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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

About this granth

Bisaldev Raso (बीसलदेव रासो) is a poem by Narapati Nalha and one of the much-discussed early works of Hindi and old Rajasthani literature. Its hero is the Chauhan king Bisaldev of Sambhar and Ajmer, usually identified with a Vigraharaja; both its date and its linguistic affiliation have been debated by scholars.

It is a poem of separation more than of war. Bisaldev marries Rajmati, daughter of King Bhoja of Malwa; stung by a remark of hers, he leaves for Orissa, and for twelve years Rajmati sends him messages in her longing until he returns and they are reunited. Her laments, arranged through the months of the year, are its most remembered passages.

This scan is of the critical edition by Dr. Tarak Nath Agrawal. His foreword explains that although Satyajivan Varma's edition already existed, Suniti Kumar Chatterji and Sukumar Sen asked him to prepare a new text from all available manuscripts and printed editions. A note of appreciation by Sukumar Sen, dated 7 May 1962, opens the book. It has 315 pages.

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  • १२ -
    होगा । अस्तु, इसकी भाषा भी संवत् १२६१ से पहले की है, इसमें सन्देह
    नहीं । बीसलदेव रासो की भाषा जैसा कि ऊपर उदाहरणों द्वारा दर्शाया गया
    है "अपभ्रंश व्याकरण" और "प्रबन्ध चिन्तामणि" में उद्धृत उदाहरणों की
    भाषा से बहुत अंशों में मिलती जुलती है । भाषा के उपर्युक्त आधार पर निर्भर
    होकर ऐसा कहा जा सकता है कि बीसलदेव की रचना ग्यारहवीं शताब्दी के उत्त-
    रार्द्ध और १२ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुई होगी। लेकिन भाषा के आधार पर
    उपर्युक्त निर्णय करने में डा० उदयनारायण जी तिवारी द्वारा निकाला गया यह
    निष्कर्ष कि चूँकि नाल्ह न तो भाषा का पण्डित था और न कोई सुकवि, अतएव
    उसने अपनी मातृ भाषा राजस्थानी में बीसलदेव रासो की रचना की, बाधा
    उपस्थित करता है, यद्यपि डा० तिवारी का यहाँ "राजस्थानी" कहना अस्पष्ट
    है, क्योंकि इसके द्वारा उनका संकेत किस ओर है, इसका ठीक ठीक पता नहीं
    चलता । यदि डा० तिवारी का उद्देश्य 'राजस्थानी' से शौरसेनी अपभ्रंश से
    हो, तब तो उपर्युक्त निकाले गये निष्कर्ष से उनका मन्तव्य सिद्ध होता है, और
    यदि उनका अर्थ राजस्थानी से पूर्वी और पश्चिमी राजस्थान की बोलियों से है
    तब यह विचार करना होगा कि ये बोलियाँ कब से राजस्थान में प्रचलित हुईं ।
    इन बोलियों के सम्बन्ध में डा० सुनीतिकुमार जी चाटुर्ज्या का कहना है कि पुरानी
    पश्चिमी राजस्थानी साहित्य 'अर्थात् पुरानी मारवाड़ी, गुजराती साहित्य' का
    इतिहास ई० चौदहवीं सदी के द्वितीयार्द्ध से शुरू हुआ, मारवाड़ और गुजरात
    में प्रचलित मौखिक अपभ्रंश से, 'जो शौरसेनी से निकट सम्बद्ध होती हुई भी
    उसे स्वतन्त्र अपभ्रंश थी ऐसा अनुमित होता है-इसे हम "सौराष्ट्र अपभ्रंश"
    कह सकते हैं । पुरानी पश्चिमी राजस्थानी का उद्भव, तेस्सीतोरी के मतानुसार,
    ईस्वी तेरहवीं शती में हुआ था । गुजरात और मारवाड़ के जैन आचार्य
    और पण्डितों के द्वारा सौराष्ट्र अपभ्रंश से उद्भूत पुरानी राजस्थानी में
    साहित्य सर्जना होने लगी, पर साथ ही साथ शौरसेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा
    में पूर्ववत् काव्यादि साहित्यिक रचना की नीति अन्वाहित रही । फिर, यह शौर-
    सेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा, पूर्व से बढ़ती गयी, इसका एक नवीन या
    अर्वाचीन रूप, पिंगल नाम से, राजस्थान और मालव के कवियों में पूर्णतया
    गृहीत हुई, पिंगल का एक साहित्य बन गया। फिर राजपूताने के भाट और
    चारणों ने पिंगल की अनुकारी एक नई कवि भाषा मारवाड़ी के आधार पर
    बनाई, जो "डांगल" या 'डिंगल' नाम से अब परिचित है। डिंगल काव्य ईस्वी
    पन्द्रहवीं शती से उपलब्ध है। ज्यादातर इसकी शब्दावली साहित्यिक थी,
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३ - ३३ -
अर्थात् प्रचलित मौखिक मारवाड़ी की शब्दावली से पृथक् होती थी ।१
प्रसिद्ध विद्वान् तेस्सीतोरी और डा० चाटुर्ज्या का उपर्युक्त मत यह सिद्ध
करता है कि मारवाड़ और गुजरात में प्रचलित मौखिक अपभ्रंश से राजस्थानी
का उदय तेरहवीं शती में हुआ था । अर्थात् इसके पहले वहाँ की बोलचाल की
भाषा अपभ्रंश थी । तथा अपभ्रंश के बाद "पिंगल" और तब डिंगल का स्थान
आता है । आज के प्राप्त इस ग्रंथ की प्रतियों में निस्सन्देह डिंगल और पिंगल
भाषा की बहुलता है, क्योंकि १५ वीं शती के पश्चात् की ही ये सभी प्रतियाँ
हैं लेकिन इन प्रतियों में अपभ्रंश संज्ञाओं और क्रियाओं का प्रयोग तो स्पष्ट
सिद्ध करता है कि इस काव्य की रचना अति प्राचीन अर्थात् १२ वीं शती की थी
और स्मरण के आधार पर लिखित होने के कारण केवल थोड़े बहुत शब्दों और
क्रियाओं का ही प्रयोग लेखबद्ध करते समय किया जा सका । तथा इस कथन में
भी अत्युक्ति न होगी कि इस ग्रन्थ की रचना आजकल की राजस्थानी में नहीं
हुई थी, जैसा कि डा० उदयनारायण जी तिवारी का विचार है, यदि उन्होंने सच-
मुच राजस्थानी शब्द का प्रयोग आज की राजस्थानी के लिए किया हो ।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रचना-तिथि पर विचार करते हुए डा० रामकुमार
वर्मा ने सं० १००३ को इतिहास के निकट माना है और अपने मत की पुष्टि
में इतिहास के प्रमाण दिये हैं ।२ ( लेकिन राजा भोज और बीसलदेव के समय
को देते हुए भी वे यह कहना भूल गये कि किस बीसलदेव की चर्चा वे कर रहे
हैं, क्योंकि इतिहास में बीसलदेव चार हो चुके हैं । )
श्री सत्यजीवन वर्मा ने सं० १२१२ को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ठीक सम-
झते हुए कहा है कि "बीसलदेव" विग्रहराज चतुर्थ का दूसरा नाम है । बीसल-
देव के शिलालेख सं० १२१० और १२२० के प्राप्त हैं । अजमेर बसने के
पश्चात् केवल वही बीसलदेव हुआ है । यह अर्णोराज का पुत्र और जगदेव
का छोटा भाई था । यह अपने बड़े भाई जगदेव के जीते जी उससे राज छीन
कर गद्दी पर बैठा था । इसको विद्या से बड़ा प्रेम था । इसका रचा हुआ हर-
केलिनाटक है । यह नाटक वि० सं० १२१० ( सन् ११५३ ) की माघ शुक्ला
१. राजस्थानी भाषा...डा० सुनीति कुमार चाटुर्ज्या...पृ० ६५ ।
२. हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास—पृ० २६८-१० ।

