर) or (शंकुतलानांतर)?
It says (शंकुतलनांतर) - without the ा on ला!

Let's check line 14:
३. कृतेः for (कृतेः) ४. प्रोज्यपद for (प्रोह्यपद)
Wait, in line 14, ३. कृतेः for (कृतेः)? Why would it say कृतेः for (कृतेः)?
Wait, in the main text (line 3): कर्णकृतेः!
Wait, in line 14: is it कृतेः or कृतिः?
Look at the first word in line 14:
३. कृतेः? No! The matra is ि: `३. कृति

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( ३०६ )
शंकुप्राच्यपरांतरं शंकुवर्गाद्वधमुदयांतरं याम्ये ।
लब्धगुणं यष्टिगुणं क्रांति ज्यातो रविः प्राग्वत् ॥ २८ ॥
अपसृतिरन्यशलाका गुणशलाक्षांतरेण भक्ता भूः ।
भू स्वशलाका गुणिता गुणिताद्रष्टि विभक्ता ॥ २६ ॥

२८. (घ) १. हृतं (ग) for (गुणं)
(ग) २. प्राच्या for (प्राच्य) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ३१ है)
३. मुदगंतरं यामे for (मुदयांतरं याम्ये)
(च) १. हृतं (ङ) for (गुणं)
(ङ) ३. मुदगंतरं for (मुदयांतरं)
४. लम्बगुणं for (लब्धगुणं)
२६. (घ) १. शलाक्ष्यंतरेण (ग) शलाकांतरेण (ङ) for (शलाक्षांतरेण)
२. 'गुणिता' लुप्त
३. दृष्टि (ग) द्रिष्टि for (द्रष्टि)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ३० है)
(ङ) ६. भूः for (भू)
३. ४. यष्टि विभक्ता गृहाद्यौच्चम् for (गुणिता द्रष्टि विभक्ता)
(ग) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या ३२ है)
४. 'गृहाद्योच्यम्' पंक्ति का अंतिम शब्द । ३. दृष्टि for (द्रष्टि)
५. (वि०—इसकी क्रमसंख्या ३० अंकित है)
४. + 'गृहाद्योच्चं' यह पद पृष्ठ के नीचे अन्य हाथ से लिखा हुआ है ।
दृष्ट्या गुणितापसृति दृष्टि विशेषभाजिता भूमिः ।
भूमिस्व द्रिष्टिभक्ता शलाकाया संगुणोच्छ्रायम् ॥ ३३ ॥
(च) यह अतिरिक्त श्लोक यहां पृष्ठ के निम्नोपांत पर अन्यहस्तसे लिखा हुआ है ।
१. र्दृष्टि for (दृष्टि) २. भूः for (भूमिः)
३. द्रष्टि for (द्रिष्टि)
४. शलाकया (ङ) for (शलाकाया)
५. संगुणोद्धाय (ङ) for (संगुणोच्छ्रायम्)
(वि०—इसकी भी क्रमसंख्या ३० अंकित है)
(ङ) १. र्दृष्टि विशेषेण
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( ३०७ )
लंबनिपातांतरकं लंबौच्यांतरविभक्तमधिकगुणम् ।
भूलँबांतर¹गुणिता लबनिपातांतर²विभक्ता³ ॥ ३० ॥⁴
लब्धोनाद्रक्¹ लम्बोदग्लम्बा² दग्रलंबके हीने ।
अधिकेऽधिको ग्रहोच्चं³ तलाग्रवेध⁴ द्वया⁵ षष्ट्या ॥ ३१ ॥⁶
दृष्टिद्रंक्¹ लंबगुणा विभाजिताद्यः² शलाकया भूमिः ।
सकलशलाका गुणिता³ भूमिहृष्टद्या⁴ हतोच्छायः⁵ ॥ ३२ ॥

