ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)
Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary
by आचार्य ब्रह्मगुप्त
About this granth
The Brahmasphuta Siddhanta (ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त) is the great astronomical and mathematical treatise of Brahmagupta (born 598 CE), completed in 628 CE at Bhillamala (modern Bhinmal, Rajasthan) when he was thirty. It holds a special place in the history of mathematics as the first text to treat zero as a number, with rules for adding, subtracting and multiplying with it, and to set out rules for positive and negative quantities. It also gives the formula for the area of a cyclic quadrilateral and the bhavana method for square-nature equations.
Its chapters deal with the mean and true motions of the planets, the three problems of time, place and direction, lunar and solar eclipses, risings and settings, the moon's crescent, planetary and stellar conjunctions, arithmetic and the kuttaka, shadows, the sphere and instruments.
This scan is Volume I of the 1966 edition from the Indian Institute of Astronomical and Sanskrit Research, New Delhi, with the Vasana, Vijnana and Hindi commentaries, prepared by an editorial board led by Acharya Ram Swarup Sharma, with a foreword by Dr. Sampurnanand and an introduction by Dr. Satya Prakash. It has 737 pages.
( २८१ )
लघवोत्पो$^१$ राश्यंशा$^२$ महति महतो$^३$ ऽल्प$^६$वृत्तमल्पेन$^७$ ।
पूरयंस्तींदुर्महता$^४$ कालेन महाशनैश्चारी$^५$ ॥ १४ ॥
यन्मूलं तध्वासो मंडललिप्ता कृतेर्दशहतायाः$^२$ ।
तस्यार्द्धं$^३$ व्यासाद्धं$^४$ योजनकर्णप्रमाथार्थम्$^५$$^६$ ॥ १५ ॥
भगणकलाव्यासाद्धं भवति कलाभिर्यतो$^२$ न सकलाभिः$^३$ ।
ज्यार्द्धानि न स्फुटानि ततः$^१$ कृतं व्यासदलमन्यत् ॥ १६ ॥
राश्यष्टांशेष्टांकांत्यदसंधिभ्यः$^१$ क्रमोक्रमात्कृत्वा$^२$ ।
बध्नीयात् सूत्राणि$^३$ द्वयोर्द्वयो ज्यास्तदर्द्धानि ॥ १७ ॥
१४. (घ) १. लघवोऽल्पे for (लघवोत्पो) २. राशंशा (च) for (राश्यंशा)
३. महांतो (ग) (ङ) for (महतो)
४. पूरयतींदुर्महंता (ग) पूरयतींदुर्महता (ङ) for (पूरयंस्तींदुर्महता)
५. महशनैश्चारी (ग) महच्छनैश्चारी (ङ) for (महाशनैश्चारी)
(ग) ६. ल्पवृत्त for (ऽल्पवृत्त) ७. मन्येन for (मल्पेन)
(च) ४. पूरयंती दुर्महता for (पूरयंस्तींदुर्महता)
५. महशनैश्चारी for (महाशनैश्चारी)
(ङ) १. लघवोऽल्पे for (लघवोत्पो)
१५. (घ) १. तद्वचासो (ग) (ङ) for (तध्वासो) २. कृतेर्दं श (ग) for (कृतेर्दश)
३. नस्यार्द्धं for (तस्यार्द्धं) ४. व्याद्धं for (व्यासाद्धं)
५. कर्णामाणार्थम् (ग) (च) कर्णं प्रमाणार्थम् for (कर्ण प्रमाथार्थम्)
(च) १. तद्वचासो for (तध्वासो) २. ईंशहतायाः for (र्दशहतायाः)
४. दघासाद्धं for (व्यासाद्धं)
(ङ) ६. प्रमाणार्थम् for (प्रमाथार्थम्)
१६. (घ) १. + (च) + (ङ)
(ग) २. यंतोर्यतो for (यं तो न)
(ङ) ३. सविकलं हि for (सकलाभिः)
१७. (घ) १. ष्वंकानपद (ग) for (ष्टांकांत्यद)
२. क्रमोत्क्रमात्कृत्वा (ग) (ङ) for (क्रमोक्रमात्कृत्वा)
३. सूत्राणि (ग) (च) (ङ) for (सुत्राणि)
(च) १. ष्वंकान्यद for (ष्टांकांत्यद) ग. क्रमोत्क्रम। कृत्वा for (क्रमोक्रमा कृत्वा)
(ङ) १. राश्यष्टांशेष्वङ्कान् for (राश्यष्टांशेष्टांकांत्)
४. पदसन्धिभ्यः for (यदसंधिभ्यः)
( २८२ )
ज्यार्द्धानि ज्यार्द्धानां ज्याखंडान्यन्तराणि तन्त्ये¹ च।
व्यस्तान्यं³ तदेथ विषुरू² क्रमज्या धनुस्ताभ्याम् ॥ १८ ॥
एक द्वित्रि³ गुणाया व्यासार्द्ध कृतेः¹ पृथक् चतुर्थेभ्यः।
मूलान्यष्ट⁴ द्वादश षोडष² षडान्यतो⁵ न्त्यानि ॥ १९ ॥
तुल्यक्रमोक्रम¹ समज्या⁶ खंडक⁴ वर्ग युतिभगिम्²।
प्रोह्यानष्टं³ व्यासार्द्धं वर्गंतस्तत्पदे⁵ प्रथमं ॥ २० ॥
तद्दलखण्डानि तदुन¹ जिन समानि द्वितीयमुत्पत्तौ²।
कृतयमवैक दिगीशेषु सप्तरसगुणा³ नवादीनाम् ॥ २१ ॥
एवं जीवा खंडान्यल्पानि बहूनि¹ वाद्यखण्डानि²।