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  • १४ -

पद्धती को समाप्त हुआ था। यह सन् ईसय् में खुदाई करने पर प्राप्त हुआ
है। इसी स्थान में बीसलदेव द्वारा स्थापित पाठशाला थी। दिल्ली के प्रसिद्ध
फीरोज शाह की लाट पर वि० स० १२२० वैशाख शुक्ला १५ का इसका एक
लेख भी है। इत्यादि ।¹
श्री सत्यजीवन जी वर्मा ने १६६१ की लिखी हुई प्रति के आधार पर ही
अपना यह मत प्रकट किया है। उस प्रति में "बारह सै बहोत्तराहां मझारि" का
ही उल्लेख है। जब यह प्रति श्री वर्मा जी द्वारा सम्पादित हुई थी तब तक वही
प्राचीनतम प्रति मानी जाती थी। अतः श्री वर्माजी के लिये यह स्वाभाविक था
कि वे इसमें दिये हुए रचना काल को ही ठीक मानें और उसकी पुष्टि में प्रमाण
दें। लेकिन उनके लिए भी अच्छा यह होता कि वे अन्य प्रतियों की तिथियों पर
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विचार कर लेते और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अपना
मूल्यवान विचार उपस्थित करते हुए प्राप्य तिथि की गणना भी कर लेते।
डा० उदयनारायण जी तिवारी ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रचना तिथि
पर विचार करते हुए कहा है कि यदि बीसलदेव को विग्रहराज चतुर्थ मान
लिया जाय तो राजमती से उसके विवाह की कथा इतिहास के विरुद्ध ठहरती
है। राजमती को बीसलदेव रासो में भोज की पुत्री कहा गया है और भोज
का समय लगभग सं० १११२ के आस पास था। बीसलदेव चतुर्थ का समय
सं० १२०७ से १२२० तक का माना गया है। इस प्रकार सौ वर्ष पूर्व के किसी
व्यक्ति की पुत्री से विवाह होने की कथा बड़ी असङ्गत होगी।² इस आधार पर
बीसलदेव रासो का नायक बीसलदेव चतुर्थ नहीं ठहरता। बीसलदेव तृतीय के
पक्ष में बिजोलियाँ के शिलालेख का प्रमाण, जिसमें चौहानों की वंशावली दी
गयी है तथा जिसमें विग्रहराज तृतीय की रानी का नाम राजदेवी दिया गया
है, और अन्य शिलालेखों के प्रमाण, जिसके अनुसार भोज के भाई उदयादित्य
का विग्रहराज तृतीय का समकालीन होना सिद्ध होता है, तथा भोज की पुत्री
राजदेवी अथवा राजमती का विवाह बीसलदेव तृतीय से होने की सम्भावना
सिद्ध होती है, डा० उदयनारायण जी तिवारी देते हैं।³ विग्रहराज तृतीय का
समय डा० उदयनारायण जी तिवारी ने स० ११५० वि० माना है। और ग्रंथ

१. बीसलदेव रासो—पृ० ६-७।
२. वीर काव्य—पृ० १६३।
३. वीर काव्य—पृ० १६४।

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[Header] - ३५ -

की रचना तिथि सं० १२०२ वि० मानते हैं। (इस प्रकार लगभग १२५ वर्ष
पश्चात् इस ग्रंथ की रचना के सम्बन्ध में उनका विचार है कि इस ग्रन्थ को
छन्दोबद्ध करने वाले कवि नरपति नाल्ह को केवल इतना ही ज्ञात था कि किसी
भोज की पुत्री राजमती के साथ बीसलदेव का विवाह हुआ था। उसी के आधार
पर उसने अनेक कल्पनात्मक नामों तथा घटनाओं का मिश्रण करके लोकरंजनार्थ
एक काव्य गाने योग्य तैयार कर दिया । यह विवाह कब हुआ था, इसका
उसको ठीक-ठीक पता न था, इसलिए राजमती के पिता के नाते, भोज के जीवन-
काल में ही विवाह हो जाने का उसने वर्णन कर दिया है।¹
डा० माताप्रसाद गुप्त ने स्थूल रूप से ग्रंथ के रचना-काल के विषय में
विचार करते हुए इसके ऐतिहासिक तथ्यों का विवेचन किया है। बीसलदेव
तृतीय या चतुर्थ अजमेर की स्थापना, भोज द्वारा मगेवा, सोरठ, टॉक आदि
कई प्रान्तों को बीसलदेव को दिये जाने की बात तथा बीसलदेव के उड़ीसा
यात्रा की कथा का ऐतिहासिक विश्लेषण करते हुए डा० गुप्त इस निष्कर्ष पर
पहुँचते हैं कि विग्रहराज तृतीय की रानी का नाम राजदेवी था। उसी के
सम्बन्ध में राजमती नाम से कुछ कहानियाँ समय पाकर प्रसिद्ध हो गई । फिर
भोज परमार आदि से उसे सम्बन्धित कर विग्रहराज तृतीय के बहुत बाद किसी
नरपति नाल्ह नामक कवि ने इस ग्रन्थ की रचना कर डाली ।²
प० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने ग्रन्थ के ऐतिहासिक तथ्यों का विशेष
रूप से विश्लेषण किया है। वे कहते हैं कि "बीसलदेव रासो में कवि ने मुख्यतया
दो घटनाओं का वर्णन किया है-एक तो बीसलदेव के राजाभोज की पुत्री से
विवाह होने की और दूसरा उसके (बीसलदेव) उड़ीसा जाने की। जहाँ तक
पहली घटना का सम्बन्ध है, बीज रूप में उसमें सत्य का अंश अवश्य है,
परन्तु शेष कथा कल्पित ही प्रतीत होती है। अपने इस कथन की पुष्टि में
उन्होंने कहा है कि 'बिजोल्यां के शिलालेख में दी हुई चौहानों की वंशावली
में विग्रहराज तृतीय की रानी का नाम राजदेवी दिया है। बीसलदेव रासो की
राजमती और यह राजदेवी नाम एक ही रानी के सूचक होने चाहिये ।" चौहान
राजा बीसलदेव तृतीय से परमार वंशीय राजकुमारी राजदेवी राजा भोज की
पुत्री के विवाह के सम्बन्ध में अपना अनुमान प्रकट करते हुए श्री ओझा कहते

१ वीर काव्य—पृ० १६४ ।
२. बीसलदेव रास—पृ० ५५ ।

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  • ३६ -

हैं कि राजा भोज के कनिष्ठ भ्राता उदयादित्य ने सम्भव है अपना पुराना वैर
मिटाने के लिए अपनी भतीजी भोज की पुत्री राजदेवी अथवा राजमती का विवाह
बीसलदेव तृतीय से किया हो; क्योंकि राजपूतों में आपस के वैर प्रायः
पुत्री विवाहने से मिट जाते थे, जिसके अनेक उदाहरण उनके इतिहास में
मिलते हैं'।"
इसके अतिरिक्त डा० ओझा ने शिलालेखों का प्रमाण देते हुए यह सिद्ध
किया है कि विग्रहराज बीसलदेव तृतीय परमार-राजा भोज के भाई उदयादित्य
का समकालीन था, जो वि० सं० १११६ के आस पास गद्दी पर बैठा था।१
इन्हीं ऐतिहासिक सत्यों के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बीसल-
देव रासो का नायक चौहान राजा—बीसलदेव तृतीय है और इसका रचना-काल
कार्तिक वि० सं० १२०२ चैत्रादि १२०३ होना चाहिए।
आचार्य रामचन्द्र जी शुक्ल कहते हैं कि "दिये हुए सं० के विचार से कवि
अपने नायक का समसामयिक जान पड़ता है। पर वर्णित घटनाएँ, विचार करने
पर बीसलदेव के बहुत पीछे की जान पड़ती हैं, जब कि उनके सम्बन्ध में कल्पना
की गुंजाइश हुई होगी। यह घटनात्मक काव्य नहीं है, वर्णनात्मक है। इसमें
दो ही घटनाएँ हैं—बीसलदेव का विवाह और उनका उड़ीसा जाना। इनमें से
पहली बात तो कल्पना प्रसूत प्रतीत होती है। बीसलदेव से १०० वर्ष पहले
ही धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज का देहान्त हो चुका था। अतः उनकी
कन्या के साथ बीसलदेव का विवाह किसी पीछे के कवि की कल्पना ही प्रतीत
होती है। उस समय मालवा में भोज नाम का कोई राजा नहीं था। बीसल-
देव की एक परमार वंश की रानी थी, यह बात परम्परा से अवश्य प्रसिद्ध
चली आती थी, क्योंकि इसका उल्लेख पृथ्वीराजरासो में भी है। इसी बात
को लेकर पुस्तक में भोज का नाम रखा हुआ जान पड़ता है। अथवा यह हो
सकता है कि धार के परमारों की उपाधि ही भोज रही हो और उस आधार
पर कवि ने केवल यह उपाधि-सूचक नाम ही दिया हो, असली नाम न दिया
हो। कदाचित् इन्हीं में से किसी की कन्या के साथ बीसलदेव का विवाह हुआ
हो। परमार कन्या के सम्बन्ध में कई स्थानों पर जो वाक्य आये हैं, उन पर ध्यान
देने से यह सिद्धान्त पुष्ट होता है कि राजा भोज का नाम कहीं पीछे से न
१. नागरी प्रचारिणी पत्रिका सन् १९६७—पृ० १६६-६८
२. ” ” ” १६६