३०. (घ) १. भूर्लबांतर for (भूलँबांतर)
२. लंबनिपातांतर for (लंबनिपातांतरकं)
३. विभक्ताः for (विभक्ता)
(वि०—इसकी क्रम संख्या ३१ है)
(ग) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या ३४ है)
(च) १. भूर्लबातर for (भूलँबातर)
४. (वि०—यहां क्रमसंख्या ३१ अंकित है)
३१. (घ) १. लब्धोनाहक् (ग) सशेनो द्रिग् for (लब्धोनाद्रक्)
२. लंबोद्गलंबा (ग) (च) (ङ) for (लंबोदग्लंबा)
३. गृहोच्चं (ग) (च) (ङ) for (ग्रहोच्चं)
४. तल ग्रेवेध (ग) तलाग्रवे बध्यया for (तलाग्रवेध)
५. द्वया यष्ट्या (ग) द्विष्या ॥ ३५ ॥ for (द्वयाषष्ट्या)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ३२ है)
(ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ३५ है)
(च) १. नाहकं for (नाद्रक्) ५. द्वया यष्ट्या for (द्वया षष्ट्या)
६. (वि०— क्रमसंख्या ३२ अंकित है)
(ङ) १. लब्धोनोहग् for (लब्धोनाद्रक्) ४. तलाग्रके for (तलाग्र)
५. विद्ध्या दृष्ट्या for (वेधद्वयाषष्ट्या)
३२. '(घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ३३ है)
१. यष्टियैलग्नंबगुणा (ग) दृष्टिट्रंग्लंबगुणा for (दृष्टिट्रंकलंबगुणो)
२. विभाजिताद्यः (ग) (च) (ङ) for (विभाजिताद्यः)
३. गुणिताः (च) for (गुणिता) ४, भूमिहृष्ट्या (ङ) for (भूमिहृष्टद्या)
५. हतोच्छ्रायः (ग) (च) (ङ) for (हतोच्छायः)
(ग) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या ३६ है)
(च) १. द्रष्टिद्रक् for (दृष्टिद्रंक्) ६. (वि०—यहाँ क्रमसंख्या ३३ अंकित है)
(ङ) १. दृष्टिट्रंग्लम्ब for (दृष्टिट्रंकलम्ब)
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( ३०८ )
मित्वाग्रै$^१$हैकदेशे$^६$ विद्धे$^७$ष्टं शलाकया न्या$^८$सर्वम् ।
प्रथमशलका$^२$भक्तं मीत$^३$ द्वितीया$^४$ गुणितमौच्यम्$^५$ ॥ ३३ ॥
षष्ट्याहूता$^१$ शलाका त्रिज्याघात$^२$ धनु गृहांतर्कं$^३$ ।
यैरूक्तं$^४$ मूर्खस्ते यतो न द्रष्टघंतरं$^५$ द्रग्ज्या$^६$ ॥ ३४ ॥
मूलेद्वं$^१$गुलविपुलः$^५$ शुच्यग्रो$^२$ द्वादशांगुलोच्छ्रायः$^८$ ।
शंकुतलाग्र$^३$विद्धोग्रवेध$^६$ लम्बा$^७$द्धार्यः$^४$ ॥ ३५ ॥

३३. (घ) १. गृहैक (ग) (च) (ङ) for (ग्रहैक) (वि०-इसकी क्रमसंख्या ३४ है)
२. शलाका (ग) शिलाका for (शलका)
३. मिति (ग) मितं (ङ) for (मीत
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( ३०६ )
छायांहृज्ज्या यष्टिश्छायाकर्णं मवलम्बकम् शंकुं ।
परिकल्प्यां शंकु यन्त्रे योज्यं घटिकादिषुष्टद्युक्तम् ॥ ३६ ॥
घटिकाकलशार्द्धं कृतिताम्र पात्रं तले गुरुच्छिद्रम् ।
मध्येतज्जलमज्जन षष्टचा द्युन्निशं यथा भवति ॥ ३७ ॥
मध्याध्व्यस्तनतांशैः कपालकं दिवकत्थ सूत्रात् मग्रात् ।
व्यस्तोन्नतांशा विवरे सूत्र क्या पाततो नाड्यः ॥ ३८ ॥
३६. (घ) (वि०--इसकी क्रम संख्या ३७ है)
१. छायाकर्णं (ग) (च) (ङ) for (छायाकर्ण)
२. परिकल्प्या (ग) परिकल्प्य (ङ) for (परिकल्प्यां)
३. घटिकादि पुष्टद्युक्तम् (ग) घटिकादि यद्युक्तम् for (घटिकादि पुष्टद्युक्तम्)
(ग) ४. हृज्ज्यां (ङ) for (हृज्ज्या) (वि०--इसकी श्लोकसंख्या ४० है)
(च) २. परिकल्प्य शंकु for (परिकल्प्यांशंकु)
३. घटिकादिसंयुक्तम् for (घटिकादिषु पृद्युक्तम्)
(वि०--क्रमसंख्या ३७ अंकित है) (ङ) ५. दृष्टि for (यष्टि)
३७. (घ) (वि०--इसकी क्रमसंख्या ३८ है)
१. कलशार्द्धाकृति (ग) कलाशताद्धा for (कलशार्द्धं)
(ग) २. कृतिताम्रं for (कृतिताम्रं) ३. पृथु for (गुरु)
४. मज्ञान for (मज्जन) (वि०--इसकी श्लोकसंख्या ४१ है)
(च) २. कृतिताम्रं (ङ) for (कृतिताम्रं)
(वि०--इसकी क्रमसंख्या ३८ अंकित है) (ङ) कलसार्धा for (कलशार्द्धं)
३. पृथुच्छिद्रम् for (गुरुच्छिद्रम्)
३८. (घ) (वि०--इसकी क्रमसंख्या ३६ है)
१. द्वस्त (ग) मध्यद्वस्तनतांशै for (मध्यस्तनतांशैः)
२. दिवक्स्थ (ग) दिवस्थ (ङ) for (दिवकत्थ)
३. सूत्रमग्राग्रात् (ग) मूत्रमग्रात् for (सूत्रात्मग्रात्)
(ग) (वि०--इसकी श्लोकसंख्या ४२ है)
४. व्यस्तोन्नत्यंश for (व्यस्तोन्नतांशा) (च) १. द्वस्त for (ध्यस्त)
२. दिकस्थ for (दिवकत्थ) ३. सूत्रमग्राग्रात् for (सूत्रात्मग्रात्)
४. व्यस्तोन्नतांश for (व्यस्तोन्नतांशा) ५. विववरे for (विवरे)
६. (वि०--क्रमसंख्या ३६ for (३८)
(ङ) १. मध्याद्यस्त्वनतांशैः for (मध्याध्यस्तनतांशैः)
३. सूत्रमध्याग्रात् for (सूत्रात्मग्रात्) ४. व्यस्तोन्नतांश for (व्यस्तोन्नतांशा)