ज्यार्द्धानि³ वृत्तपरिधेः षष्टचतुर्थत्रिभागानाम् ॥ २२ ॥
१८. (घ) १. तान्येव (ग) (ङ) (च) for (तन्त्ये च)
२. वेषु (ग) पाद्यतेषु for (विषुरूक्रमज्या)
(ग) ६. व्यस्तान्यत् for (व्यस्तान्यं) ३. व्यस्तान्यताद्य तेषु for (व्यस्तान्यं तदेथ विषु)
२. तेषुरुत्क्रमज्या for (विषुरूक्रमज्या)
(ङ) ३. व्यस्तान्यन्त्यादथ for (व्यस्तान्यं तदेथ)
२. वेषुरुत्क्रमज्या for (विषुरूक्रमज्या)
१९ (घ) १. कृतेः (ग) (च) (ङ) for (कृतेः) २. षोडश (ग) (च) (ङ) for (षोडष)
(ग) ३. द्विगुणाया for (द्वित्रिगुणाया) ४. मूलात्यष्ट for (मूलान्यष्ट)
५. षंडान्यतो for (षडान्यतो)
(ङ) ५. खण्डान्यतोऽन्यानि for (षडान्यतोन्त्यानि)
२०. (घ) १. तुल्यक्रमोत्क्रम (ग) (च) (ङ) for (तुल्यक्रमोक्रम)
२. चतुभगिम् (ङ) for (भगिम्)
३. प्राज्यानष्टं (ग) प्राह्यानष्टं for (प्रोह्यानष्टं)
(ग) ४. खंड for (खंडक) ५. वर्गं स्तत्पदे for (वर्गंतस्तत्पदे)
(च) ३. प्रोज्यानष्टं for (प्रोह्यानष्टं) (ङ) ६. ज्यासम for (समज्या)
२१. (घ) १. तदून (ग) (च) (ङ) for (तदुन)
(ग) २. (वि०—'द्वितीय' पद लुप्त है)
(च) ३. गुणनवादीनाम् (ङ) for (गुणानवादीनाम्)
२२. (घ) १. बहूनि (ग) (च) (ङ) for (बहूनि) २. षंडानि (च) for (खण्डानि)
(ग) ३. ज्यार्धनिवृत्तिपरिधेः for (ज्यार्द्धानिवृत्तपरिधेः)
(के) २. वा
as physical lines: Wait, let's count the lines if we keep them separate vs merged. Wait, is४ ५ १really a separate line? Look atकक्षामंडलभूमध्ये: १ २ ३ कक्षामंडलभूमध्ये Here१, २, ३are squeezed directly aboveकक्षा, मंडल, भूमध्येof the single compound wordकक्षामंडलभूमध्ये! It is 100% indisputably a set of footnote reference marks for the words below it. If you separate it onto a previous line: १ २ ३ कक्षामंडलभूमध्ये मध्यमः स्वकक्षायाम् । It completely disconnects१, २, ३fromकक्षा, मंडल, भूमध्ये. Whereas: कक्षा^१मंडल^२भूमध्ये^३ मध्यमः स्वकक्षायाम् । makes complete sense! Wait, what about the shloka line itself? उक्रम^४ समखण्ड^५ गुणाढ्यास्रादथवा^१ चतुर्थभागाद्यम् । कृत्वोक्त खण्डकानि^२ ज्यार्द्धानयनं^६ नलध्वमस्मात्^३ ॥ २३ ॥ क
( २८४ )
स्पष्टं१ तन्मध्यांतरमृणं धनं वा तप्तो२ मध्ये ।
कोटिफलं व्यासाद्धोत्पदयोराद्यं तयो भवत्युपरि३ ॥ २६ ॥
द्वित्तीययोर्यतोऽधस्ताष्टाक्तोनं१ तरतः२ कोटिः३ ।
कर्णस्तद्भुजफलकृतिसंयोग४ पदं तदुद्धृता त्रिज्या ॥ २७ ॥
भु६जफल गुणिताप्तधनु गुणि१ते चैवं२ फलं शीघ्रं ।
त्रिज्याभक्तः३ कर्णः परिधिगुणे४ बाहुकोटिः गुणाकारः५ ॥ २८ ॥
२६. (घ) १. अष्टं for (स्पष्टं)
२. ततो (ग) गृहे मध्ये ।। २६ ।। for (तप्तो मध्ये)
३. भंवत्युपरि (ग) (च) (ङ) for (भवत्युपरि)
(ग) इस श्लोक की पहली पंक्ति २६ वें श्लोक की दूसरी पंक्ति है।
इस श्लोक की दूसरी पंक्ति २७ वें श्लोक की पहली पंक्ति हैं—
(च) २. ततो for (तप्तो)
(ङ) दे० वि० नोट २५ वें श्लोक के अन्तर्गत टिप्पणी में।
२. गृहे मध्ये for (तप्तो मध्ये)
२७. (घ) १. तद्युक्तोनं (ङ) for (ताष्टक्तोनं) २. ततः (ङ) for (तरतः)
(ग) ३. कोटिः ।। २७ ।। (ङ) for (कोटिः)
(वि०— इस श्लोक की दूसरी पंक्ति— २८ वें श्लोक की प्रथम पंक्ति है—
४. फलसंयोगं for (फलकृति संयोग)
(च) १. ऽधस्तद्युक्तोनं for (ऽधस्ताष्टाक्तोनं)
२८. (घ) १. धनुर्गुणिते for (धनुगुणिते) (ग) गंणितेनैवं फलं शीघ्रं ।। २८ ।।
२. नैवं for (चैवं)
३. विज्या for (त्रिज्या)
४. गुणो (ग) (ङ) for (गुणे)
५. गुणकारः (ग) (ङ) for (गुणाकारः)
(ग) इस श्लोक की पहली पंक्ति २८ वें श्लोक की द्वितीय पंक्ति है।
६. भुजफ for (भुजफल) ७. कोटि (ङ) for (कोटिः)
(च) १. गुंणिते for (गुणिते) ४. परिधोगुणो for (परिधिगुणे)
७. कोटि for (कोटिः) ५. गुणकारः for (गुणाकारः)
(ङ) १. धनुर्गुणिते for (धनुगुणिते) २. नैवं for (चैवं)
( २८५ )
असकृन्मांदे^१ तत्फलमाद्यसमं^३ नात्र कर्णोस्मात्^४ ।
प्रतिपादनार्थमुच्चं^२ प्रकल्पितं ग्रहगतेस्तथा पातः ॥ २६ ॥
भुक्तेरूनाधिकनामानस्यच भवति कर्णवशात् ।
कक्ष्या^३ व्यासाद्धर्धगुणा मंडललिप्ता विभाजिताकर्णः ॥ ३० ॥
