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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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Page 49
  • ४१ -

जिसका लेख देहली में फीरोज़शाह की लाट पर है¹, उसकी मृत्यु सं० १२२०
वि० के लगभग होना उस लेख में पाया जाता है। इसी बीसलदेव या विग्रहराज
ने तँवरों से दिल्ली का राज लिया 'सं० १२०८ वि० के लगभग' और हिमालय
से विन्ध्याचल पर्यन्त देश विजय कर आर्यावर्त्त से म्लेच्छों का उच्छेद किया था।
यही 'ललित विग्रहराज' नाम के नाटक का नायक था।² इस बीसलदेव और
उसके लेख के विषय में जो अनुमान बाबू श्यामसुन्दरदास ने किया है, वह ठीक
नहीं है।
अब बीसलदेव रासो के विषय में यह कहा जा सकता है कि यदि यह ग्रंथ
किसी नरपति कवि ने शक सं० १२०२ या १२१० में लिखा हो तो रचयिता
ऊपर दिये हुए चारों बीसलदेवों में से किसी का भी समकालीन नहीं ठहरता।
ग्रन्थकार लिखता है कि भोजदेव ने अपनी कन्या का विवाह करने को पुरो-
हित भेजा, वह अजमेर, अयोध्या, दिल्ली और मथुरा गया परन्तु कोई राजा
उसके मन में न आया। आखिर अजमेर के बीसलदेव से उसने राजमती का विवाह
ठहराया। भाटियों की ख्याति के अनुसार जैसलमेर का नगर राजा जैसल ने
सं० १२१२ वि० में बसा कर अपनी राजधानी बनाया था। अतः सम्भव नहीं
कि भोजदेव का पुरोहित जो राव जैसल से करीब एक सौ वर्ष पहले मर चुका
था, जैसलमेर में जाता और यदि उसका जैसलमेर जाना मानें तो राजमती को
भोजदेव की कन्या नहीं मानना पड़ेगा। भोज राजा के समय में दिल्ली पर
अनंगपाल तँवर 'दूसरा' राज करता था, अयोध्या में शालवंशी राजाओं का राज-
भ्रष्ट होकर राठौड़ों का अधिकार शुरू हुआ था। मथुरा में उस समय कोई स्वतन्त्र
राजा का होना पाया नहीं जाता, यह शहर दिल्ली के अधीन था। फिरिश्तः
लिखता है कि (१०१७ ई० सं०) १००४ वि० में सुलतान महमूद गजनवी
मथुरा में गया जो किशन वासुदेव का शहर कहलाता है। दिल्ली के राजा ने
शहर की हिफ़ाजत के वास्ते फौज भेजी थी मगर वह शिकस्त खाकर भाग गई
और बीस दिन तक सुल्तान ने उस शहर को लूटा।³ साँभर में चौहानों का
राज भोजदेव से बहुत पहले होना पाया जाता है, चित्तौड़ का गढ़ आठर्वी


1 Indian Antiquary Vol 26 P 216-1860
२-एक ललित विग्रहराज नाटक कवि सोमदेव का बनाया हुआ और दूसरा हर-
केलि नाटक खास विग्रहराजजी का बनाया हुआ अजमेर के अढ़ाई दिन के
झोपड़े में मिला था।