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( ३१० )
अथवा कपालके नाडिकोदिसर्वं धनुष्फक्तं कर्त्तरि यंत्रम् ।
स्थुलं कृतं यतोन्येर्वदामि ततः ॥ ३६ ॥
दिक्स्थितफलकद्वियुतिस्तले तदग्रस्थ सूत्रयोर्मध्ये ।
कीलस्तत्छायाग्रात् कर्त्तर्यानाडिका स्थूलाः ॥ ४० ॥
दृष्टोच्यं समपीठ यष्टि व्यासाद्धैर्मंकितं परिधौ ।
दिग्भगणांशे मूर्द्धन्यग्रा घटिकादि यष्टद्युक्तम् ॥ ४१ ॥
नलकोमूले विद्धस्तच्छ्रूति घटिकोद्भूत समुच्छ्रायः ।
लब्धांगुलैस्तुतैर्नाडिका क्रियायंत्रसिद्धिरतः ॥ ४२ ॥

३६. (घ) १. स्थूलं (ग) (ङ) for (स्थुलं) (वि० - इसकी क्रमसंख्या ४० है)
(ग) २. नाडिकादिकं सर्वम् for (नाडिकादिसर्वं)
३. या धनुयुक्तं for (धनुष्फक्तं) ४. पत्रम् for (यंत्रम्)
(वि०- इसकी श्लोकसंख्या ४३ है) (च) १. स्थूलं for (स्थुलं)
५. (वि०- क्रमसंख्या अंकित है)
(ङ) ३. यया धनुयुक्तं for (धनुष्फक्तं)
४. 'कर्त्तरियंत्रम्' दूसरी पंक्ति का आरम्भिकपद ।
४०. (घ) १. स्वछायाग्रा for (स्तच्छायाग्रात्) (वि०--इसकी क्रमसंख्या ४१ है)
२. कर्त्तर्या (ग) for (कर्त्तया) ३. नाडिकाः for (नाडिका)
(ग) (वि०- इसकी श्लोक संख्या ४१ है)
(च) २. कर्त्तर्यानाडिकाः for (कर्त्तयानाडिका) (वि० - इसकी क्रमसंख्या ४१ है)
(वि०-इसकी क्रमसंख्या ४१ है)
(ङ) २. कर्त्तयां for (कर्त्तया)
४१. (घ) (वि०-इसकी संख्याक्रम ४२ है)
१. दृष्टोच्यसमं (ग) दृष्टोच्यं (ङ) for (दृष्टौच्यं)
२. पीठं (ग) (ङ) for (पीठ) (ग) ३. ष्युक्तम् for (यष्टद्युक्तम्)
(च) १. दृष्टोच्यं समं for (दृष्टोच्यं सम) २. पीठं for (पीठ)
४. मूर्द्धन्यप्रा for (मूर्द्धन्यग्रा) (वि०-इसकी क्रम संख्या ४२ है)
(ङ) ५ मन्तिकं for (मंकितं) ३. रुक्तम् for (यष्टद्युक्तम्)
४२. (घ) (वि०-इसकी क्रमसंख्या ४३ है)
१. विद्धस्त (ग) विद्धस्तच्छ्रुति for (विद्धस्तच्छ्रूति) २. स्रुति for (छ्रूति)
३. दृतस्तदुद्ध्रायः for (समुच्छ्राय) (ग) ४. घटिकोद्धतः (ङ) for(घटिकोद्भूत)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या ४६ है) (च) (वि०-श्लोक संख्या ४३ है)
(ङ) १. तवूस्रुति for (तच्छ्रूति)
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( ३११ )
घटिकांगुलांतरस्थे वार्यांगुटके घंटीधूतैरन्यः ।
उपरिनरोतः सुषिरस्तिर्यक् कीलोस्य मुखमध्ये ॥ ४३ ॥
कीलो परिगामिन्यां वीर्याबद्धं सपारतमलांबु ।
स्त्रवति जलोत्क्षिपति नरो गुटिकां कुर्मोद्यश्चैवम् ॥ ४४ ॥
जलपूर्णकृतघटीभिस्तनस्य कर्णादिभिर्जलं श्रिपति ।
पुरुषोन्यर्द्धो सत्वं चक्रचतुष्कस्य कृतमुपरि ॥ ४५ ॥