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  • ३७ -
    मिलाया गया हो । जैसे "जनमी गोरी तू जेसलमेर" : 'गोरड़ी जेसलमेर की' ।
    आबू के परमार भी राजपूताने में फैले हुए थे । अतः राजमती का उनमें से
    किसी सरदार की कन्या होना सम्भव है । पर भोज के अतिरिक्त और भी नाम
    इसी प्रकार जोड़े हुए मिलते हैं । जैसे—माघ, भवराज, कवि कालिदास ।
    जैसा पहले कह आये हैं, अजमेर के चौहान बीसलदेव ( विग्रहराज चतुर्थ )
    बड़े वीर और प्रतापी थे और उन्होंने मुसलमानों के विरुद्ध कई चढ़ाइयाँ की
    थीं और कई प्रदेशों को मुसलमानों से खाली कराया था । दिल्ली और हाँसी
    के प्रदेश इन्होंने अपने राज्य में मिलाये थे । इनके वीर चरित का बहुत कुछ
    वर्णन इनके राजकवि सोमदेव रचित "ललित विग्रह-राज" ( संस्कृत ) में है,
    जिसका कुछ अंश बड़ी-बड़ी शिलाओं पर खुदा हुआ मिलता है और राजपूताना
    म्यूजियम में सुरक्षित है । पर नाहड़ के इस बीसलदेव रासो में, जैसा कि
    होना चाहिए था, न तो उक्त वीर राजा की ऐतिहासिक चढ़ाइयों का वर्णन है,
    न उसके शौर्य-पराक्रम का । शृङ्गार रस की दृष्टि से विवाह और रूठकर विदेश
    जाने का ( प्रोषित पतिका के वर्णन के लिए ) मनमाना वर्णन है । अतः इस
    छोटी-सी पुस्तक को बीसलदेव जैसे वीर का "रासो" कहना खटकता है । पर हम
    देखते हैं कि यह कोई काव्य ग्रंथ नहीं केवल गाने के लिए रचा गया था, तो
    बहुत कुछ समाधान हो जाता है ।"
    डा० श्यामसुन्दर दास का मत है कि "विग्रहराज के विषय में दो और
    शिलालेखों का पता लगा है । पहिले पर तो सोमेश्वरदेव का बनाया हुआ एक
    नाटक खुदा है जिसमें वसन्तपाल की कन्या के साथ राजा विग्रहराज की प्रेम-
    केलि और मुसलमानों के विरुद्ध राजा के युद्धों का वर्णन है । दूसरे पर भी
    एक नाटक है जिसके रचयिता स्वयं विग्रहराज हैं । इस दूसरे शिलालेख पर
    संवत् १२१० ( ११५३ ई० ) खुदा है । इनसे अब यह स्पष्ट सिद्ध हो गया
    कि महाराज विग्रहराज का राज्यकाल १२ वीं शताब्दी के मध्य में हुआ ।
    सोमेश्वर राज के समय का एक शिलालेख मेवाड़ में मिला है जिसमें
    लिखा है कि विग्रहराज अर्णवराज का पुत्र था और 'तस्य ज्येष्ठ भ्रातृपुत्रः पृथ्वी-
    राजः' था तथा "ज्येष्ठ भ्रातृ" का नाम आगे चलकर सोमेश्वर दिया है । बीसल-
    देव का नाम भी इस लेख में दिया है । पर विग्रह-राज से तीन पीढ़ी पहिले
    १. हिन्दी साहित्य का इतिहास-पृ० ३४-३५ । सं० २००३ ।
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  • १८ -
    हैं। अतएव यह सिद्ध होता है कि विग्रहराज और बीसलदेव एक ही पुरुष
    नहीं थे।
    इसके अतिरिक्त पृथ्वीराजरासा में लिखा है कि जिस समय बीसलदेव गुज-
    रात के चालुक्य राजा से लड़ने गये तो राजा भोज का लड़का उदयादित्य उनके
    साथ था। बीसलदेव रासो के अनुसार बीसलदेव ने भोज परमार की कन्या से
    विवाह किया था और इस भोज का समय डा० राजेन्द्र लाल मित्र के अनुसार
    सन् १०२१-१०८३ के बीच में होता है—पृथ्वीराजरासो से यह पता चलता है
    कि बीसलदेव की एक प्रमार वंशीय रानी थी, क्योंकि आदि पर्व में यह दोहा
    मिलता है :-
    ऊँच धाम बिसराम किय रहा बाल चतुरङ्ग।
    क्रीड़ा महल पधौर संवे पदिय सुकथा प्रमङ्ग॥
    चन्द बीसलदेव का समय संवत् ८२१ देता है (पण्ड्या जी के सम्मत्
    विक्रम संवत् के अनुसार यह ६११ होगा) और यह लिखा है कि बीसलदेव ने ६४
    वर्ष राज्य किया था। अतएव इस गणना के अनुसार बीसलदेव की मृत्यु का
    संवत् ९७५ (९१९ ई०) होगा जबकि राजा भोज और उसके पुत्र उदयादित्य
    का जन्म भी नहीं हुआ था; परन्तु ऐसा जान पड़ता है कि लेख के भ्रम से यह
    संवत् ८२१ अशुद्ध छपा है क्योंकि एक-दूसरे स्थान पर चन्द चालुक्य राज पर
    बीसलदेव की चढ़ाई और गुजरात विजय का समय ९८६ बताता है। इसलिए
    ऐसा जान पड़ता है कि बीसलदेव का समय ८२१ न होकर ९२१ होगा। यह
    समय (६२१-९१+६४ = १०७६ या १०२० ई०) भोज और उसके पुत्र
    उदयादित्य से भी ठीक ठीक मिल जाता है और इन दोनों का समकालीन होना
    सम्भवत सिद्ध हो जाता है। पण्डित मोहनलाल विष्णुलाल जी पंड्या का
    कथन है कि राजपूताने की ख्यातियों में १२१ के स्थान पर ६३१ मिलता है।
    यदि यह संवत् ठीक है तो बीसलदेव का समय १०१० मानना चाहिए।
    इतिहास में बीसलदेव का नाम इसलिए प्रसिद्ध है कि उसने कई बार
    मुसलमानों के विरुद्ध लड़ाई ठानी थी और एक बार उन्हें पुन' भारतवर्ष से
    निकालने में वह सफल मनोरथ हुआ था। इससे उसी युद्ध का आशय है जो राज-
    पूताने के राजाओं ने मुहम्मद गज़नवी (६६०-१०३०) के विरुद्ध ठाना था
    और जिसमें ये कृतकार्य हुए थे। जो बातें ऊपर कही गयी हैं इनसे यही सिद्ध
    होता है कि बीसलदेव बारहवीं शती में नहीं हुआ परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी के
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  • ३५ -
    प्रथम अङ्क' भाग में। फीरोजशाह की लाट पर जो लेख है उसके विषय में
    मेरा यह सिद्धान्त है कि यह बीसलदेव ही से कोई स्पष्ट सम्बन्ध नहीं रखता ।
    वरन् उसके नाम का उल्लेख उसमें इसलिए किया गया है कि वह विग्रहराज
    के प्रतापी और प्रसिद्ध पुरखाओं में से था । चौहानों के इतिहास में बीसलदेव
    का नाम निजदेश के हितार्थ अनेक साहसपूर्ण कार्यों के लिये अत्यन्त प्रसिद्ध है।
    जो दिल्ली न जीत सका उसने समझा हो कि यदि अपने नाम के साथ बीसलदेव
    के नाम का उल्लेख हो तो जो कालिमा मेरे यश में लग गई है वह दूर हो
    जाय । इसी कारण इन दोनों का नाम उस शिलालेख पर है। इससे बीसल-
    देव और विग्रहराज को एक ही पुरुष मानना कदापि उचित नहीं जान पड़ता ।"१
    श्री रामनारायण जी दूगड़ ने अपना विचार इस सम्बन्ध में यों प्रकट
    किया है :-
    बीसलदेव रासो के विषय में अपनी सम्मति प्रकट करने के पूर्व में बाबू
    श्यामसुन्दर दास जी के मन्तव्य पर कुछ कहूँगा । उक्त बाबूजी का पृथ्वीराज
    रासो के बीसलदेव, ललित विग्रह राज नाटक के नायक और फीरोजशाह की
    लाट के लेख वाले बीसलदेव तथा राजमति के पति बीसल को एक ही पुरुष
    मान लेना सर्वथा अयुक्त है। उन्होंने टाड राजस्थान के अनुसार रासो वाले
    बीसलदेव का पृथ्वीराज से ६ पीढ़ी पहिले होना लिखकर उस बीसलदेव के
    समय को, बीसलदेव रासो के बीसल से मिलाने का परिश्रम उठाया है। यही
    कारण है कि अन्त में उन्हें लाट पर के लेख वाले विग्रहराज और बीसलदेव
    जुदा-जुदा पुरुष ठहराने पड़े । यदि उक्त बाबू साहब को यह मालूम होता कि
    चन्द के रासो और टाड साहब की दी हुई चहुवाणों की वंशावली बिल्कुल रद्दी
    है और विग्रहराज या बीसलदेव नाम के चार राजा चहुवाणों में हुए हैं तो वे
    कदापि ऐसा न लिखते ।
    पहिला विग्रहराज या बीसलदेव चहुवाणों के मूल पुरुष चापमान या चाह-
    मान से पाँचवीं पीढ़ी में हुआ ।
    दूसरा विग्रहराज ( पृथ्वीराज रासो का बीसलदेव ) सिंहराज का पुत्र था,
    जिसने अणहिल वाड़े के राजा मूलराज सोलंखी को जीतकर वहाँ बीसलपुर
    नाम का नगर बसाया । पृथ्वीराज रासो में इस बीसलदेव को आनन्ददेव ( अर्णो-
    राज ) का दादा कहकर सं० ९८६ वि० तक १६२ वर्ष अजमेर में उसका राज
    १. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, सन् १६०१, पाँचवाँ भाग, पृ० १४१-१४४ ।
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करता मिलता है। परन्तु वास्तव में यह विग्रहराज या बीसलदेव सं० १०३०
वि० में राज करता था।^1
बाबू श्यामसुन्दरदास जी ने अनन्द सम्वत् संवत् की कल्पना के सहारे से
पृथ्वीराज रासो में दिये हुए सं० में इस बीसलदेव का समय मिलाने का यत्न
किया है^2 इस बीसलदेव का मालवे परमार राजा भोजदेव का तो नहीं किन्तु
उसके पिता सिन्धुराज का समकालीन होना सम्भव है, क्योंकि भोजदेव सं०
१०८० वि० में कुछ पहिले गद्दी पर बैठा था और सं० १११५ या १११६ के
लगभग मृत्यु को प्राप्त हुआ या मारा गया। बीसलदेव भोज से पहले मर चुका हो
क्योंकि पृथ्वीराज विजय नाम की पुस्तक और शिला लेखों में दी हुई चौहानों
की वंशावली के अनुसार सिंहराज के विग्रहराज या बीसलदेव, दुर्लभराज, चन्द्र-
राज और गोविन्दराज नाम के पुत्र थे। वास्तव के पीछे दुर्लभ और उसका भाई
गोविन्दराज राजा हुआ। गोविन्दराज के पीछे वाक्पतिराज दूसरा और फिर
उसके छोटे भाई वीर्यराम की बारी आई। यह वीर्यराम अवन्ती के राजा भोज
के हाथ से मारा गया था। वीर्यराम का उत्तराधिकारी दुर्लभराज तीसरा मालवे के
राजा उदयादित्य का, 'जिसके लिये लेखों में भोजदेव का सम्बन्धी होना लिखा के
हैं,' समकालीन था, जिसने स० ११५१ वि० के निकट तक राज किया।
तीसरा विग्रहराज या बीसलदेव दुर्लभराज तीसरे का भाई था जिसका राज
सं० ११५१७२ वि० के बीच में होना चाहिए। इसके लिए बिजोल्यां की प्रशस्ति
में लिखी है कि धी चण्डी रनिषेति शण सुचर धी सिंहटो घूम्रखस्तद् भ्राता यत
सोपि वीसल नृपः धी राजदेवी प्रियः । अर्थात् यही वीसलराज राजमती का पति
था। परन्तु यह नहीं कह सकते कि राजदेवी मालवे के राजा भोजदेव ही की
कन्या थी।
चौथा विग्रहराज या बीसलदेव बिजोल्यां की प्रशस्ति' में इसका नाम वीसल
दिया है। 'अर्णोराज' 'आनल्ल देव' का पुत्र और सोमेश्वर का बड़ा भाई था