स्वकलाकर्णेन गुणः कर्णस्त्रिज्याहतः^१ स्पष्टः ।
मह्दहन^२ जलमयानं^४ विष्कंभो योजनैः कनेंदुना^३ ॥ ३१ ॥
२६. (घ) १. असकृन्मां (ग)^१ असकृन्मान्धे for (असकृत् मांदे)
२. प्रतिपदेनार्थमुच्चं for (प्रतिपादनार्थमुच्चं)
(ग) ३. सम for (ममं)
४. कर्णोस्मात् ॥ २६ ॥ (ङ) for (कर्णोस्मात्)
इस श्लोक का उत्तरार्ध, ३० वें श्लोक का पूर्वार्ध है ।
(च) १. असकृन्मांदे for (असकृत्मांदे)
४. कर्णोस्मात् for (कर्णोस्मात्)
(ङ) २. असकृन्मान्दे for (असकृत्मांदे)
३०. (घ) १. तामानस्य (ग) for (नामानस्य)
(ग) २. व स्यात् ॥ ३० ॥ for (वशात्)
३. कक्षा (ङ) for (कक्ष्या)
इस श्लोक का उत्तरार्ध, ३१ वें श्लोक का पूर्वार्ध है ।
(च) १. तामानस्य for (नामानस्य)
(ङ) १. रूनाधिकता for (रूनाधिकना)
४. + इति स्फुटगतिवासना +
३१. (घ) १. हृतः (ग) हृतस्पष्टः ॥ ३१ ॥ for (हतः)
२. मृद्दहन (ग) (ङ) for (मह्दहन)
३. किनेन्दूनाम् (ग) केनेदूनाम् for (कनेंदुना)
(ग) ४. मायानां for (मयानं)
इस श्लोक की दूसरी पंक्ति अगले श्लोक की पहली पंक्ति है ।
(च) हृतः for (हतः)
२. मृद्दहन (ङ) for (मह्दहन)
४. जलमयानां (ङ) for (जलमयानं)
३. किनेंदुनां for (कनेंदुना)
(ङ) ५. विष्कंभो for (विष्कंभा)
३. द्विनेंदूनां for (कनेंदुना)
( २८६ )
शशिवसुतिथिभि<sup>६</sup> यंमपक्षशररसैः<sup>१</sup> शून्य वस्तु<sup>२</sup> वेदैः ।
व्यर्क<sup>३</sup> व्याप्तांतर गुणमिदु स्फुट कर्णमर्ककर्णाहतम्<sup>४ ५</sup> ॥ ३२ ॥
प्रोह्य भुवो<sup>१</sup> भुच्छाया विष्कंभश्चंद्रकक्षायाम् ।
तद्गुणितं व्यासाद्धं शशिकर्णाहतं ततः<sup>३</sup> प्रमाणकलाः ॥ ३३ ॥
एवं त्रिज्या रविशशि विष्कंभगुणाः<sup>६</sup> स्वकर्णहताः<sup>२</sup> ।
भूछायेंदुश्चंद्रसूर्यं<sup>३</sup> छादयति मानयोगाद्धत्<sup>४ ५</sup> ॥ ३४ ॥
३२. (घ) १. यंम (ग) यमपक्षरासैः ६५२२ for (यमपक्षशररसै)
२. वसु (ग) वसुवेदैः (ङ) for (वस्तुवेदैः)
३. कर्क for (व्यर्क) ४. व्यासांतर (ग) for (व्याप्तांतर)
५. हृतम् (ग) for (हतम्)
(ग) ६. राशिवसुतिथिभिः १५८१ for (शशिवसुतिथिभिः)
(वि०—इस श्लोक के पूर्वार्ध की समाप्ति पर ३२ संख्या होनी चाहिए
परन्तु लिखी हुई ३३ है)
(च) १. यंम for (यम) २. वसु for (वस्तु)
३. ब्यर्क for (व्यर्क) ४. व्यासांतर for (व्याप्तांतर)
५. मर्ककर्णाहृतं for (मर्ककर्णाहतम्)
(ङ) १. यंम for (यम)
३३. (घ) १. भूच्छाया (ग) for (भुच्छाया)
२. कक्षायाम् (ग) कक्षायाम् ।। ३४ ।। for (कक्षायाम्)
३. तमः (ग) (च) (ङ) for (ततः)
(ग) इस श्लोक का उत्तरार्ध अगले श्लोक का पूर्वार्ध है ।
(च) १. प्रोज्यभुवोभूच्छाया for (प्रोह्यभुवोभुच्छाया)
(ङ) १. भूच्छाया for (भुच्छाया)
३४. (घ) १. तृज्याशशि for (त्रिज्यारविशशि) २. हृताः (ग) हृता ।।३५।। for (हताः)
३. सूर्य (ग) (च) (ङ) for (सूर्यं)
४. भूछायेंदु चंद्रः (ग) भूछायेंदूचंद्रः for (भूछायेंदुश्चंद्र)
५. (वि०
( २८७ )
विक्षेपौ⁶ यद्यूनः शुक्लेतर पंच³ दृश्यंते ।
महदिदो⁷ रावरणं⁴ कुठ⁵ विषारणो यतो² संछन्नः ॥ ३५ ॥⁸
अर्द्धच्छिन्नो⁵ भानुस्तिक्षरण¹ विषारणस्ततो स्याल्पे² ।
यदि राहुः प्राग्भांदिदु³ छादयति किं तथा नार्कम् ॥ ३६ ॥४
३५. (घ) १. दश्यंते (ङ) for (दृश्यन्ते)
(यहां ३५ की संख्या अङ्कित है)
२. द्धंसंछन्नः (ग) र्धसंछन्नः (ङ) र्ध्व सञ्छन्नः for (संछन्नः)
(ग) ३. पंचं for (पंच)
१. दिश्यंते ॥३६॥ for (दृश्यंते)
४. रादरणं for (रावरणं)
५. कुठ (ङ) for (कुठ)
वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध ३७ वें श्लोक का पूर्वार्ध है)
(च) ६. विक्षेपो for (विक्षेपौ)
३. पुंद्रश्यंते ३५ for (पंचदृश्यंते)
७. महर्दिदो (ङ) for (महदिदो)
२. यतोर्द्धं for (यतो)
८. (वि०—यहां कोई क्रमसंख्या अंकित नहीं है)
(ङ) ४. रावरणां for (रावरणं)
३६. (घ) १. स्तीक्ष्ण (ग) (ङ) for (स्तिक्षरण)
२. ततोऽस्याल्पम् (च) (ङ) for (ततोस्याल्पे)
(वि०—यहां क्रमसंख्या ३६ दी है)
३. प्राग्भागा॑र्दिदु (ग) प्राग्भांदिंदुं for (प्राग्भांदिदु)
(ग) २. ततोऽस्याल्पी ॥३७॥ for (ततोस्याल्पे)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध ३८ वें श्लोक का पूर्वार्ध है)
(च) १. स्तीक्षण for (स्तिक्षरण)