४३. (घ) (वि०— इसकी क्रमसंख्या ४४ है)
१. वीर्यांगुटके (ग) वीर्यांगुडकं for (वार्यांगुटके)
२. घंटीधृतीरन्यः for (घंटीधूतैरन्यः) ३. उपरितनरांत for (उपरिनरोतः)
(ग) ४. सुषिरस्तिर्यक् (ङ) for (सुषिरस्तिर्यक्)
(वि०— इसकी श्लोक संख्या ४७ है)
(च) १. वीर्या for (वार्या)
(वि०— इसकी श्लोकसंख्या ४४ है)
(ङ) १. वीर्याङ्गुलकै for (वार्यांगुटकै)
३. नरोतः for (नरोनः)
४४. (घ) ((वि०— इसकी क्रमसंख्या ४५ है) १. चौर्यार्बद्धं for (वीर्याबद्धं)
२. लाबु for (लांबु) ३. स्रवति (ग) (च) (ङ) for (स्त्रवति)
४. जले (ग) (च) (ङ) for (जलो)
५. कूर्मादयश्चैवम् (ग) कूर्मादयाश्चैवम् ॥४८॥ for (कुर्मोद्यश्चैवम्)
(वि०— इसकी श्लोक संख्या ४८ है)
(च) २. लाबु for (लांबु)
५. कूर्मादयश्चैवं for (कुर्मोद्यश्चैवम्)
(ङ) १. चीर्यांधं for (वीर्याबद्धं)
२. लाबुतु for (लांबु) ६. द्वपारदम् for (सपारतम)
४५. (घ) (वि०— इसकी क्रमसंख्या ४६ है)
१. स्तनास्य (ग) (ङ) for (स्तनस्य)
२. पुरुषोऽन्यद्वासत्वं (ग) पुरुषोन्द्यर्द्धासित्व for (पुरुषोन्यर्द्धोसत्वं)
(ग) ३. क्षिपितम् for (श्रिपति) ४. अनमुपरि ॥४६॥ for (कृतमुपरि ॥४५॥)
(वि— इसकी श्लोक संख्या ४६ है)
(च) ३. क्षिपति for (श्रिपति)
२. ऽन्यर्द्धा for (न्यर्द्धो) क्रमसंख्या ४६ है ।
(ङ) ३. क्षिपति for (श्रिपति) २. पुरुषोऽन्यर्धासक्तं for (पुरुषोन्यर्द्धोसत्वं)
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( ३१२ )
एवं वफवरं नाडिकांगुलैः संस्थितेऽन्तरे योज्यम् ।
युद्धानि मल्लगज महिषमेष विविधायुधनुतां च ॥ ४६ ॥
निगिरति च घटिकां गुलांकितै गंडिकै मंयुरोऽर्ही ।
वीर्यांभ्रू मेवं गुडकैरूपरिस्थै ब्रह्मचर्याद्यैः ॥ ४७ ॥
कालोक्षपाप्तिहितः पटहः शब्दकरोति घंटा वा ।
एवं यन्त्र सहस्राण्यनेन बीजेन कार्याणि ॥ ४८ ॥
४६. (घ) १. वधूवरं (ग) (ङ) for (वफवरं) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ४७ है ।)
(ग) २. संयुतं for (संस्थिते) ३. चरे (वरे) for (ऽन्तरे)
४. विवधायुधभृतां च ॥५०॥ (ङ) for (विविधायुधनुतां च)
(वि०— इसकी श्लोक संख्या ५० है)
(च) १. एवं च वरं for (एवं वफवरं)
४. विविधाधुधभृतां च for (विविधायुधनुतां च) (वि०—श्लोक संख्या ४७ है)
(छ) २. संयुता for (संस्थिते) ३. वरे योज्या for (ऽन्तरे योज्यम्)
४७. (घ) (वि०— इसकी क्रमसंख्या ४८ है)
१. निगिरति गिरति च (ग) निगिरति गिरति for (निगिरति)
२. गंडकैर्मयूरोऽहिम् (ग) खंडकै for (गंडिकै)
३. वीर्यामिवं (ग) for (वीर्यांभ्रू मेवं)
४. ब्रह्मचर्याद्यैः (ग) ब्रह्मचार्याद्यैः ॥५१॥ (ङ) for (ब्रह्मचर्याद्यैः)
(ग) ५. गुलांकितैः for (गुलांकितै) ६. मयूरोहिम् for (मंयुरोऽहीम्)
(वि०—इस की श्लोक संख्या ५१ है)
(च) २. गंडकै for (गंडिकै) ६. मयूरोऽर्हि for (मंयुरोऽर्ही)
३. वीर्यामिवं for (वीर्यांभुमेवं) ४. ब्रह्मचर्याद्यैः for (ब्रह्मचर्याद्यैः)
(वि०—श्लोक संख्या ४८ है) (ङ) २. खण्डकैर for (गंडिकै)
६. मयूरोऽर्हिम् for (मंयुरोऽर्ही) ३. चीर्यामिव for (वीर्यांभ्रू मेवं)
४८. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ४६ है)
१. कालोक्षपाप्तिहितः (ग) कीलीतक्षेपाभिहतः for (कालोक्षपाप्तिहतः)
२. यंत्रसहस्राण्यनेन (च) (ग) for (यंत्र सहस्राण्यनेन)
३. शब्दं (च) (ङ) for (शब्द)
४. 'वा' पद लुप्त है (वि०—इसकी श्लोकसंख्या ५२ है)
(च) १. कालोक्षेपाभिहतः for (कालोक्षपाप्तिहितः)
(वि०—इसकी श्लोकसंख्या ४६ है)
(ङ) १. कीलोत्क्षेपाभिहतः for (कालोक्षपाप्तिहितः)

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( ३१३ )
लघुदारूमयं^१ चक्रं^५ सम^६शुषिरांतरं^२ पृथगराणाम् ।
अर्धं^७ पारदपूर्णां^३ मध्ये^८ सुल्लिष्ट^४ कृतसंध्यौ^१ ॥ ४६ ॥
तिर्यक् कीलोमध्येध्व्याधारस्थो^१ स्य^२पारदे^५ ब्रजति^६ ।
छिद्रान्यद्वै^३ चक्रकर्मजंभ्रमे^७ ^४ वांबरे^८ भ्रमति^५ ॥ ५० ॥

