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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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के भीतर चौहान वंश के और अन्य १२ राजा हुए । हिसाब से प्रत्येक राज का
औसत राजकाल १५ वर्ष होता है । यदि इस हिसाब को ठीक माना जाय तो
बीसलदेव तृतीय का समय, जो हमें इतिहास में नहीं प्राप्त है, लगभग वि०
सं० ११५० होता है; क्योंकि यह विग्रहराज द्वितीय का समय वि० सं० १०३०,
विग्रहराज तृतीय का वि० सं० ११५० तथा चतुर्थ का वि० सं० १२१० था और
ये तीनों विग्रहराज, राजा भोज, के समय जिसका समय ऊपर कहे गये आधार पर
वि० सं० १०७६ है, वर्तमान नहीं थे । इस ऐतिहासिक तथ्य से एक बहुत बड़ा
असमंजस यह उपस्थित होता है कि क्या कवि नाल्ह द्वारा कही गयी राजा भोज-
बीसलदेव की कथा निरी कपोलकल्पित है ? इसमें तो सन्देह नहीं कि कवि
नाल्ह इतिहास का पण्डित नहीं था और न उसने बीसलदेव रासो की रचना
किसी ऐतिहासिक दृष्टिकोण से की थी । फिर भी इसे स्वीकार करने में कोई
आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि कवि नाल्ह को इस बात का ज्ञान था कि परमार
वंश और चौहान वंश का 'रोटी-बेटी' का सम्बन्ध है और बीसलदेव रासो की
रचना करते समय यदि वह इतिहास के चार बीसलदेवों में से किस बीसलदेव
के सम्बन्ध में कह रहा है इसका स्पष्ट उल्लेख कर देता तो शायद आज ग्रन्थ की
रचना-विधि तथा ग्रन्थ की भाषा आदि के सम्बन्ध में कोई सन्देह न रहता ।
लेकिन इस अभाव के कारण ही हमें ऊपर यह निर्णय कल्पना के आधार पर
करना पड़ा है कि बीसलदेव तृतीय का समय क्या था और इस निष्कर्ष पर
पहुँचना पड़ा है कि इनमें कोई राजा भोज के समय वर्तमान नहीं था ।
लेकिन जैसा कि ऊपर कहा गया है कि कवि की इस उक्ति में सत्यता का
अंश अवश्य है जहाँ तक कवि परमार और चौहान वंश के सम्बन्ध का वर्णन
करता है, क्योंकि कवि की इस उक्ति की पुष्टि पृथ्वीराज रासो¹ और बिजोलियाँ
के शिला-लेख² में दी हुई चौहानों की वंशावली से होती है ।


१—ऊँच धाम बिसराम किय, रग साल चतुरंग ।
गोदा महल पंवार सौं, कहिय सुकथा प्रसंग ॥ समय १ ॥ छं० ४०६॥
पृथ्वीराज रासो ना० प्र० सभा
२—विप्रश्री वत्स गोत्रे भू दहि छत्रपुरे पुरासामनीनंत सामंतः पूर्णतल्लो-
नृपस्ततः ॥१२॥ तस्माच्छ्रोजयराजविमद नृपो भो चद गोपेन्द्र कौ तस्माद्दुर्लभ
गूर्ज कोरारि नृपो गजाक सच्र्छदनोश्रीमद्वप्प्य राज विंध्य नृपतिः श्री सिंह राश्यि-
ग्रहो धीमल्लुर्लभ शुंडुवाक्पति नृपाः श्री वीर्य रामोनुजः श्री चंडो वनिपेति
रायकधर श्री सिंह टो ॥ १६ ॥ इप्तलस्तपदाम तयनोवि बिसलो नृपः श्री राजदेवी
प्रियः पृथ्वीराज नृपोथ तत्तनुगवो रासत्य देवी विमुक्तत्पुत्रो जयदेव इत्यवत्रियः
सोमल्लदेवी पतिः ॥ १४ ॥ जै० आर० ए० एस० (बी०) की वोल्यू २५