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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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Page 57

४ - ४९ -
यह संवत् इतिहास के अधिक समीप है इसलिए इस संवत् को मान्यता देने में
कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये । इसके विपरीत उत्तरार्द्ध संवत् के लिये डा०
ओझा जी ने गणना की सहायता से तिथि वार आदि को ठीक मानते हुए कहा
है कि इस ग्रन्थ की रचना प्रायः डेढ़ सौ वर्ष पश्चात् हुई थी । ग्रन्थ के नायक को
बीसलदेव चतुर्थ मानने वाले विद्वानों ने इसका रचना काल १२१२ वि० सं
माना है, क्योंकि बीसलदेव चतुर्थ का राज्यकाल संवत् १२१० से १२२० था ।
लेकिन ऐसे मानने वाले विद्वानों की आलोचना अनेक विद्वानों ने अनेक प्रकार से
की है जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है । एक बात विशेष रूप से दर्शनीय
यह है कि काव्यगत सारी कथाएँ केवल बीसलदेव और राजमती से सम्बन्धित
हैं । यदि राजमती को कथा से पृथक् कर दिया जाय तो कथा कुछ रह ही नहीं
जाती । अस्तु, राजमती और बीसलदेव के सम्बन्ध को प्रामाणिक मान कर ही
हमें ऐतिहासिक तथ्यों पर विचार करना चाहिये । इस दिशा में बीसलदेव चतुर्थ
से प्रसिद्ध राजा भोज की कन्या राजमती से विवाह की संभावना को न देखकर
( राजा भोज से लगभग सौ वर्ष पश्चात् बीसलदेव चतुर्थ का समय सिद्ध होता
है ) ग्रन्थ के नायक को बीसलदेव चतुर्थ मानने वालों ने एक तर्क यह उपस्थित
किया है कि "हम्मीर काव्य के कवि ने भोज द्वितीय के लिये,-'भोजो भोज इवा-
परः," लिखा है । अतः यह भी अनुमान किया जा सकता है कि भोजवंशीय
किसी अन्य के लिये कवि नल्ह ने भोज शब्द का व्यवहार किया है ।१ लेकिन
इस आधार को मान लेने पर यह सिद्ध करने का प्रयत्न करना कि प्रसिद्ध राजा
भोज के वंश के दूसरे किसी शासक की कन्या का नाम राजमती था और उसी का
विवाह बीसलदेव चतुर्थ से हुआ था तथा उसी का उल्लेख कवि ने अपने ग्रन्थ
में किया है कुछ कुछ आधारहीन जान पड़ता है । माना कि बीसलदेव तृतीय की
रानी का नाम राजदेवी था राजमती नहीं, जैसा कि विग्योदयों के शिलालेख में
प्राप्त है, लेकिन सम्पूर्ण रूप से आधार-रहित बात पर आधारित होकर यह
कहने से कि किसी भोज की कन्या का नाम राजमती था और वह भोज बीसल-
देव चतुर्थ का समकालीन था, यह कहना विशेष संगतपूर्ण है कि राजदेवी को ही
कवि ने राजमती कहा है । सम्भव है कि बीसलदेव तृतीय की रानी राजदेवी का ही
नाम अपने पितृगृह में राजमती रहा हो और विवाह हो जाने के पश्चात् वह राजदेवी
कहलायी हो । और इसी कारण विग्योदयों के शिलालेख में 'राजदेवी' के नाम का
१-बीसलदेव रासो...सं० सत्यजीवन वर्मा...पृ० १६ भूमिका ।