1 Epigraphia Indica vol II P 119 हर्षनाथ के मंदिर का शीला-
घटी प्रान्त में लेख।
२ — अनन्द सम्वत् संवत् की कल्पना मोहनलालजी विष्णुलालजी पंड्या ने
की है लेकिन कोई प्रमाण नहीं मिलता। कहीं ६० और कहीं ९१ वर्ष पृथ्वी-
राज रासो में दिये हुए संवतों को शुद्ध ठहराने के लिए मिलाए हैं।
लेकिन इतने पर भी पृथ्वीराज के सब संवत् ठीक नहीं मिलते।

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  • ४१ -

जिसका लेख देहली में फीरोज़शाह की लाट पर है¹, उसकी मृत्यु सं० १२२०
वि० के लगभग होना उस लेख में पाया जाता है। इसी बीसलदेव या विग्रहराज
ने तँवरों से दिल्ली का राज लिया 'सं० १२०८ वि० के लगभग' और हिमालय
से विन्ध्याचल पर्यन्त देश विजय कर आर्यावर्त्त से म्लेच्छों का उच्छेद किया था।
यही 'ललित विग्रहराज' नाम के नाटक का नायक था।² इस बीसलदेव और
उसके लेख के विषय में जो अनुमान बाबू श्यामसुन्दरदास ने किया है, वह ठीक
नहीं है।
अब बीसलदेव रासो के विषय में यह कहा जा सकता है कि यदि यह ग्रंथ
किसी नरपति कवि ने शक सं० १२०२ या १२१० में लिखा हो तो रचयिता
ऊपर दिये हुए चारों बीसलदेवों में से किसी का भी समकालीन नहीं ठहरता।
ग्रन्थकार लिखता है कि भोजदेव ने अपनी कन्या का विवाह करने को पुरो-
हित भेजा, वह अजमेर, अयोध्या, दिल्ली और मथुरा गया परन्तु कोई राजा
उसके मन में न आया। आखिर अजमेर के बीसलदेव से उसने राजमती का विवाह
ठहराया। भाटियों की ख्याति के अनुसार जैसलमेर का नगर राजा जैसल ने
सं० १२१२ वि० में बसा कर अपनी राजधानी बनाया था। अतः सम्भव नहीं
कि भोजदेव का पुरोहित जो राव जैसल से करीब एक सौ वर्ष पहले मर चुका
था, जैसलमेर में जाता और यदि उसका जैसलमेर जाना मानें तो राजमती को
भोजदेव की कन्या नहीं मानना पड़ेगा। भोज राजा के समय में दिल्ली पर
अनंगपाल तँवर 'दूसरा' राज करता था, अयोध्या में शालवंशी राजाओं का राज-
भ्रष्ट होकर राठौड़ों का अधिकार शुरू हुआ था। मथुरा में उस समय कोई स्वतन्त्र
राजा का होना पाया नहीं जाता, यह शहर दिल्ली के अधीन था। फिरिश्तः
लिखता है कि (१०१७ ई० सं०) १००४ वि० में सुलतान महमूद गजनवी
मथुरा में गया जो किशन वासुदेव का शहर कहलाता है। दिल्ली के राजा ने
शहर की हिफ़ाजत के वास्ते फौज भेजी थी मगर वह शिकस्त खाकर भाग गई
और बीस दिन तक सुल्तान ने उस शहर को लूटा।³ साँभर में चौहानों का
राज भोजदेव से बहुत पहले होना पाया जाता है, चित्तौड़ का गढ़ आठर्वी