४६. (घ) (वि० — इसकी क्रमसंख्या ५० है)
१. लघुदारमयं for (लघुदारूमयं)
२. शुषिरांतरां for (शुषिरांतरं)
३. पारतंपूर्णं (ग) परेतपूर्णं for (पारदपूर्णां)
४. सुश्लिष्ट (ग) संश्लिष्ट for (सुल्लिष्ट)
(ग) ५. चत्र for (चक्र)
६. दाम for (सम) ७. अर्द्धं for (अर्धं)
८. परिधौ for (मध्ये) १. कृतं
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( ३१४ )
छिद्रे स्वधिया⁵ क्षेप्यं¹ समं तथा⁶ पारदं² यदा³ भ्रमति ।
कालसममिष्टमानैश्चक्रकमुतान⁴मूर्द्धं वा ॥ ५१ ॥
कीलस्योपरि¹गमिभिन तिर्यक्³ सूत्रके धूतमलाषु² ।
प्राग्वन्नलके प्रक्षिप्य नाडिका श्रवति⁴ पानीये ॥ ५२ ॥

५१. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५२ है)
\t१. ष्येप्यं for (क्षेप्यं) (ग) 'क्षेप्यं' लुप्त है ।
\t२. पारतं (ग) (च) for (पारदं)
\t३. यथा (ग) (च) for (यदा)
\tमुत्तान (ग) (च) for (कमुतान)
(ग) ५. स्वधियां समं for (स्वधिया क्षेप्यं)
\t(वि०—इसकी श्लोक संख्या ५५ है)
(च) १. ष्येप्यम् for (क्षेप्यम्)
\t(वि०—श्लोक संख्या ५२ अंकित है)
(ङ) १. क्षिप्त्वा for (क्षेप्यं)
\t३. 'यदा' लुप्त ।
\t६. यथा (for) तथा
\t४. समुत्तान for (कमुतान)
\t७. मूर्ध्वं वा for (मूर्द्धं वा)
५२. (घ) (वि०—इसकी क्रम संख्या ५३ है)
\t१. गामिनि न (ग) गामिनितत्पर्यय for (गमिभिन)
\t२. मलाबु (ङ) मलाबु for (मलाषु)
(ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ५६ है)
(च) १. परिगामिनि (ङ) for (परिगमिभिन)
\t(वि०—श्लोक संख्या ५३ अंकित है)
(ङ) ३. तत्पर्य for (तिर्यक्)
\t४. स्रवति for (श्रवति)
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( ३१५ )
⁶कर्णौज्या क्षिप्रच⁴लनमेव¹ शर⁷मोक्षशं²स्वशबाश्च ।
अध्यायो द्वाविंशो यन्त्रेष्वार्या⁵स्त्रिपंचाशत् ॥ ५३ ॥
³इत्ति ब्रह्मगुप्ते यंत्राध्यायः (२२ वां अध्याय समाप्तः)
द्वाविंशः समाप्तः

५३. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५४ अंकित है)
१. मेवं (ग) (च) (ङ) for (मेव) २. शंखशब्दाश्च (ग) for (शंस्वशबाश्च)
३. इति ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते यन्त्राध्यायो द्वाविंशतितमः (ग) for (इति श्री ब्रह्म-
सिद्धांते यन्त्राध्यायो द्वाविंशः)
(ग) ४. चालन for (चलन) ५. सप्त for (स्त्रि)
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ५६ है)
(च) २. शंखशब्दाश्च for (शंस्वशबाश्च)
(वि०—इसकी श्लोकसंख्या ५४ अंकित है)
३. इति ब्राह्मस्फुटसिद्धांते यंत्राध्यायो द्वाविंशितितमः for (इत्ति ब्रह्मगुप्ते
यंत्राध्यायः (२२ अध्यायसमाप्तः)
(ङ) ६. करणौज्या for (कर्णौज्या) २. खशब्दाश्च for (स्वशबाश्च)
७. शरमोक्षणं for (शरमोक्षं)
३. इति ब्राह्मस्फुट सिद्धान्ते यन्त्राध्यायो नाम द्वाविंशोऽध्यायः for (इत्ति ब्रह्म-
गुप्ते यन्त्राध्यायः)
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( ३१६ )
अथ मानाध्यायो नाम
त्रयोविंशः
सौरेणाब्दं¹ मासतिथयश्चांद्रे²ण सावनैर्दिवसाः⁵ ।
दिनमासाब्द पमध्यानत³ दिनाकेंदु⁴ मानाभ्याम् ॥ १ ॥
मानाति⁵ सौरचंद्राक्षै¹सावनानि ग्रहानयनमेभिः ।
मानेन² पृथक्चत्रुभि⁴व्यंवहारोत्र³ लोकस्य ॥ २ ॥
युगववर्ष¹ विषुवदयनत्वहर्निशोवृ²द्धिहानयः³ ।
सौरान्तिथि⁴ करणाधिकमासोन रात्रपर्वक्रियाश्चांद्रात् ॥ ३ ॥
यसस्य¹ वन² प्रमाण ग्रहगतफ्पवास सूतक चिकित्साः ।
सावन मानात् ज्ञेया³ प्रायश्चित्त⁴ क्रियाश्चान्या⁵ ॥ ४ ॥
१. (घ) १. सौरेणाब्दा (ग) सौरेणाब्दा (ङ) for (सौरेणाब्दं)
२. मासास्तिथय (ग) (ङ) for (मासतिथय)
(ग) ३. मप for (पम) ४. तद्दिनाकेंदु for (तद्दिनाकेंदु)
(च) १. सौरेणाब्दा for (सौरेणाब्द)
२. मासास्तिथयश्चांद्रेण for (मासतिथयश्चांद्रेण) ५. दिवसा for (दिवसाः)
२. (घ) १. चान्द्राक्षं (ग) चन्द्राक्ष for (चन्द्राक्षं)
२. मानैः (ग) च) (ङ) for (मानेन)
३. व्यवहारोऽत्र (ग) संव्यवहाराश्च for (व्यंवहारोत्र)
(ग) ४. पृथक् चतुभिः (ङ) for (पृथक्चत्रुभि)
(च) १. चान्द्राक्षं for (चन्द्राक्षं) ४. पृथक्चतुर्भि for (प्रथक्चतुभि)
(ङ) ५. मानानि for (मानाति) ३. संव्यवहारोऽत्र for (व्यंवहारोऽत्र)
३. (घ) १. युगवर्षे (ग) युगं वर्ष for (युगववर्ष) २. र्नशो for (र्निशो)
३. हानियः for (हानयः)
(ग) ४. सौरानतिथि for (सौरान्तिथि)
(च) १. युगवर्षं (घ) for (युगववर्षं) ५. विषुवदय for (विषुवदय)
२. नस्त्वंहर्निशो (ङ) for (नत्वहर्निशो)
४. (घ) १. यज्ञसवन (ग) for (यसस्य वन)
ग्रहत्युपवास (ग) ग्रहगत्युरुवास for (ग्रहगतफ्पवास) ३. ज्ञेयाः (ग) for (शेया)
(ग) ४. प्रायश्चि for (प्रायश्चित्त) ५. चान्याः ॥ ४ ॥ for (चान्या)
(च) १. यज्ञस्य for (यसस्य) २. ग्रहगत्युपवास for (ग्रहगतफ्पवास)
(ङ) १. यज्ञसवन for (यसस्य वन) २. गत्युपवास for (गतफ्पवास)
३. सावनमानाज्ज्ञेयाः for (सावनमानात्ज्ञेया) ५. चात्र for (चान्या)

