बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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प्रथम अङ्क' भाग में। फीरोजशाह की लाट पर जो लेख है उसके विषय में
मेरा यह सिद्धान्त है कि यह बीसलदेव ही से कोई स्पष्ट सम्बन्ध नहीं रखता ।
वरन् उसके नाम का उल्लेख उसमें इसलिए किया गया है कि वह विग्रहराज
के प्रतापी और प्रसिद्ध पुरखाओं में से था । चौहानों के इतिहास में बीसलदेव
का नाम निजदेश के हितार्थ अनेक साहसपूर्ण कार्यों के लिये अत्यन्त प्रसिद्ध है।
जो दिल्ली न जीत सका उसने समझा हो कि यदि अपने नाम के साथ बीसलदेव
के नाम का उल्लेख हो तो जो कालिमा मेरे यश में लग गई है वह दूर हो
जाय । इसी कारण इन दोनों का नाम उस शिलालेख पर है। इससे बीसल-
देव और विग्रहराज को एक ही पुरुष मानना कदापि उचित नहीं जान पड़ता ।"१
श्री रामनारायण जी दूगड़ ने अपना विचार इस सम्बन्ध में यों प्रकट
किया है :-
बीसलदेव रासो के विषय में अपनी सम्मति प्रकट करने के पूर्व में बाबू
श्यामसुन्दर दास जी के मन्तव्य पर कुछ कहूँगा । उक्त बाबूजी का पृथ्वीराज
रासो के बीसलदेव, ललित विग्रह राज नाटक के नायक और फीरोजशाह की
लाट के लेख वाले बीसलदेव तथा राजमति के पति बीसल को एक ही पुरुष
मान लेना सर्वथा अयुक्त है। उन्होंने टाड राजस्थान के अनुसार रासो वाले
बीसलदेव का पृथ्वीराज से ६ पीढ़ी पहिले होना लिखकर उस बीसलदेव के
समय को, बीसलदेव रासो के बीसल से मिलाने का परिश्रम उठाया है। यही
कारण है कि अन्त में उन्हें लाट पर के लेख वाले विग्रहराज और बीसलदेव
जुदा-जुदा पुरुष ठहराने पड़े । यदि उक्त बाबू साहब को यह मालूम होता कि
चन्द के रासो और टाड साहब की दी हुई चहुवाणों की वंशावली बिल्कुल रद्दी
है और विग्रहराज या बीसलदेव नाम के चार राजा चहुवाणों में हुए हैं तो वे
कदापि ऐसा न लिखते ।
पहिला विग्रहराज या बीसलदेव चहुवाणों के मूल पुरुष चापमान या चाह-
मान से पाँचवीं पीढ़ी में हुआ ।
दूसरा विग्रहराज ( पृथ्वीराज रासो का बीसलदेव ) सिंहराज का पुत्र था,
जिसने अणहिल वाड़े के राजा मूलराज सोलंखी को जीतकर वहाँ बीसलपुर
नाम का नगर बसाया । पृथ्वीराज रासो में इस बीसलदेव को आनन्ददेव ( अर्णो-
राज ) का दादा कहकर सं० ९८६ वि० तक १६२ वर्ष अजमेर में उसका राज
१. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, सन् १६०१, पाँचवाँ भाग, पृ० १४१-१४४ ।