1 Indian Antiquary Vol 26 P 216-1860
२-एक ललित विग्रहराज नाटक कवि सोमदेव का बनाया हुआ और दूसरा हर-
केलि नाटक खास विग्रहराजजी का बनाया हुआ अजमेर के अढ़ाई दिन के
झोपड़े में मिला था।

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- ५३ -

शताब्दी (विक्रम की) के अन्त में तुर्किस्तान के बादशाहों से ले
लिया था जिस बात का इस पर पूरा अधिकार था कि वह बीसलदेव को देने से
इन्कार करता। अजमेर का शहर भोजदेव के बहुत पीछे बस कर चौहान राजाओं
की राजधानी हुआ था। संवत् १२२० वि० के लगभग वह--जब कि गुजरात
का चालुक्य राजा कुमारपाल, चौहान राजा अजयपाल का पीछा कर चढ़ गया
था—रघुवंशियों की राजधानी अजमेर नहीं थी क्योंकि प्रबन्धचिन्तामणि के कर्त्ता
मेरुतुंग ने अजयपाल को नागौर व शाकम्भरी का सपादलक्षीय राजा लिखा
था। इतना अवश्य है कि अजमेर का नगर अजयपाल के पिता अजयराज ने
उस समय बसा लिया था, इत्यादि सबूतों से स्पष्ट है कि बीसलदेव रासो
किसी बीसलदेव के समय में बना हुआ नहीं किन्तु पीछे से किसी ने लिख
दिया हो और आश्चर्य नहीं कि यह ग्रन्थ पृथ्वीराज रासो के पीछे बना हो क्योंकि
उसी के अनुसार बीसलदेव रासो में भी बीसलदेव को परमार और यादव कुल
की दो रानियाँ होनी लिखी हैं, और सिवा इसके कि राजा बीसलदेव ने राजा
भोज की कन्या राजमती से विवाह किया अन्य इतिहास-सम्बन्धी कोई बात
इसमें नहीं प्राप्त होती है। ग्रन्थ की पद रचना और भाषा के विषय में इस
समय तक ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता जबतक कि संपूर्ण ग्रन्थ न पढ़ा जाये।"
ऐतिहासिक तथ्यों पर विचार करते समय हमें यह देखना होगा कि जिन
दोनों रूपान्तरों को आधार मान कर सम्प्रति सम्पादन का कार्य किया गया है
उनमें कौन-कौन सी घटनाएँ दोनों में समान हैं। तथा कौन सी ऐसी घटना है
जो प्रथम रूपान्तर में है, द्वितीय में नहीं और द्वितीय में है प्रथम में नहीं।
विश्लेषण करने पर ऐसा होता है कि प्रथम रूपान्तर की प्रायः सभी घटनाएँ
द्वितीय रूपान्तर में पाई जाती हैं। तथा द्वितीय रूपान्तर में उनके अतिरिक्त
और भी अन्य घटनाओं का वर्णन है।
दोनों रूपान्तरों में समान रूप से पाई जाने वाली ऐतिहासिक घटनाओं में
से प्रथम और प्रमुख घटना है चौहान वंशीय बीसलदेव का धार के राजा पर-
मार वंशीय भोज की पुत्री राजमती के साथ विवाह का होना। इस घटना के
साथ ही साथ तत्सम्बन्धी कई एक प्रश्न उठ खड़े होते हैं। बीसलदेव से कवि
का तात्पर्य किस बीसलदेव से है क्योंकि इतिहास में चार बीसलदेव हो चुके हैं।
दूसरा प्रश्न राजा भोज का है क्योंकि इतिहास-प्रसिद्ध राजा भोज का समय कब
से कब तक था तथा समय स्थिर हो जाने के पश्चात् वह किस बीसलदेव का
समकालीन था, इत्यादि बातों पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। सुज्ञेय

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– ५३ –
प्रश्न उठता है कि क्या इतिहास में कहीं भी राजमती का उल्लेख बीसलदेव की
पत्नी के रूप में हुआ है ? अथवा राजमती का उल्लेख राजा भोज का पुत्री
कह कर कहीं हुआ है ?
उपर्युक्त ऐतिहासिक गुत्थियों को सुलझाने के लिये आवश्यक यह होगा कि
हम चौहानों और परमारों के वंश-वृक्ष को देखकर यह निर्णय करें कि राजा
भोज का समय कब से कब तक था और इनके समय में चार बीसलदेवों में से
कौन बीसलदेव वर्त्तमान था । राजा भोज का समय इतिहासकारों ने प्रस्तर लेखों,
दान पत्रों और प्रशस्तियों १ के आधार पर वि० सं० १०७६ से ११०३ ( ई०
सन् १०२० से १०५२ ) माना है । राजा भोज के काल में चार बीसलदेवों में से
कौन-से बीसलदेव वर्त्तमान थे, इसका समाधान चौहान राजाओं के वंश वृक्ष के
अध्ययन से सम्भव है । लेकिन इन चार बीसलदेवों के काल का निर्णय करने के
पहले डा० श्यामसुन्दर दास द्वारा उठाये गये इस प्रश्न का भी समाधान
आवश्यक है, कि “विग्रहराज और बीसलदेव एक ही पुरुष नहीं थे ।” उनकी यह
शंका निर्मूल सिद्ध हो जाती है दिल्ली के फिरोज़ शाह की लाट पर खुदी हुई
निम्न वार्ता से, जहाँ बीसलदेव और विग्रहराज को एक ही व्यक्ति माना गया है:–
आर्यावर्त्त यथार्थं पुनरपि कृतवानम्लेच्छ-विच्छेदनाभि-
र्देवः शाकंभरी या जगति विजयते बीसलक्षोणिपालः ।
ब्रूते संप्रति चाहमान-तिलक शाकंभरी भूपतिः
श्री मद्दिग्रहराज एष विजयी सन्तानजानात्मनः ॥१॥
संभव है कि डा० श्यामसुन्दरदास ने उपर्युक्त शंका इस कारण उठाई हो
कि फिरोज़शाह की लाट पर खुदी हुई यह बात केवल विग्रहराज चतुर्थ के
सम्बन्ध में है। इसमें संदेह नहीं कि इतिहास में विग्रहराज प्रथम और द्वितीय
१. ( क ) बांसवाड़ा का दान-पत्र—यह किसी ठठेरा की विधवा पत्नी के
पास दक्षिणी राजपूताने में पाया गया था और इस पर भोजदेव के हस्ताक्षर के
साथ सं० १०७६ भान सु० ५ अंकित है ।
( ख ) बेतमा का दान-पत्र—यह मध्य भारत में इन्दौर से पश्चिम १६
मील की दूरी पर बेतमा ग्राम में पाया गया था । इसमें राजा भोज के किसी
ब्राह्मण को कंकन विजय के अवसर पर एक गांव देने का उल्लेख है । इसकी
तिथि वि० १०७६ को मागो सु० १५ है ( ई० सन् १०२० सितम्बर ) ।