४. (वि०—यहां कोई क्रमसंख्या नहीं दी, क्योंकि इस प्रति के अनुसार यहां का
उत्तरार्ध ३७ वें श्लोक का पूर्वार्ध है।
(ङ) ५. अर्धच्छन्तो for (अर्द्धच्छिन्नो)
२. प्राग्भागादिन्दुं for (प्राग्भांदिदु)
( २८८ )
स्थित्यर्द्धं¹ महदिन्दो यथो⁵ तथा किन्न सूर्यस्य² ।⁶
किं प्रतिविषयं³ सूर्यो⁴राहुश्चान्यो यतो रविग्रहणे ॥ ३७ ॥
ग्रासान्यत्वं न ततो राहुक्तं¹ ग्रहण मर्कद्धोः² ।
एवं वराहमिहिरश्रीषेणार्य³भटविष्णुचंद्राद्यैः ॥ ३८ ॥⁴
लोक विरुद्धमभिहितं वेदस्मृति¹संहिताबाह्यम्⁴ ।
यद्येवं⁵ ग्रहणफलं गर्गाद्यैः संहितामु²दय³भिहितम् ॥ ३६ ॥
३७. (घ) १. स्थित्यद्धं for (स्थित्यर्द्धं)
२. सूर्यः स्य (यहां क्रमसंख्या ३७ दी है) (ग) सूर्यस्य ।।३८।। for (सूर्यस्य)
३. विषण्रं (ग) विखयं for (विषयं)
(ग) (वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध ३६ वें श्लोक का पूर्वार्ध है ।
४. सूयो for (सूर्यो)
(च) ५. यंथा (ङ) for (यथा)
२. (वि०— यहां क्रमसंख्या ३७ अंकित है)
६. वि०—यहां कोई क्रमसंख्या नही दी है, क्यों कि इस श्लोक का उत्तरार्ध,
३६ वें श्लोक का पूर्वार्ध है । (ङ) १. स्थित्यर्धं for (स्थित्यर्द्धं)
३८. (घ) १. कृतं (ग) (च) (ङ) for (क्रतं)
२. मर्केंद्वोः (ग) मर्केंद्वोः ।।३६।। for (मर्कद्धो) (यहां ३८ संख्या दी है)
(ग) ३. श्रीषेणाचार्यं for (श्रीषेणार्य)
इस श्लोक का उत्तरार्ध, ४० वें श्लोक का पूर्वार्ध है ।
(च) २. मर्क द्दोः for (मर्कँद्दो.) (वि०— यहां श्लोक संख्या ३८ अंकित हैं)
४. यहां क्रमसंख्या लुप्त है, क्योंकि यह ३६ वें श्लोक का पूर्वार्ध है ।
(ङ) २. मर्केंद्वोः for (मर्कद्धोः)
३६. (घ) १. स्त्रिम्मृवि for (स्मृति) (यहाँ संख्या ३६ है)
२. संहितासु (ग) (ङ) for (संहितामु)
३. यदि भिहितम् (ग) for (दयभिहितम्)
(ग) ४. संहिताद्वाह्यम् ॥ ४० ॥ for (संहिताबाह्यम्)
५. यद्येव ग्रहफलं for (यद्येवं ग्रहणफलं)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध ४१ वें श्लोक का पूर्वार्ध है ।
(च) ४. यहाँ '३६' की क्रमसंख्या अंकित है । परन्तु उत्तरार्ध के अन्त में कोई
क्रमसंख्या अंकित नहीं, क्योकि उत्तरार्ध, ४० वें श्लोक का पूर्वार्ध माना
जाता है ।
(ङ) ३. यदभिहितम् for (दयभिहितम्)
( २८६ )
तद्भावे² होमजपः³ स्नानादि⁴ फलस्य⁵ चाभावः ।⁷
राहुक्रतं¹ ग्रहणद्वय मागोपालांगनादि⁶ सिद्धमिदम् ॥ ४० ॥⁸
बहुफलमिदमपि¹ सिद्धं जपहोमस्नानफलमत्र² ।
स्मृतीषूक्तं³ न स्नानं राहोरन्यत्र दर्शनाद्रात्रौ ॥ ४१ ॥
राहुग्रस्ते सूर्ये¹ सर्वं गंगासमं तोयम्² ।
स्वर्भानुरास्तुरिरिनं³ तमसा वित्याधवेदवाक्यमिदम्⁴ ॥ ४२ ॥
४०. (घ) (वि०—यहाँ प्रथम पंक्ति के अन्त में ४० संख्या दी है)
१. कृतं (ग) for (क्रतं)
(ग) २. तदभावो for (तद्भावे) ३. लुप्त पद है । ४. लुप्त पद है ।
५. फलस्याभावः ॥ ४१ ॥ for (फलस्य चाभावः)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध, अगले श्लोक का पूर्वार्ध है)
६. माग्गो पा
( २६० )
श्रुतिसंहितास्मृतीनां भवति तथैक्यं¹ तदुक्तिरत:³।²
राहुस्तच्छादयति प्रविशति यच्छुक्ल⁴ पंच दश्यन्ते ॥ ४३ ॥
भूच्छाया तमसींदो⁴ वरप्रदानात्कमलजस्य।५ ¹
चन्द्रोवुभयो²धस्थो³ यदग्निमय⁶ भास्करस्य मासांते ॥ ४४ ॥
छादयति शमिततयो³ राहु छादयति⁶ तत्सवितु:।⁴ ¹
भूच्छाया व्याससम:² शशिकक्षायां स्थित: शशिग्रहणे ॥ ४५ ॥५
४३. (घ) १. यथैक्यं (ग) (च) (ङ) for (तथैक्यं)
२. (वि०—यहाँ क्रमसंख्या ४३ दी है) (च) (ङ)
(ग) ३. रंत: ॥ ४४ ॥ for (रत:)
४. यत् शुक्ल पंच दृश्यंते for (यच्छुक्ल पंचदश्यन्ते)
(च) (वि०—यहाँ इस श्लोक के अन्त में कोई क्रमसंख्या अंकित नहीं क्योंकि
यह उत्तरार्ध यहाँ ४४ वें श्लोक का पूर्वार्ध माना जाता है)
(ङ) ४. यच्छुक्ल for (यच्छुक्ल)
४४. (घ) १. (वि०—यहां क्रमसंख्या ४४ दी है) (च) (ङ)
२. वुमयो (ग) चंद्रोबुमयोघस्थ: for (चन्द्रोवुभयोधस्थो)
३. घस्थो for (स्थ: स्थो)
(ग) ४. नभसींदो for (तमसींदो)
५. त्कमलाया ने ॥४४॥ for (कमलजस्य). ६. यदग्नियम for (यदग्निमय)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध ४५ वें श्लोक का पूर्वार्ध है)
