Skip to content
SarvaKosh
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished315 pages

Page 51 of 315

Read in context
Page 51

– ५३ –
प्रश्न उठता है कि क्या इतिहास में कहीं भी राजमती का उल्लेख बीसलदेव की
पत्नी के रूप में हुआ है ? अथवा राजमती का उल्लेख राजा भोज का पुत्री
कह कर कहीं हुआ है ?
उपर्युक्त ऐतिहासिक गुत्थियों को सुलझाने के लिये आवश्यक यह होगा कि
हम चौहानों और परमारों के वंश-वृक्ष को देखकर यह निर्णय करें कि राजा
भोज का समय कब से कब तक था और इनके समय में चार बीसलदेवों में से
कौन बीसलदेव वर्त्तमान था । राजा भोज का समय इतिहासकारों ने प्रस्तर लेखों,
दान पत्रों और प्रशस्तियों १ के आधार पर वि० सं० १०७६ से ११०३ ( ई०
सन् १०२० से १०५२ ) माना है । राजा भोज के काल में चार बीसलदेवों में से
कौन-से बीसलदेव वर्त्तमान थे, इसका समाधान चौहान राजाओं के वंश वृक्ष के
अध्ययन से सम्भव है । लेकिन इन चार बीसलदेवों के काल का निर्णय करने के
पहले डा० श्यामसुन्दर दास द्वारा उठाये गये इस प्रश्न का भी समाधान
आवश्यक है, कि “विग्रहराज और बीसलदेव एक ही पुरुष नहीं थे ।” उनकी यह
शंका निर्मूल सिद्ध हो जाती है दिल्ली के फिरोज़ शाह की लाट पर खुदी हुई
निम्न वार्ता से, जहाँ बीसलदेव और विग्रहराज को एक ही व्यक्ति माना गया है:–
आर्यावर्त्त यथार्थं पुनरपि कृतवानम्लेच्छ-विच्छेदनाभि-
र्देवः शाकंभरी या जगति विजयते बीसलक्षोणिपालः ।
ब्रूते संप्रति चाहमान-तिलक शाकंभरी भूपतिः
श्री मद्दिग्रहराज एष विजयी सन्तानजानात्मनः ॥१॥
संभव है कि डा० श्यामसुन्दरदास ने उपर्युक्त शंका इस कारण उठाई हो
कि फिरोज़शाह की लाट पर खुदी हुई यह बात केवल विग्रहराज चतुर्थ के
सम्बन्ध में है। इसमें संदेह नहीं कि इतिहास में विग्रहराज प्रथम और द्वितीय
१. ( क ) बांसवाड़ा का दान-पत्र—यह किसी ठठेरा की विधवा पत्नी के
पास दक्षिणी राजपूताने में पाया गया था और इस पर भोजदेव के हस्ताक्षर के
साथ सं० १०७६ भान सु० ५ अंकित है ।
( ख ) बेतमा का दान-पत्र—यह मध्य भारत में इन्दौर से पश्चिम १६
मील की दूरी पर बेतमा ग्राम में पाया गया था । इसमें राजा भोज के किसी
ब्राह्मण को कंकन विजय के अवसर पर एक गांव देने का उल्लेख है । इसकी
तिथि वि० १०७६ को मागो सु० १५ है ( ई० सन् १०२० सितम्बर ) ।