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  • ४४ -

के लिये 'वीसलदेव' का व्यवहार नहीं मिलता । लेकिन विग्रहराज तृतीय को
हम्मीर महाकाव्य में "वीसल" और चतुर्थ को सेवालिड तथा धोहारी गाँव के
शिलालेखों में "वीसल" कहा गया है ।
चौहानों के वंश वृक्ष के अनुसार बीसलदेव द्वितीय (विग्रहराज) का,
जिसने गुजरात के सोलंकी राजा पर चढ़ाई की थी, वि० सं० १०३० में विद्य-
मान होना मिलता है । यह वीसलदेव (विग्रहराज) प्रथम विग्रहराज से दस
पीढ़ी बाद तथा चौहान राजाओं की तेरहवीं पीढ़ी में आता है। इसके द्वितीय
भ्राता का नाम दुर्लभराज द्वितीय था तथा इसके पिता का नाम सिंहराज था ।
इसको कोई पुत्र न हुआ । इसके भाई के वंश में विग्रहराज तृतीय हुआ ।
इसका समय कब से कब तक था, यह इतिहास में स्पष्ट नहीं है । और इसी
का वंशज विग्रहराज चतुर्थ हुआ, जिसका समय लगभग सं० १२१० से १२२१
था ।¹ विग्रहराज द्वितीय और विग्रहराज चतुर्थ के बीच जिनका समय हमें इतिहास
में मिलता है, १८० वर्षों का अन्तर पड़ता है। और इन दोनों के राज्यकाल
( ग ) उज्जैन का दान पत्र—यह दान-पत्र एक किसान ने द्वारा उज्जैन में
नागझरी नामक झरने के पास जमीन खोदते हुए प्राप्त किया गया था । इस
दान-पत्र के अनुसार राजा भोज ने किसी ब्राह्मण को एक गाँव दान किया है ।
इसकी तिथि दान-पत्र के ३० वीं और ३१ वीं पंक्ति में वि० सं० १०७८ ( ई०
स० १०२२) है ।
( घ ) देपालपुर का दान-पत्र—यह दान-पत्र इन्दौर से २४ मील दूर देपाल-
पुर में पाया गया था । दान-पत्र की तिथि वि० सं० १०७६ चैत्र शुक्ल १४
( ई० सन् १०२२) है ।
( च ) यशोवर्मा का पत्र—बाम्बे प्रान्त के नासिक जिले के "कालवन"
ग्राम में प्राप्त । इसमें किसी संवत् का उल्लेख नहीं है ।
( छ ) ब्रिटिश अजायब घर की मूर्ति का लेख—सरस्वती की एक मूर्ति है
जिसके पाद्-स्थल में लिखा हुआ है, राजा भोज के राज्य वि० सं० १०६१ में
बनी हुई ।
( झ ) तिलकवाड़ा का दान-पत्र—यह दान पत्र बड़ौदा राज्य के तिलक-
वाडा के पास नर्मदा नदी के किनारे प्राप्त हुआ था ।
दे० डाइनैस्टिक हिस्ट्री आफ़ नदर्न इण्डिया—डा० एच० सी० राय। भाग
द्वितीय—पृ० ८६१ ।
१. वंश वृक्ष पृ० ३६ ( क ) पर देखिए ।

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के भीतर चौहान वंश के और अन्य १२ राजा हुए । हिसाब से प्रत्येक राज का
औसत राजकाल १५ वर्ष होता है । यदि इस हिसाब को ठीक माना जाय तो
बीसलदेव तृतीय का समय, जो हमें इतिहास में नहीं प्राप्त है, लगभग वि०
सं० ११५० होता है; क्योंकि यह विग्रहराज द्वितीय का समय वि० सं० १०३०,
विग्रहराज तृतीय का वि० सं० ११५० तथा चतुर्थ का वि० सं० १२१० था और
ये तीनों विग्रहराज, राजा भोज, के समय जिसका समय ऊपर कहे गये आधार पर
वि० सं० १०७६ है, वर्तमान नहीं थे । इस ऐतिहासिक तथ्य से एक बहुत बड़ा
असमंजस यह उपस्थित होता है कि क्या कवि नाल्ह द्वारा कही गयी राजा भोज-
बीसलदेव की कथा निरी कपोलकल्पित है ? इसमें तो सन्देह नहीं कि कवि
नाल्ह इतिहास का पण्डित नहीं था और न उसने बीसलदेव रासो की रचना
किसी ऐतिहासिक दृष्टिकोण से की थी । फिर भी इसे स्वीकार करने में कोई
आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि कवि नाल्ह को इस बात का ज्ञान था कि परमार
वंश और चौहान वंश का 'रोटी-बेटी' का सम्बन्ध है और बीसलदेव रासो की
रचना करते समय यदि वह इतिहास के चार बीसलदेवों में से किस बीसलदेव
के सम्बन्ध में कह रहा है इसका स्पष्ट उल्लेख कर देता तो शायद आज ग्रन्थ की
रचना-विधि तथा ग्रन्थ की भाषा आदि के सम्बन्ध में कोई सन्देह न रहता ।
लेकिन इस अभाव के कारण ही हमें ऊपर यह निर्णय कल्पना के आधार पर
करना पड़ा है कि बीसलदेव तृतीय का समय क्या था और इस निष्कर्ष पर
पहुँचना पड़ा है कि इनमें कोई राजा भोज के समय वर्तमान नहीं था ।
लेकिन जैसा कि ऊपर कहा गया है कि कवि की इस उक्ति में सत्यता का
अंश अवश्य है जहाँ तक कवि परमार और चौहान वंश के सम्बन्ध का वर्णन
करता है, क्योंकि कवि की इस उक्ति की पुष्टि पृथ्वीराज रासो¹ और बिजोलियाँ
के शिला-लेख² में दी हुई चौहानों की वंशावली से होती है ।


१—ऊँच धाम बिसराम किय, रग साल चतुरंग ।
गोदा महल पंवार सौं, कहिय सुकथा प्रसंग ॥ समय १ ॥ छं० ४०६॥
पृथ्वीराज रासो ना० प्र० सभा
२—विप्रश्री वत्स गोत्रे भू दहि छत्रपुरे पुरासामनीनंत सामंतः पूर्णतल्लो-
नृपस्ततः ॥१२॥ तस्माच्छ्रोजयराजविमद नृपो भो चद गोपेन्द्र कौ तस्माद्दुर्लभ
गूर्ज कोरारि नृपो गजाक सच्र्छदनोश्रीमद्वप्प्य राज विंध्य नृपतिः श्री सिंह राश्यि-
ग्रहो धीमल्लुर्लभ शुंडुवाक्पति नृपाः श्री वीर्य रामोनुजः श्री चंडो वनिपेति
रायकधर श्री सिंह टो ॥ १६ ॥ इप्तलस्तपदाम तयनोवि बिसलो नृपः श्री राजदेवी
प्रियः पृथ्वीराज नृपोथ तत्तनुगवो रासत्य देवी विमुक्तत्पुत्रो जयदेव इत्यवत्रियः
सोमल्लदेवी पतिः ॥ १४ ॥ जै० आर० ए० एस० (बी०) की वोल्यू २५

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  • २१ -
    *(1) Vasudeva
    (2) Samatraj
    (3) Ajayraj ( Ajayapal )
    (4) Vigraharaj ( i )
    (5) Chandraj ( i ) (6) Gopendraraj
    (7) Durlabharaj ( i )
    (8) Govindaraj ( Guvaka i )
    (9) Chandraraj
    (10) Guataka ( ii )
    (11) Chandraraj (iii)
    (12) Vakpatiraj ( i )
    (13) Sinharaj
    (14) Vigraharaj (ii) (15) Durlabharaj (ii)
    (A D. 973) (16) Govindraj (ii)
    (17) Vakapatiraj (ii)
    (18) Viryaram (19) Chamundaraj
    (About A.D.1040) (21) Vigraharaj (iii)
    (20) Durlabharaj (iii) (22) Prithviraj ( i )
    (About A.D.1075) (A. D. 1105)
    (23)Ajayraj(sahlana)
    (24) Arnoraj ( Anaji )
    ( A. D. 1140 )
    (25) Jugdeva (26) Vigrahraj (iv)
    (About A.D.1153-1164)
  • ३० Ajmer Historical and Descriptive by H. B. Sarada
    P. 139.
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  • ४७ -