(च) (वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध ४५ वें श्लोक का पूर्वार्ध है)
अतएव यहां अन्त में कई क्रमसंख्या अंकित नहीं ।
(ङ) ५. कमलयोने: for (कमलजस्य)
२. छन्द्रोम्बुमयोऽघ: स्थो for (चन्द्रोवुभयोधस्थो)
४५. (घ) १. (वि०—यहां क्रमसंख्या ४५ अंकित है) (च) (ङ)
२. सम for (सम:)
(ग) ३. शमिततापो (ङ) for (शमिततयो)
४. तच्छवितु: ।।४५।। for (तत्सवितु:)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध, ४६ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) ३. शमिततायो for (शमिततयो) ५. क्रम संख्या लुप्त
(ङ) ६. राहुश्छादयति for (राहुछादयति)
( २६१ )
राहु छादयतींदुं³ सूर्यग्रहणे⁴ऽर्किंबिंदु¹ समः ।
यत्तदधिकं तमोमयराहुव्यासस्य सूर्य⁵ द्रष्टं² तत् ॥ ४६⁶ ॥
नश्यति भूछायेंदु व्यास समोऽस्माद्¹ भवति राहुः³ ।
भूछायानेंदुमतो² ग्रहणे छादयति नार्किंबिंदुर्वा⁴ ॥ ४७⁵ ॥
तत्स्थस्तद्व्याससमो¹ राहुं² छादयति शशिसूर्यौ³ ।
प्राच्यपरं सममंडलमन्द्यद्याम्योत्तरं क्षितिजमन्यत् ॥ ४८⁴ ॥
४६. (घ) १. बिंदुं समः (ग) (च) (for बिंदुसमः)
(वि०—यहां क्रमसंख्या ४६ अंकित है)
२. दृष्टं तत् (ग) for (द्रष्टं तत्)
(ग) ३. छादयतींदुं for (छादयतींदु) ४. सूर्यं for (सूर्य)
५. ‘सूर्य’ लुप्त पद है।
(वि०—श्लोक का उत्तरार्ध ४७ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) २. दृष्टं for (द्रष्टं) ६. क्रमसंख्या लुप्त
(ङ) ३. राहुश्छादयतीन्दूं for (राहुछादयतीन्दु) २. दृष्टत्वात् for (दृष्टंतत्)
४७. (घ) १. समोऽस्माद् (च) for (समोस्माद्)
(वि०—यहां क्रमसंख्या ४७ दी है)
२. भूछायेंदु for (भूछायानेंदुमतो)
(ग) ३. राहुः ॥४७॥ for (राहुः)
४. बिंदुर्वा for (बिंदुर्वा)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध, ४८ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) २. भूछायातेंदुमतो for (भूछायानेंदुमतो) ४. नार्किंबिंदुवति for (नार्किंबिंदुर्वा)
५. क्रम संख्या लुप्त
(ङ) ६. भूछायेन्द्रोर्व्यास for (भूछायेंदुव्यास)
२. भूछायेंदुमतो for (भूछायानेंदुमतो)
४८. (घ) १. तद्व्यास (ग) (ङ) for (तद्व्यास) २. राहुं for (राहु)
३. (वि०—यहां क्रमसंख्या ४८ अंकित है) (च)
(ग) ३. सूर्यैः ॥४८॥ for (सूर्यौ)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध ४६ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) १. र्छस्तद्वचास for (तत्स्थस्तद्व्यास) ४. क्रमसंख्या लुप्त
(ङ) (वि०—प्रथम पंक्ति समाप्ति पर ‘ग्रहण वासना’ समाप्त)
✛अथगोलबन्धाधिकारः ✛आरम्भ ।
२. राहुश्छादयति for (राहुछादयति)
( २६२ )
परिकरवृत्तन्मध्ये भूगोलस्थित<sup>१</sup>द्रष्टुः ।
पूर्वापरयोर्लग्नं याम्योत्तरयो<sup>२</sup>र्नतोन्नतं क्षितिजात् ॥ ४६<sup>३</sup> ॥
स्वा<sup>५</sup>क्षांशैरुन्<sup>१</sup>मण्डलमहानिशो वृ<sup>६</sup>द्धिहानिकरम् ।
विषुवन्मण्डलमूर्ध्वं सम<sup>३</sup>मंडलस्थितं स्व<sup>४</sup>कक्षांशैः ॥ ५०<sup>२</sup> ॥
याम्ये<sup>२</sup>नोत्तरतोधः क्षितिजे<sup>३</sup> प्राच्यपरयो र्लग्नम्<sup>१</sup> ।
• विषुवन्मण्डललग्नं मेषतुलादावुदक्कु<sup>४</sup>लीरादौ ॥ ५१<sup>५</sup> ॥
४६. (घ) १. भूगोलस्तस्थित द्रष्टुः (ङ) for (भूगोलस्थितद्रष्टुः)
(वि०—यहां कोई क्रमसंख्या नहीं दी गई) (च)
(ग) १. स्थस्थितद्रष्टुः ॥४६॥ for (स्थितद्रष्टुः)
२. याम्योत्तरयोनंतं क्षितिजात् for (याम्योत्तरयोर्नतोन्नतं
( २६३ )
⁵जिनभागै¹र्याम्येन मृगादावपमंडलमिहार्कः² ।
पातश्चंद्रादिनां³ भ्रमंति⁶ भार्द्धे⁴ खेश्च भूछाया ॥ ५२ ॥⁷
¹पातदयमंडल वह्नि मंडलानि³ स्वविक्षेपैः² ।
सौम्यं विमंडलाद्धं प्रथमं याम्यं द्वितीयमेतेषु⁴ ॥ ५३ ॥५
चन्द्रकुज जीवमंदा भ्रमंति शीघ्रेण बुधशुक्रौ¹ ।
दृग्मंडलाद्धं मूर्द्धं³ यत्तत्परिधि स्थितं ग्रहं द्रष्टाः² ॥ ५४ ॥४
पश्यति यतः क्षितिस्थस्तद्भ्रमति² ततो ग्रहाभिमुखं¹ ।
क्षितिजापमंडलद्युतिर्लग्नं लग्नाग्रतो³ दिशंवलनं⁵ ॥ ५५ ॥⁴
५२. (ख) १. र्घमोन for (र्याम्येन)
२. (वि०— यहां क्रमसंख्या ५२ दी हुई है) (ग) (च)
३. पाताश्चंद्रादीनां (ग) (ङ) for (पातश्चन्द्रादिनां)
४. भार्द्ध for (भार्द्धं) (ग) ५. निज for (जिन)
