बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
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अर्थात् प्रचलित मौखिक मारवाड़ी की शब्दावली से पृथक् होती थी ।१
प्रसिद्ध विद्वान् तेस्सीतोरी और डा० चाटुर्ज्या का उपर्युक्त मत यह सिद्ध
करता है कि मारवाड़ और गुजरात में प्रचलित मौखिक अपभ्रंश से राजस्थानी
का उदय तेरहवीं शती में हुआ था । अर्थात् इसके पहले वहाँ की बोलचाल की
भाषा अपभ्रंश थी । तथा अपभ्रंश के बाद "पिंगल" और तब डिंगल का स्थान
आता है । आज के प्राप्त इस ग्रंथ की प्रतियों में निस्सन्देह डिंगल और पिंगल
भाषा की बहुलता है, क्योंकि १५ वीं शती के पश्चात् की ही ये सभी प्रतियाँ
हैं लेकिन इन प्रतियों में अपभ्रंश संज्ञाओं और क्रियाओं का प्रयोग तो स्पष्ट
सिद्ध करता है कि इस काव्य की रचना अति प्राचीन अर्थात् १२ वीं शती की थी
और स्मरण के आधार पर लिखित होने के कारण केवल थोड़े बहुत शब्दों और
क्रियाओं का ही प्रयोग लेखबद्ध करते समय किया जा सका । तथा इस कथन में
भी अत्युक्ति न होगी कि इस ग्रन्थ की रचना आजकल की राजस्थानी में नहीं
हुई थी, जैसा कि डा० उदयनारायण जी तिवारी का विचार है, यदि उन्होंने सच-
मुच राजस्थानी शब्द का प्रयोग आज की राजस्थानी के लिए किया हो ।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रचना-तिथि पर विचार करते हुए डा० रामकुमार
वर्मा ने सं० १००३ को इतिहास के निकट माना है और अपने मत की पुष्टि
में इतिहास के प्रमाण दिये हैं ।२ ( लेकिन राजा भोज और बीसलदेव के समय
को देते हुए भी वे यह कहना भूल गये कि किस बीसलदेव की चर्चा वे कर रहे
हैं, क्योंकि इतिहास में बीसलदेव चार हो चुके हैं । )
श्री सत्यजीवन वर्मा ने सं० १२१२ को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ठीक सम-
झते हुए कहा है कि "बीसलदेव" विग्रहराज चतुर्थ का दूसरा नाम है । बीसल-
देव के शिलालेख सं० १२१० और १२२० के प्राप्त हैं । अजमेर बसने के
पश्चात् केवल वही बीसलदेव हुआ है । यह अर्णोराज का पुत्र और जगदेव
का छोटा भाई था । यह अपने बड़े भाई जगदेव के जीते जी उससे राज छीन
कर गद्दी पर बैठा था । इसको विद्या से बड़ा प्रेम था । इसका रचा हुआ हर-
केलिनाटक है । यह नाटक वि० सं० १२१० ( सन् ११५३ ) की माघ शुक्ला
१. राजस्थानी भाषा...डा० सुनीति कुमार चाटुर्ज्या...पृ० ६५ ।
२. हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास—पृ० २६८-१० ।