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( ३१७ )

नक्षत्रसावनदिनात् सूर्यादीनां स्वसावन दिनानि ।
यस्मात्तस्मादाक्षं दुरधिगमं मन्दबुद्धिनाम्¹ ॥ ५ ॥
मानुष्य पित्र्यदेव¹ ब्राह्म² यान्यष्टा वमूर्त्तकालस्य ।
उक्तानि ज्ञानार्थं बार्हस्पत्यं नवममन्यत्⁴ ॥ ६ ॥
द्वौ द्वौ राशिं¹ मकराहतवः³ षड् सूर्यगति वशाद्योज्याः⁵ ।
शशिरवसन्त² ग्रीष्मा वर्षा शरदौ⁴ सहेमन्ताः ॥ ७ ॥
भूव्यास गुणोभक्तः कर्क व्यासांतरेण रविकर्णं² भूमध्या .
द्भू छाया दिर्घत्वं¹ चन्द्रकर्णोनं³ शेषम्⁴ ॥ ८ ॥


५. (घ) १. मंदबुद्धीनाम् (ग) (ङ) for (मंदबुद्धिनाम्)
(च) १. बुद्धीनां for (बुद्धिनाम्)

६. (घ) १. पित्र्यदेव (ग) पित्र्यदिव्य for (पित्र्यदेव)
२. ब्राह्माद्यान्यष्टा (ग) for (ब्राह्म यान्यष्टा)
वर्हस्पत्यं (ग) वार्हस्पत्यं for (बार्हस्पत्यं)
(च
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स्त्रिज्ज्या^२ कर्क व्यासान्तर^३ हृता शोध्या ।
Wait, where is ४? Above हृता in line 4 is ४!
Let's look at line 4:
रविकर्णा द्धृता^१ स्त्रिज्ज्या^२ कर्क व्यासान्तर हृता^४ शोध्या ।
Wait, where is ३? Above कर्क?
Let's see: कर्क has ३ above it?
Above कर्क is ३!
Wait, footnote line 20: ३. व्यासांतराहृता (ग) (च) for (व्यासांतरहृता)
So ३ belongs to व्यासान्तर or कर्क व्यासान्तर? It's right above कर्क व्यासान्तर.

त्रिज्याभूव्यास वधो छशि कर्णा हृतातमो व्यासः ॥ १० ॥
Above वधो छशि कर्णा: there is ५ above छशि कर्णा.

भू व्यासेंदुगति वघात् कर्क व्यासांतराक्र्कभुक्ति वधम् ।
Wait, "वघात्" or "वधात्"? It's वघात् (घ with no top opening, or धा? In old print, ध has a loop, घ doesn't. Here it looks like वघात् or वधात्).