६. भ्रमंते for (भ्रमंति)
(वि०— इस श्लोक का उत्तरार्ध ५३ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) ३. पाताश्चंद्रादीनां for (पातश्चन्द्रादिनां) ७. क्रमसंख्या लुप्त
५३. (घ) १. पातादषमंडल (ग) पातादपमंडलवत् for (पातदयमंडलवद्)
२. (वि०— यहां क्रमसंख्या ५३ दी है) (ग) (च)
(ग) ३. विमंडनानि for (द्विमंडलानि)
(वि०— इस श्लोक का उत्तरार्ध ५४ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
४. द्वितीयामातष्ट for (द्वितीयमेतेषु)
(च) १. पातदपमंडल for (पातदयमंडल) ५. क्रमसंख्या लुप्त
(ङ) १. पाताद्वपमंडलवद् for (पातदयमंडलवद्)
५४. (घ) १. (वि०— यहां क्रमसंख्या ५४ दी है) (ग) (च)
२. द्रष्टा (ग) दृष्टा for (द्रष्टाः) (ग) ३. मूर्द्ध for (मूर्द्धं)
(वि०— इस श्लोक का उत्तरार्ध ५५ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) २. द्रष्टा for (द्रष्टाः) ४. क्रमसंख्या लुप्त
(ङ) ३. मूर्द्ध्वं for (मूर्द्धं) २. द्रष्टा for (द्रष्टाः)
५५. (घ) १. (वि०— यहां क्रमसंख्या '५५' दी गई है) (ग) (च)
(ग) २. तद्धमति for (तद्भ्रमति) ३. यादिशं for (तोदिशं)
(वि०— इस श्लोक का उत्तरार्ध ५६ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) ४. क्रमसंख्या लुप्त (ङ) ३. लग्नाग्रया for (लग्नाग्रतो)
५. दिशा लग्नम् for (दिशंवलनं)
( २६४ )
हृ²क्षेपं मंडलं दक्षिणोत्तरं³ वित्रिभं विलग्नम्⁴ ॥ ५६ ॥
विषवदुदग्बधनीया क्रंत्यांश¹समांतरेष्वजादीनाम् ।
वृत्ततृतीयं⁴ व्यस्तं कर्कादीनां² तुलादीनाम् ॥ ५७ ॥
विषवद्दक्षिणतो न्यन्³मकरादीनां तदेव विपरीतम् ।
स्वाहोरात्रान्येषां¹ व्यासा⁴ पृगवेव² मिष्टमपि ॥ ५८ ॥
लंका समपश्चिमगं प्राणेन कला¹भूमंडलं³ भ्रमति ।
अपमंडलस्यराशीद्वादशभागाः⁴ क्षितिजलग्नाः² ॥ ५६ ॥
५६. (घ) १. तृभ विलग्ने (ग) for (वित्रिभविलग्नम्)
(ग) २. दृक्षेपमंडलं for (दृक्षेपं मंडलं)
३. दक्षगोत्तरं for (दक्षिणोत्तरं)
(च) २. दृक्षेपमंडलं for (हृक्षेपं मंडलं)
४. विलग्ने for (विलग्नं)
(ङ) २. दृक्क्षेपमंडलं for (हृक्षेपं मंडलं)
१. वित्रिभविलग्ने for (वित्रिभ विलग्नम्)
५७. (घ) १. क्रांत्यंश (ग) (च) (ङ) for (क्रंत्यांश)
२. कक्र्यादीनां (ङ) for(कर्कादीनां)
(ग) ३. विषविदुद्गग्बन्धनीयात् for (विषवदुदग्बधनीया)
४. वृत्तत्रितयं (ङ) for (वृत्ततृतीयं)
(च) २. कवर्कादीनां for (कर्कादीनां)
(ङ) ३. विषबुदुदग्वन्धनीयात् for (विषवदुदम्बधनीया)
५८. (घ) १. रात्राण्येषां (ग) (च) (ङ) for (रात्रान्येषां)
२. पृथगेव (ग) (ङ) for (पृगवेव)
४. व्यासाः (ङ) for (व्यासा)
(च) २. पृथगेव for (पृगवेव)
(ङ) ३. दक्षिणतोऽन्यन् for (दक्षिणतोन्यन्)
५९. (घ) १. कलां (ग) (ङ) for (कला)
२. जलग्नाः for (जलग्नाः)
(ग) ३. भमंडनं for (भूमंडलं) ४. भाग for (भागाः)
(ङ) ३. भमण्डलं for (भूमण्डलं) ४. भागः for (भागाः)
( २९५ )
यात्यूदयं¹ मेषाद्या यत²स्त⁵स्त³दुदयानकालसमाः ।
क्रांतिवशालं⁴कायां तदूनताधिक्यमक्ष⁶वशात् ॥ ६० ॥
क्षितिजोन्मण्डलयोर्यत्स्वाहो³रात्रांतरं¹ चरदलं तत् ।
क्षितिजेग्राप्राच्यपरं स्वाहोरात्रांतरां²शज्या ॥ ६१ ॥
स्वाहोरात्रे क्षितिजां¹द् दिनगतशेषो²न्नतारवेः³ शंकुः ।
तस्माद्⁵ दिनगतशेषं शंकु कुमध्यांतरं दृग्ज्या⁴ ॥ ६२ ॥
दृग्मंडले नतां¹शज्या दृग्ज्या शंकूरुन्नतांशज्या ।
अर्को⁵दयास्तसूत्रा³द्दिनशंकोःदक्षिणो² नृतलम्⁴ ॥ ६३ ॥
क्षितिजे भू²दललिप्ताः कक्ष्यायां दृ³ग्गतिर्नभो मध्यात् ।
अवनति लिप्ता याम्योत्तरार्क ग्रहवदन्यतः⁴ ॥ ६४ ॥
६०. (घ) यांत्युदयं (ग) यात्युदयं (
ग्)"?
Wait, there's a dot near (ग) in line 21?
Let's look at :
"(गं)"? No, it's "(ग)" with maybe a stray dot or "(गं)"?
Wait, above in it's "(ग)". In it's "(ग)". In it's "(ग)". In it's "(ग)". In it's "(ग)".
The manuscripts are usually (क), (ख), (ग), (घ), (ङ), (च).
There is no manuscript (गं). It's (ग), with a stray spot/dot: "(ग)". Let's write (ग).
Wait, look at line 20:
"३. गृहे (च) for (ग्रहे) ४. न्यहकर्म (ग) (ङ) for (न्यहक्कर्म)"
Line 21:
"५. रुदक् for (रूदग्) ६. गुणधनं for (गुणमृणधनं)"
Wait, does it have (ग) before ५?