उपर्युक्त प्रमाणों से यह निश्चय तो हो गया कि परमार और चौहान वंश
का आपस का सम्बन्ध था तथा यह भी निश्चय हो गया कि राजा भोज के
समकालीन इन तीन बीसलदेवों में से कोई नहीं था। लेकिन जहाँ कवि ने बीसल-
देव रासो में यह नहीं लिखा कि बीसलदेव से उसका अर्थ किस बीसलदेव से है,
वहीं उसने यह लिखा है कि राजा भोज की पुत्री राजमती से बीसलदेव का
विवाह हुआ था जिससे समझने में दुविधा हो जाती है कि कवि किस बीसलदेव
की ओर संकेत कर रहा है।
बिजोलियाँ के शिलालेख से, जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है यह
बात प्रमाणित होती है कि बीसलदेव तृतीय की रानी का नाम राजदेवी था।
बीसलदेव रासो की राजा भोज की पुत्री राजमती और यह राजदेवी एक ही रानी
के सूचक होने चाहिए। १ लेकिन चूँकि ऊपर यह प्रमाणित किया जा चुका है कि
बीसलदेव तृतीय, राजा भोज का समकालीन नहीं था, वरन् राजा भोज के अंतिम
समयों में राजा हुआ जिससे यह सिद्ध होता है कि सम्भवतः राजा भोज के भाई
उदयादित्य ने, जिसका समय इतिहासकारों ने सं० १११६ से ११४३ वि० सं० १
माना है और जो बीसलदेव तृतीय का समकालीन था २, भोज की पुत्री का विवाह
बीसलदेव तृतीय से किया हो।
जयानक कृत "पृथ्वीराज विजय काव्य" तथा इतिहास में इसका उल्लेख
मिलता है कि वीर्यराम, जिसका उल्लेख बिजोलियाँ के शिलालेख में सिंहट के
नाम से हुआ है, विग्रहराज तृतीय का पिता था और इसे अवन्ती के राजा भोज
१-न० प्र० पत्रिका—सं० १६६७, पृ० १६८।
२—ग्वालियर में उदयपुर का शिलालेख :—इस लेख में उदयादित्य का
राज्य काल वि० सं० १११६ तथा शक सं० ६८१ (ई० सन् १०५६-६०)
दिया हुआ है तथा यह भी लिखा है उसने शंकर का मंदिर निर्माण करवाया।
दे०-कैप्टन नर्ट का होल जे० एन० बी० पोल्यूम ७ पृष्ठ १०५६
उदयपुर मन्दिर का शिलालेख :— यह लेख ग्वालियर के उदयपुर के मंदिर
के पूर्वीय दरवाजे के भीतर सुन्दर रूप में सुरक्षित है। इसमें छः पंक्तियाँ हैं
और उसमें उदयादित्य का नाम दिया हुआ है तथा तिथि वि० सं० ११३७ दी
हुई है। यह लेख सम्भवतः पं० महीपाल रचित है।

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  • ४८ -
    ने मार डाला था।¹ इस कारण इन दोनों वंशों में अनबन हो गई थी। 'राज-
    पूतों में ऐसी अनबन पुत्री बिवाहने से मिटती थी, जिसके अनेक उदाहरण उनके
    इतिहास में मिलते हैं।² सम्भव है, इसी अनबन को मिटाने के लिए उदयादित्य
    ने अपनी भतीजी राजा भोज की पुत्री राजदेवी अथवा राजमती का विवाह
    बीसलदेव तृतीय से किया हो, क्योंकि जहाँ इतिहास में उपर्युक्त अनबन की कथा
    प्राप्य है वहीं यह वृत्त भी मिलता है कि परमार राजा भोज के अन्तिम समय
    उसके राज्य पर सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम तथा चेदि के राजा कर्ण ने चढ़ाई
    की और राजा भोज की मृत्यु के पश्चात् उदयादित्य ने विग्रहराज तृतीय की सहा-
    यता से सोलंकी राजा कर्ण को जीता। ऐतिहासिक सत्य से यही अनुमान दृढ़
    होता है कि चौहान और परमार वंश का आपसी बैर मिट गया था एवं राजा
    भोज की पुत्री के विवाह की सम्भावित कथा की पुष्टि भी इससे होती है।
    उक्त ऐतिहासिक सत्य को प्रामाणिक मान लेने के पश्चात् यह भी स्वीकार
    करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि बीसलदेव रासो की रचना बीसलदेव
    तृतीय तथा उनके समकालीन परमार वंशी उदयादित्य के समय में हुई होगी,
    जिनका राज्य काल विक्रम की बारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में था। लेकिन प्राप्य
    प्रतियों में से किसी भी प्रति में बीसलदेव तृतीय के काल का निर्देश नहीं है।
    अवश्य इनके राज्य काल के पूर्वार्द्ध सं० १०७७ या १०७३ तथा उत्तरार्द्ध सं०
    १२१२ या ११७२ का उल्लेख प्राप्त प्रतियों में है। पूर्वार्द्ध संवत् के लिये डा०
    रामकुमार वर्मा ने गणना का सहारा न लेकर केवल इतना ही कहा है कि चूंकि
    झालरा पाटन का शिलालेख—यह लेख दे० किलहार्न का लेप आई०
    ए० वोल्यूम २० पृ० ८३ झालावाड़ राज्य के झालरा पाटन नामक स्थान में
    पाया गया था। इसमें किसी तेली द्वारा शंभु के निर्माण की बात खुदी हुई है।
    इसकी तिथि उदयादित्य के राज्य काल वि० सं० ११४३ (ई० सन् १०८६-
    ८७) की है।
    दे०, जनरल एण्ड पी० ए० एस० बी०, वोल्यूम १०, पृ० २४१।
    १—अगम्यो यो नरेन्द्राणां शुभादीधिति-सुंदरः ॥
    लभे यशक्षयो यश्च भोजेनावन्ति-भूभृता ॥६७॥ पंचम सर्ग
    २—ना० प्र० प० सं० १६६७, पृष्ठ १६८।
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४ - ४९ -
यह संवत् इतिहास के अधिक समीप है इसलिए इस संवत् को मान्यता देने में
कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये । इसके विपरीत उत्तरार्द्ध संवत् के लिये डा०
ओझा जी ने गणना की सहायता से तिथि वार आदि को ठीक मानते हुए कहा
है कि इस ग्रन्थ की रचना प्रायः डेढ़ सौ वर्ष पश्चात् हुई थी । ग्रन्थ के नायक को
बीसलदेव चतुर्थ मानने वाले विद्वानों ने इसका रचना काल १२१२ वि० सं
माना है, क्योंकि बीसलदेव चतुर्थ का राज्यकाल संवत् १२१० से १२२० था ।
लेकिन ऐसे मानने वाले विद्वानों की आलोचना अनेक विद्वानों ने अनेक प्रकार से
की है जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है । एक बात विशेष रूप से दर्शनीय
यह है कि काव्यगत सारी कथाएँ केवल बीसलदेव और राजमती से सम्बन्धित
हैं । यदि राजमती को कथा से पृथक् कर दिया जाय तो कथा कुछ रह ही नहीं
जाती । अस्तु, राजमती और बीसलदेव के सम्बन्ध को प्रामाणिक मान कर ही
हमें ऐतिहासिक तथ्यों पर विचार करना चाहिये । इस दिशा में बीसलदेव चतुर्थ
से प्रसिद्ध राजा भोज की कन्या राजमती से विवाह की संभावना को न देखकर
( राजा भोज से लगभग सौ वर्ष पश्चात् बीसलदेव चतुर्थ का समय सिद्ध होता
है ) ग्रन्थ के नायक को बीसलदेव चतुर्थ मानने वालों ने एक तर्क यह उपस्थित
किया है कि "हम्मीर काव्य के कवि ने भोज द्वितीय के लिये,-'भोजो भोज इवा-
परः," लिखा है । अतः यह भी अनुमान किया जा सकता है कि भोजवंशीय
किसी अन्य के लिये कवि नल्ह ने भोज शब्द का व्यवहार किया है ।१ लेकिन
इस आधार को मान लेने पर यह सिद्ध करने का प्रयत्न करना कि प्रसिद्ध राजा
भोज के वंश के दूसरे किसी शासक की कन्या का नाम राजमती था और उसी का
विवाह बीसलदेव चतुर्थ से हुआ था तथा उसी का उल्लेख कवि ने अपने ग्रन्थ
में किया है कुछ कुछ आधारहीन जान पड़ता है । माना कि बीसलदेव तृतीय की
रानी का नाम राजदेवी था राजमती नहीं, जैसा कि विग्योदयों के शिलालेख में
प्राप्त है, लेकिन सम्पूर्ण रूप से आधार-रहित बात पर आधारित होकर यह
कहने से कि किसी भोज की कन्या का नाम राजमती था और वह भोज बीसल-
देव चतुर्थ का समकालीन था, यह कहना विशेष संगतपूर्ण है कि राजदेवी को ही
कवि ने राजमती कहा है । सम्भव है कि बीसलदेव तृतीय की रानी राजदेवी का ही
नाम अपने पितृगृह में राजमती रहा हो और विवाह हो जाने के पश्चात् वह राजदेवी
कहलायी हो । और इसी कारण विग्योदयों के शिलालेख में 'राजदेवी' के नाम का
१-बीसलदेव रासो...सं० सत्यजीवन वर्मा...पृ० १६ भूमिका ।