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( ३१६ )
अथ संज्ञाध्यायो नाम
चतुर्विंशः
यस्मात्संप्रति पत्तिर्न संज्ञया संज्ञितो¹ विना तस्मात् ।
लोकप्रसिद्धसंज्ञारूपादीनां शशांकाद्याः ॥ १ ॥
युगपद्युगारुदया¹ याम्यायां³ भास्करस्य वारुण्याम् ।
रात्र्यर्धात्सौम्याया मस्तमया दिनदलादैन्द्रयाम्² ॥ २ ॥
अ्रपमेवकृतः³ सूर्येन्दु पुलिश¹ रोमक वशिष्ट⁵ यवनाद्यैः ।
यस्मात्तस्मादेकः सिद्धान्तो² ग्रन्थरचनान्यौः⁴ ॥ ३ ॥
यदि भिन्नाः सिद्धान्तभास्कर² संक्रान्तयोपि भेदसमाः³ ।
सस्पष्टः पूर्वस्यां विषुवत्पार्कोदयो¹ यस्य ॥ ४ ॥
तन्त्र पक्षागणितं¹ मध्यम गत्युत्तरादयः पञ्च ।
कुट्टाकारो³ वेधः⁴ छन्दश्चित्यूतरं² गोलः ॥ ५ ॥

१. (घ) १. संज्ञिनो (ग) संज्ञिने for (संज्ञितो) (च) १. संज्ञिनो for (संज्ञितो)
२. (घ) १. युगादि (ग) युगपत् युगादिरुदयात् for (युगपद्युगारुदया)
२. हिनदलादैन्द्रयाम् (ग) (ङ) for (दिनदलादैन्द्रयाम्)
(च) १. युगपद्युगादि for (युगपद्युगा) २. हिनदलादै for (दिनदलादै)
(ङ) १. युगादिरुदया for (युगारुदया) ३. घाम्यायां for (याम्यायां)
३. (घ) १. पुलिस for (पुलिश) २. ग्रन्थः (च) for (ग्रन्थ)
(ग) ३. अयमेव for (अ्रपमेव) ४. रचनान्या for (रचनान्याः)
(ङ) ५. वसिष्ठ for (वशिष्ट) २. विरचितो for (ग्रन्थरच)
३. नान्यः for (नान्याः)
४. (घ) १. विषुवत्यार्को (ग) (च) for (विषुवत्पार्को)
(ग) २. सिद्धान्ताः (ङ) for (सिद्धान्त) ३. समाम् for (समाः)
(ङ) ३. विभेद समाः for (पिभेद समाः) १. विषुवत्यर्कोदयो for (विषुवत्पार्कोदयो)
५. (घ) १. तन्त्रपरीक्षागणिते (ग) तन्त्रपरीक्षागणितम् for (तन्त्रपक्षागणितम्)
२. चित्युत्तरं गोलः (ग) (च) for (चित्यूत्तरं गोलः)
(च) १. तन्त्रपक्षागणिते for (तन्त्रपक्षागणितं) ३. कुदाकरो for (कुट्टाकारो)
(ङ) १. तन्त्र परीक्षा for (तन्त्रपक्षा) ४. वेद्यश्छन्द for (वेधः छन्द)
२. श्चित्युत्तरं गोलः for (श्चित्यूत्तरं गोलः)
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( ३२० )
यंत्राणिमान संज्ञां³श्चैवा⁴ध्यायाश्चतुर्दश ब्रह्मो¹ध्यायः⁵ ।
चतुर्विंशतिराद्यं दृं²शभिः सहोध्यायैः⁶ ॥ ६ ॥
श्री चापवंशतिलके श्री व्याघ्रमुखे नृपे शकनृपाणाम्¹ ।
पंचाशत्संयुक्तैः² वर्षशतैः³ पंचभिरतीतैः ५५०⁴ । ॥ ७ ॥
ब्रह्मस्फुटसिद्धांतैः⁴ सज्जनगणितगोलविप्रित्यै¹ ।
त्रिंशद्वर्षेण ततो² जिष्णुसुतब्रह्मगुप्ते⁶ ॥ ८ ॥
गणितेन फलं⁴ सिद्धं ब्राह्मं³ ध्यान ग्रहे यतोध्याये ।
ध्यानग्रहो द्विसप्तत्यार्याणां⁵ न लिखितोन्न मया ॥ ६ ॥