Yes, "(ग) ५. रुदक् for (रूदग्) ६. गुणधनं for (गुणमृणधनं)".
Line 22:
"६७. (ग) १. कक्ष्या for (कक्षा)
( २६७ )
यत्स्पष्टीकरणार्थं गोलादुत्क्षेप$^१$तत्कृतं सर्वं$^३$ गोलाध्यायः$^२$ ।
सप्तत्यार्याणामेक$^४$ विंशोयम् ॥ ७० ॥
मध्याद्यमिह यदुक्तं तत्प्रत्यक्षमिव दर्शयति यस्मात् ।
तस्मादाचार्यत्वं गोलविदो$^१$ भवति नान्यस्य ॥ ७१ ॥
आचार्येण$^१$ ज्ञातः$^२$ श्रीषेणार्यभटविष्णुचंद्राद्यैः$^३$ ।
गोले$^४$ यस्मात्तस्माद् ब्राह्मो$^५$ गोलः कृतः स्पष्टः ॥ ७२ ॥
गणितज्ञो गोलज्ञो गोलज्ञो ग्रहगतिं विजानाति ।
यो गणितगोलबाह्यो जानाति ग्रहगतिं$^२$ सः$^३$ कथम् ॥ ७३ ॥
$^१$इति ब्रह्मगुप्ते गोलाध्यायः (२१ अध्यायः समाप्तः)
एक विंशतितमः समाप्तः
७०. (घ) १. दुत्प्रेक्ष (ग) दुत्प्रेक्ष्य (ङ) for (दुत्क्षेप)
२. (वि०- यह दूसरी पंक्ति का आरम्भिक शब्द है) (ग) (ङ)
(ग) ३. सर्वा for (सर्वं) ४. समाप्ति सूचक ॥ छः ॥ ॥छः॥ ॥छः॥
(च) १. दुत्प्रेक्षतत्कृतं for (दुत्क्षेपतत्कृतं)
(ङ) +इति श्री ब्राह्मस्फुट सिद्धान्ते गोलाध्यायो नामैकविंशतितमो ऽध्यायः+
(वि०-वस्तुतः गोलाऽध्याय यहां ७० वें श्लोक पर समाप्त हो गया है।
परन्तु उपर्युक्त प्रति में यन्त्राध्याय के पहले तीन श्लोक मिलाकर ७३ पर
समाप्त किया है)
७१. (घ) १. गोलो भवति for (गोलविदो भवति) (वि० - इसकी क्रमसंख्या १ है)
(ङ) वि० - यह 'यन्त्राध्याय' का प्रथम श्लोक है)
७२. (घ) १. आचार्येर्न (ङ) for (आचार्येण) (ग) २. ज्ञाता for (ज्ञातः)
३. 'विष्णु' पद लुप्त है। ४. गोलो (ङ) (च) for (गोले)
५. ब्राह्मो (ङ) for (ब्राह्मो) (वि०-इसकी क्रमसंख्या २ है)
१. आचार्येर्न for (आचार्येण) (ङ) (वि० - यह यन्त्राध्याय का द्वितीय श्लोक है)
७३. (घ) १. इति भह जिष्णुसुतब्रह्मगुप्त विरचिते ब्रह्मस्फुट सिद्धांतो गोलाध्यायः एक
विंशतितमः । for (इति ब्रह्मगुप्ते गोलाध्यायः)
(ग) २. ग्रहति for (ग्रहगतिं) ३. स (ङ) (च) for (सः)
१. ये पद लुप्त है (वि० - इसकी क्रमसंख्या ३ है)
(च) १. इति भह जिष्णुसुत ब्रह्मगुप्त विरचिते ब्राह्म स्फुटसिद्धांतो गोलाध्यायः
एक विंशतितमः for (इति ब्रह्मगुप्ते गोलाध्यायः २१ अध्यायः समाप्तः)
(ङ) (वि० - यह यन्त्राध्यायः का तीसरा श्लोक है)
( २६८ )
अथ यन्त्राध्यायो नाम
द्वाविंशः
कालस्य² परिच्छेदः⁴ कर्तुं यन्त्रै¹र्विना यतो शक्यः³ ।
संक्षिप्तं स्पष्टार्थं यन्त्राध्यायं ततो वक्ष्ये ॥ १ ॥
सप्तदशकालयन्त्राण्यतो धनुस्तुर्यगोलकश्चक्रम्⁴ ।
यष्टि⁵र्शंकु¹र्धटिका² कपालकं कर्त्तरिकीटम्³ ॥ २ ॥
सलिल¹भ्रमो²वलंबः करां³श्छाया दिनार्द्धमर्कोक्षः ।
नव⁴काल ज्ञानार्थं तेषां⁵ संसाधनानान्यष्टौ ॥ ३ ॥
१. (घ) १. विना (ग) (च) (ङ) for (विना)
(ग) २. गोलस्य (ङ) for (कालस्य)
३. यतोऽशक्यः (ङ) for (यतोशक्यः)
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ४ है)
(ङ) (वि०—श्लोक संख्या ४ है इसके पूर्ववर्ती तीन श्लोकों को गोलाध्याय के
अंत में रख दिया गया है)
४. परिच्छेदः for (परिच्छेद)
२. (घ) १. वंटिका for (घंटिका) २. कत्तंरी . (ग) (च) (ङ) for (कर्त्तरि)
३. फीटं (ग) पीठम् for (कीटम्)
(ग) ४. गोलकं चक्रम् for (गोलतश्चक्रम्)
५. यष्टिः (च) (ङ) for (यष्टि)
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ५ है)
(च) ३. फीटा for (कीटम्)
(ङ) ३. पीठम् for (कीटम्)
३. (ग) १. सलिलं (ङ) for (सलिल) २. वमो for (भ्रमो)
३. करांश्छाया (ङ) for (करांछाया) ४. नय for (नव)
५. यहां अनुस्वारलुप्त है ।
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ६ है)
(च) २. ऽवलंबः for (वलंबः) ६. मक्रोक्षः for (मर्कोक्षः)
(ङ) २. भ्रमोऽवलम्बः for (भ्रमोवलंबः)
६. मर्कोऽक्षः for (मर्कोक्षः) ४. नत for (नव)
( २६६ )
सलिले न समं साध्यं भ्रामेण$^{१}$वृत्तमवलंब केनोर्द्धम्$^{४}$ ।
तिर्यक्$^{५}$ कर्णौनान्यैः$^{२}$ कथितैश्च नव प्रसाध्यति$^{३}$ ॥ ४ ॥
धार्यं धनुस्तथाग्र$^{१}$च्छायासाम्यं यथोन्नता भागाः$^{२}$ ।