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  • ५१ -

लेकिन उपर्युक्त तर्क को उपस्थित करते हुए विद्वान् लेखक ने कहीं यह सिद्ध
करने का प्रयास नहीं किया कि बीसलदेव चतुर्थ की रानी का नाम राजमती उसे
इतिहास में मिला है अथवा जैसलमेर नगर के बसाने वाले महाराज जयसलदेव
के भतीजे रावल भोजदेव की कन्या का नाम इतिहास में कहीं उसे राजमती
मिलता है। तब फिर क्यों कर बीसलदेव चतुर्थ का सम्बन्ध भोजदेव (रावल)
से स्थापित किया जाय । अब रही बात कवि द्वारा राजमती को जैसलमेर की
राजकुमारी कहने की। इस सम्बन्ध में तो ग्रन्थ के रचयिता ने ही ऐसी द्विविधा
पैदा कर दी कि किसी निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन जान पड़ता है। जहाँ कवि ने
राजमती को जैसलमेर की राजकुमारी कहा है वहाँ ही वह राजा बीसलदेव के
'धार नगरी' में राजमती से ब्याह करने के लिये जाने की भी बात कहता है।१ ऐसी
स्थिति में प्रक्षिप्त का सहारा लेकर कुछ भी कहना ठीक न होगा। डा० माता-
प्रसाद जी गुप्त ने अनेक छान-बीन के पश्चात् केवल १२८ पदों को ही प्रामाणिक
माना है। लेकिन इन्हीं प्रामाणिक पदों में ही जैसलमेर में राजमती के जन्म की
बात तथा धार के राजा भोज की पुत्री होना दोनों बातें आती हैं। सम्भव है
कि जैसलमेर विजय करने के लिये राजा भोज (मालवाधिपति) कभी गये हों
और वहीं उन्हें कन्या-रत्न की प्राप्ति हुई हो और इसी कारण कवि ने ऐसा कहा
हो अथवा यह भी सम्भव है कि राजमती को जैसलमेर की कुमारी कहकर कवि
ने लक्षणा के सहारे यह कहने की चेष्टा की हो कि जैसलमेर की सुन्दरियों जैसी
सुन्दर राजमती थी।
“मारवाड़ नरनीपजै, नारी जेसलमेर ।
मिन्धा तुरही सांतरां, फेरहूल बीकानेर ॥”
ग्रन्थ में वर्तमानकालिक क्रियाओं के प्रयोग के आधार पर कुछ विद्वान् ग्रन्थ के
रचयिता को बीसलदेव का समकालीन तथा बीसलदेव को विग्रहराज चतुर्थ मानते हैं
जिनका समय अनेक शिलालेखों तथा इतिहास से सं० १२२० से सं० १२३१ प्रमाणित
हो चुका है।२ लेकिन इस तर्क को मान लेने में यह असमंजस उपस्थित होता है कि
ग्रन्थ का रचना काल जो कुछ प्रतियों में प्राप्त है और जिसके आधार पर उपर्युक्त


१-राजा उतरय उथार मँझारि। मन माहे हरषियउ राजकुमारि ॥१६॥
—बीसलदेव रासो—सं० माताप्रसाद गुप्त ।
२-फीरोजशाह की लाट पर खुदवाया हुआ विग्रहराज चतुर्थ का लेख ।
वि० सं० १२२० वैशाख सुदी गुरुवार ॥

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तर्क उपस्थित किया गया है वह 'बारह सै बहोत्तर' है जिसका अर्थ कुछ
विद्वानों ने १२१२ तथा कुछ ने १२०२ लगाया है। परन्तु यदि 'बारह सै बहो-
तर' का अर्थ १२१२ माना जाय तब तो बीसलदेव चतुर्थ के राज्यकाल से ८
वर्ष पूर्व, और यदि १२०२ अर्थ लगाया जाय तो ४१ वर्ष बाद इस ग्रन्थ की
रचना सिद्ध होती है; ऐसी अवस्था में कवि की समकालीनता का दावा कहाँ तक
ठीक होगा यह विवाद का विषय बन जाता है। फिर डा० उदयनारायण जी
तिवारी का तो यह भी कहना है कि जहाँतक क्रियाओं के प्रयोग का सम्बन्ध है,
अनेक ग्रन्थ ऐसे मिलते हैं जिनमें समकालीन न होने पर भी वर्तमानकालिक
क्रियाओं का प्रयोग मिलता है। प्रायः घटनाओं को सत्य का रूप देने के लिए ही
कवियों ने ऐसा किया है।१
अजमेर के बसने का प्रश्न उठाकर कुछ विद्वान् कहते हैं कि चूंकि विग्रहराज
तृतीय के समय अजमेर बसा नहीं था इसलिये इस ग्रन्थ के नायक बीसलदेव तृतीय
नहीं हो सकते। ऐसे विद्वानों के मतानुसार अजमेर नगर विग्रहराज तृतीय के पश्चात्
महाराज अजयराज ने बसाया था।२ इसमें तो सन्देह नहीं कि वि० सं० ११९५
(ई० स० ११०८) के लगभग चौहान अजयदेव ने अजमेर बसाकर उसे इस
वंश की राजधानी बनाया। लेकिन कवि जहाँ गढ़ अजमेर का उल्लेख करता है वहीं
बीसलदेव के लिये 'सम्भरीराव' का भी।३ और बीसलदेव, शाकंभरीश्वर या
सांमरीराज अपने वशज वासुदेव के अहिच्छत्रपुर से शाकंभरी (सांभर) में
आकर अपना राज्य स० ७५१ के लगभग कायम कर लेने के पश्चात् ही कह-
लाने लगे थे।४ ज्ञात तो ऐसा होता है कि कवि को अजमेर बसने की तिथि का
ज्ञान न था। और चूंकि कवि ने ग्रन्थ की रचना, विग्रहराज तृतीय के समर्थक
१—वीर काव्य—प० उदयनारायण तिवारी—पृ० १६० ।
२—हमारा हिन्दी साहित्य—भवानीशंकर त्रिवेदी—पृ० ५१ ।
३—मारवाड़ का इतिहास—पं० विश्वेश्वरनाथ रेउ—पृ० ६-१२ ।
४—गरब करि बोलियउ सम्भरि बाल ।
मो सारिखउ नहीं अवर भुपाल ॥
म्हां परि सम्भरि उमडइ ।
चितु दिसइं थांपा रे जेसलमेर ।
लाल तुरीय पायर पडइ ।
गोरी राजकउ वइसणउ गढ़ अजमेर ॥ ३८ ॥ बीसलदेव रास
सं०, डा० माताप्रसाद गुप्त ।