६. (घ) १. ब्राह्मो अध्यायः for (ब्रह्मोध्यायः) (ग) ब्राह्मो for (ब्रह्मो)
(वि०--यहां प्रथम पंक्ति समाप्त)
२. दंशभिः (ग) (च) (ङ) for (दृंशभिः)
(ग) ३. संज्ञारव्यो for (संज्ञाश्चै) ४. चाध्याय for (वाध्याया)
५. 'अध्यायः' से दूसरी पंक्ति आरम्भ (ङ)
(च) ५. अध्यायाः for (ध्यायः)
(ङ) ३. ख्याता for (श्चैवा) १. ब्राह्मो for (ब्रह्मो)
६. र्युताध्यायैः for (सहाध्यायैः)
७. (ग) १. नृपानाः for (नृपाणाम्) २. पंचशत्संयुक्तै for (पंचाशत्संयुक्तैः)
३. वर्षशतैः for (वर्षशतैः) ४. '५५०' संख्या लुप्त है।
(च) ५. श्रीचापविंशतिलके for (श्रीचापवंशतिलके)
६. पंचभिरतीतै for (पंचभिरतीतैः)
(ङ) ३. संयुक्तैर्वर्षशतैः for (संयुक्तैः वर्षशतैः)
८. (घ) १. विप्रीत्यै (ग) वित्रीत्यैः for (विप्रित्यै)
२. त्ततो (ग) कृतो (ङ) for (ततो) (ग) ३. ब्राह्मः (ङ) for (ब्रह्म)
४. स्फुटसिद्धांतः (ङ) for (स्फुटसिद्धांतैः) ५. गणितज्ञ for (गणित)
६. गुप्तेन (ङ) for (गुप्ते) (च) ५. सज्जनगणित for (सज्जनगणित)
१. विप्रीत्यै for (विप्रित्यै) २. त्ततो for (त्ततो)
(ङ) १. वित्रीत्यै for (विप्रित्यै)
९. (घ) १. लिखितोऽत्र (ङ) for (लिखितोत्र) (ग) २. सिधं for (सिद्धं)
(च) ८. ब्रह्मो for (ब्राह्मं) (ङ) ४. फले for (फलं)
२. सिद्धिब्राह्मो for (सिद्धं ब्राह्मं) ६. यतोऽध्याये for (यतोध्याये)
५. द्विसप्ततिरायार्याणां for (द्विसप्तत्यार्याणां)
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स्य for (भोग्य)
१६. (ङ) १. त्रिंशत्सप्तनवरसेन्दुर्जिनतिथि विषया गृहार्धचापानाम् ।
अर्धज्याखंडानि ज्याभुक्तं वधं सभोग्य फलम् ॥ १६ ॥
for
(त्रिंशत्सप्तनवरसेंदुः ॥ १६ ॥)
२. गतभोग्यखण्डान्तरदलविकलवधाच्छ्रतैनैर्विभ्राप्तैः ।
तद्युतिदलं युतोनं भोग्यादूनाधिकं भोग्यम् ॥ १७ ॥
for
(गतभोग्य खंडकांतरेदल ॥ १७ ॥)

Everything is precise, completely aligned with the image text, line by line.( ३२५ )
तिथिभोगनाडिकासु द्विगुणा$^१$स्त्रिगुणा खे शोध्याः ।
पंचाशीत्यंशो$^२$नास्तिथि नाडीशोधयेच्छशिनः ॥ १२ ॥
वेदहतो नवभक्तौ राश्यादौ दिनकरोडुपकेंद्रम् ।
त्रिगुणं सप्त विभक्तं गजाद्रयोंशा रवेरुच्चम् ॥ १३ ॥
विकलां$^१$ संयुक्तं$^२$ नव बाणा लि

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( ३२६ )
स्पांष्टांशोना सवितु द्विगुणा² ज्याशीतगोः³ फलं लिप्ताः ।
स्वफलमृणं चक्रार्द्धादूने केंद्रेऽधिके धनं⁴ मध्ये ॥ १८ ॥
नगमूहद्विविभोग्यं खंडं चांद्रं मत्त¹ भागोनं ।
द्विगुणं² भुक्तिफलं स्वमृणं स्यात्कुलीरमकरादिकेंद्रे³ ॥ १९ ॥
भांशोर्कफलस्यैदौ रविवद्विशोद्धतः स्वोर्के रवि² ।
फलमिनवतिथौ³ चांद्रे⁴व्यस्तः⁵ स्फुटार्काप्तम् ॥ २० ॥
पंचेषु पंचयुगगुणायम चंद्रांशुचंद्रकेन्द्र भ²फलानि ।
³द्विद्विद्विकुकुभुवः षटक्षर हिते तं⁴ सूर्यम् ॥ २१ ॥
¹भान्यश्विन्यादीनि ॥ २२ ॥
²अकोनचंद्रलिप्ता ॥ २३ ॥

१८. (ङ) १. स्वाष्टांशोना for (स्पांष्टांशोना)
२. द्विगुणा for (द्विगुणा) ३. गोः for (गोः)
४. 'धनम्' पद लुप्त है।
१९. (ङ) १. विव सुलवं for (मत्तभागोनं)
२. 'द्विगुणं' यहां यह पद प्रथम पंक्ति का समापक है।
३. मकरादिके for (मकरादिकेंद्रे)
२०. (ङ) १. रविवद्ध्वा द्विशोधिते तथा स्वोच्चे for (रविवद्विशोद्धतः स्वोर्के)
२. यहां 'रवि' पद दूसरी पंक्ति का आरंभक है।
३. नवञ्च तिथौ for (नवतिथौ) ४. चांद्रे for (चान्द्र)
५. व्यस्तं for (व्यस्तः)
२१. (ङ) १. चंद्राश्चन्द्र for (चंद्रांशुचन्द्र) २. ज for (भ)
३. द्विकुभुव खरहिते for (द्विद्विद्वि कुकुभुवः षटक्षरहिते)
४. तथा सूर्ये……for (तसूर्यम्)
२२. (ङ) १. अकोनचन्द्रलिप्ताः खयमस्वरभाजिताः फलं तिथयः ।
गतगम्ये षष्टिगुणे भुक्त्यन्तरभाजिते घटिकाः ॥ २२ ॥
for
(भान्यश्विन्यादीनि ॥ २२ ॥)
२. भान्यश्विन्यादीनि ग्रह लिप्ताः खखवसूद्धृता लब्धम् ।
भुक्तिहृते गतगम्ये दिवसाः षष्ट्याहते घटिका ॥ २३ ॥
for
(अकोन चन्द्रलिप्ताः ॥ २३ ॥)