दिनगतशेषा घटिकाश्चलंबमुक्ता$^{४}$ धनुर्मध्यात्$^{३}$ ॥ ५ ॥
धार्यं$^{४}$ समं तथा वा ज्या छाया पृथगा$^{१}$ यथा भवति अग्रादम्$^{२}$ ।
शक घटिका ज्यामध्यच्छाया मुक्ता$^{५}$ ॥ ६ ॥
घटिका$^{४}$ स्वशंकुभागैः पृष्ठगतै$^{७}$ लंब$^{५}$ भूसमं$^{६}$ समज्यार्द्धात् ।
सशीति$^{१}$ शतांशकं चक्रास्यार्द्धं$^{३}$ धनुर्यंत्रम् ॥ ७ ॥
४. (घ) १. भ्रमेरा (ग) (ङ) for (भ्रामेण)
२. तिर्यक्कर्णौनान्यैः (ग) (ङ) तिर्यक्करणैनान्यैः for (तिर्यककर्णौनान्यैः)
३. प्रसाध्यानि (ग) प्रवक्षामि for (प्रसाध्यति)
(ग) ४. केनोर्ध्वम् (ङ) for (केनोर्द्धम्) ५. तिर्यक् (ङ) for (तिर्यक)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या ७ है)
(च) ५. तिर्यकर्णौनान्यैः for (तिर्यककर्णौनान्यैः)
३. प्रसाध्यानि for (प्रसाध्यति) (ङ) ३. प्रवक्ष्यामि for (प्रसाध्यति)
५. (ग) १. तथान्य for (तथाग्र) (वि०-इसकी श्लोक संख्या ८ है)
२. भागम् for (भागाः) ३. धनुर्मुक्तान् for (धनुर्मध्यात्)
(ङ) १. तथाऽन्यत् for (तथाग्र) ४. स्वलम्बमुक्ता for (स्वलंबमुक्ता)
६. (घ) १. पृष्टगा (ग) for (पृथगा) २. (वि०-दूसरी पंक्ति का आरम्भिक पद) (ग)
३. छायाया (ग) छाया यथा for (छायया) (ग) ४. धार्यं (ङ) for (धार्यं)
२. अग्रादश for (अग्रादम्) ५. भुक्ताः ॥६॥ (ङ) for (मुक्ता)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या ६ है) (च) ३. छायाया for (छायया)
(ङ) १. मध्यगा for (पृथगा) २. अग्रादिष्ट्रा for (अग्रादम्) ६. 'शक' लुप्त
७. (घ) १. सशीति (ग) साशीति (ङ) for (सशिति)
२. शताशाकं (ग) शाकं (ङ) for (शतांशकं)
३. चक्रस्याद्धं (ग) for (चक्रास्यार्द्धं) (ग) ४. घटिकाः (च) for (घटिका)
५. लंब (ङ) for (लंब) ६. 'समं' पद लुप्त है।
(वि० इसकी श्लोकसंख्या १० है)
(च) १. सशीति for (सशिति) २. शतांशाकं for (शतांशकं)
३. चक्रस्याद्धं for (चक्रास्याद्धं) (ङ) ७. पृथमातै for (पृष्ठगतै)
६. भू for (भूसमं)
( ३०० )
मघ्यादिनोन्नतांशै ³ दिनार्द्ध नाड्यो ⁴ वदंति तुल्या ये ⁵ ।
ते ⁶ सूर्य्यास्त ¹ छादृष्ट ² छाया समान यतः ॥ ८ ॥
जीवा स्वाहोरात्रं परिकल्पाप्ता ¹ नतोन्नतत्रिज्या ।
अनुपातात् ⁵ तत्कार्या सूर्य्यगोलके ² चक्रे ³ चैवम् ॥ ९ ॥
दिन घटिकांकितपृष्टे ³ व्यस्त न तज्याग्रोन्नंतज्या ⁴ ।
चदिग्मध्ये ¹ च शलाकातच्छायाग्रं ² न तानाड्यः ॥ १० ॥
८. (घ) १. दृष्ट (ग) छायादृष्ट for (छादृष्ट) २. समानयत for (समानयतः)
(ग) ३. मध्यादिनोन्नतांशै for (मघ्यादिनोन्नतांशै)
४. नाडी for (नाड्यो) ५. तुल्यायै for (तुल्याये)
६. मूर्षास्त for (सूर्यास्त) (वि०-इसकी श्लोक संख्या ११ है)
(च) १. छादृष्ट for (छादृष्ट) २. युतः for (यतः)
(ङ) ३. मध्यदिवसोन्नतांशै for (मध्यादिनोन्नतांशै)
४. नाडीवंदन्ति for (नाड्योवदन्ति) ६. ते मूर्खास् for (ते सूर्यास्)
१. तच्छाया इष्ट for (तच्छादृष्ट)
९. (घ) १. न्रतो (ग) नतेन्नत for (नतोन्नत) २. स्तुर्या (ग) स्तुर्ये for (सूर्ये)
३. चक्रके (ङ) for (चक्रे)
(ग) ४. प्रकल्प्यग्रो for (परिकल्पाप्ता)
५. अनुपातातात्कार्या for (अनुपातात्तत्कार्या)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या १२ है)
(च) १. न्तोन्नतत्रिज्या for (नतोन्नतत्रिज्या) २. स्तुर्यगोलके for (सूर्यगोलके)
(ङ) ६. जीवां स्वाहोरात्रे for (जीवास्वाहोरात्रं)
४. (परिकल्याप्ता) for (परिकल्पाप्ता)
१. न्रतोन्नतविज्याः for (नतोन्नतत्रिज्या)
२. कार्यास्तुर्यगोलके for (कार्या सूर्यगोलके)
१०. (घ) १. (च) (वि०-पहली पंक्ति का अंतिम पद) (ङ)
२. 'दिग्मध्ये' से आरम्भ (ग) दिनमध्ये for (दिग्मध्ये)
(ग) ३. पृष्टि for (पृष्टे) ४. व्यस्तनज्याग्र for (व्यस्तनतज्याग्रो)
५. उन्नतज्या च for (न्नोन्नतज्या) ६. शिलाका for (शलाका)
७. यान्नता नाड्यः for (ग्रं नतानाड्यः)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या १३ है)
(ङ) ३. षटे for (पृष्टे)
५. प्रमुन्नतज्या for (न्नोन्नतज्या) ७. तच्छायाग्रान्नता for (तच्छायाग्रंनता)