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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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Page 56
  • ४८ -
    ने मार डाला था।¹ इस कारण इन दोनों वंशों में अनबन हो गई थी। 'राज-
    पूतों में ऐसी अनबन पुत्री बिवाहने से मिटती थी, जिसके अनेक उदाहरण उनके
    इतिहास में मिलते हैं।² सम्भव है, इसी अनबन को मिटाने के लिए उदयादित्य
    ने अपनी भतीजी राजा भोज की पुत्री राजदेवी अथवा राजमती का विवाह
    बीसलदेव तृतीय से किया हो, क्योंकि जहाँ इतिहास में उपर्युक्त अनबन की कथा
    प्राप्य है वहीं यह वृत्त भी मिलता है कि परमार राजा भोज के अन्तिम समय
    उसके राज्य पर सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम तथा चेदि के राजा कर्ण ने चढ़ाई
    की और राजा भोज की मृत्यु के पश्चात् उदयादित्य ने विग्रहराज तृतीय की सहा-
    यता से सोलंकी राजा कर्ण को जीता। ऐतिहासिक सत्य से यही अनुमान दृढ़
    होता है कि चौहान और परमार वंश का आपसी बैर मिट गया था एवं राजा
    भोज की पुत्री के विवाह की सम्भावित कथा की पुष्टि भी इससे होती है।
    उक्त ऐतिहासिक सत्य को प्रामाणिक मान लेने के पश्चात् यह भी स्वीकार
    करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि बीसलदेव रासो की रचना बीसलदेव
    तृतीय तथा उनके समकालीन परमार वंशी उदयादित्य के समय में हुई होगी,
    जिनका राज्य काल विक्रम की बारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में था। लेकिन प्राप्य
    प्रतियों में से किसी भी प्रति में बीसलदेव तृतीय के काल का निर्देश नहीं है।
    अवश्य इनके राज्य काल के पूर्वार्द्ध सं० १०७७ या १०७३ तथा उत्तरार्द्ध सं०
    १२१२ या ११७२ का उल्लेख प्राप्त प्रतियों में है। पूर्वार्द्ध संवत् के लिये डा०
    रामकुमार वर्मा ने गणना का सहारा न लेकर केवल इतना ही कहा है कि चूंकि
    झालरा पाटन का शिलालेख—यह लेख दे० किलहार्न का लेप आई०
    ए० वोल्यूम २० पृ० ८३ झालावाड़ राज्य के झालरा पाटन नामक स्थान में
    पाया गया था। इसमें किसी तेली द्वारा शंभु के निर्माण की बात खुदी हुई है।
    इसकी तिथि उदयादित्य के राज्य काल वि० सं० ११४३ (ई० सन् १०८६-
    ८७) की है।
    दे०, जनरल एण्ड पी० ए० एस० बी०, वोल्यूम १०, पृ० २४१।
    १—अगम्यो यो नरेन्द्राणां शुभादीधिति-सुंदरः ॥
    लभे यशक्षयो यश्च भोजेनावन्ति-भूभृता ॥६७॥ पंचम सर्ग
    २—ना० प्र० प० सं० १६६७, पृष्ठ १६८।