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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages
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परिशिष्ट

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नाश से रूप ज्ञान कतई नष्ट हो जाता है। अतः इस पित्त विवेचन में दृष्टि शब्द की व्याप्ति चतुर्थपटलस्थित धातुप्रसाद तक बढ़ाना आवश्यक है।

दृष्टि संज्ञक विवर का और चतुर्थपटल का संबंध इस तरह भी है कि दृष्टिमंडल का जो हिस्सा दृष्टि के भीतर खुला हुआ है उसके पिछले भाग में एक रंगीन अणु अवयवों की तह है। यह तह चतुर्थ पटल के रंगीन स्तर का आगे बढ़ा हुआ हिस्सा ही है।

दृष्टिविवर के पीछे ‘तृतीय पटल’ या ‘अशिकाच’ है। यह ‘भेद’ का ( भेदस्तृतीयं पटलम् ) बना हुआ, पारदर्शक व बाह्यगोल है। इसके पीछे अक्षिलेष्म है जो कि पारदर्शिका कला से ढंका हुआ है। इस अक्षिलेष्म के ही पीछे चतुर्थपटल है। इस चतुर्थपटल में ‘लिंग’ नामक एक भाग है। इसका व्यास दूई अंगुल और रंग ईश्वरीय है। इसके मध्य में एक दबा हुआ अंग है; उसको ‘लिंग नाभि’ कहते हैं। लिंग भाग के और उसके आसपास के नाडीजाल को देखते हुए यह कहना पड़ता है कि यह मस्तिष्क का परिवर्धित रूप है। लिंग भाग में शंक्वाकृति अणुअवयव हैं। प्रकाश से इनमें हलचल पैदा होती है। इसके पास रंगीन अणुअवयवों की तह है।

किसी भी ‘लक्ष्य’ से परावर्तित होने वाले प्रकाशकिरणों को क्रमशः कृष्ण मंडल, दृष्टि, तेजोजल, अशिकाच और अक्षिलेष्म इनमें से पार होकर लिंग भाग पर पड़ना जरूरी है तब कहीं रूप ग्रहण होता है। प्रकाश किरण, जब नेत्र में प्रविष्ट होते हैं तब उनका कृष्ण मंडल, तेजोजल, अशिकाच और अक्षिलेष्म, इनकी बाह्य गोलता व सपेक्ष

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आयुर्वेद-दर्शन

घनविरलता के कारण 'वक्कीभवन' होता है। फलतः फैले हुए प्रकाश किरण लिमिट जाते हैं और बड़े से बड़े दृश्य की प्रतिमा उसके अंतर के सहित अत्यल्प अवकाश या बिंदु में समा जाती है।

रूप ग्रहण के लिये उक्त 'प्रतिमाबिंदु' का लिंग भाग पर पड़ना आवश्यक है। जब तक उक्त 'नेत्रगत प्रतिमाबिंदु' लिंग भाग पर ठीक केंद्रित न होगा (आगे या पीछे पड़ता होगा) तब तक रूप-ग्रहण नहीं होगा। यह कार्य नेत्रगत 'केंद्रीकरणसाहस्य' के द्वारा होता है।

पास का या उजियाले का दृश्य देखने के समय 'वर्तुल स्नायु' संकुचित होता है; फलतः दृष्टिसंघटन व दृष्टि दोनों संकुचित जाते हैं और इससे प्रकाशकिरणों का नियमन होता है। इसके विपरीत अर्थात् अधियारे में दृष्टि बड़ी होती है। दृष्टि के इस आकुंचन प्रसरण से देखने में बड़ी सुविधा होती है। दूर का दृश्य देखने के समय 'नेत्र-कंडरा' मध्य पटल को आवश्यक सीमा तक आगे पीछे तानती है। इस तनाव के कारण तृतीय पटल का पुरोभाग भी ओग की तरफ तनकर अधिक बहिर्गोल बनता है। इस व्यापार से प्रकाश-किरणों का उक्त नेत्रगत प्रतिमाबिंदु लिंग भाग पर ठीक-ठीक केंद्रित होता है।

इस तरह बाह्य दृश्य की प्रतिमा लिंग भाग पर जब पड़ती है तब तत्रत्य संकाशकृति अणु अवयवों के तथा नाडियों के कारण रूप ज्ञान होता है। अतः प्रस्तुत में दृष्टि शब्द का अर्थ व्यापक करके अत्रत्य धातु प्रसाद को आलोचकपिक्त कहना उचित है। फिर भी यह ध्यान में रखना चाहिये कि यह विवेचन उन संप्रदायों को मान्य नहीं हो सकता जो रूप ग्रहण को प्राण धर्म का कार्य मानते हैं।

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परिशिष्ट

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भ्राजक पित्तः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

यत्तु त्वच्चि पित्तम् तस्मिन्भ्राजकोऽग्निरिति संज्ञा;
सोऽभ्यंगपरिषेकावगाह्यावलेपनादीनां क्रियाद्व्ययाणां
पक्ता, छायानां च प्रकाशकः ॥ (सु. सू. अ. २१)

अर्थात् जो पित्त त्वचा में रहता है तद्वत्त आग्नि को भ्राजक कहते हैं। भ्राजक, मालिश, भंपारे, स्नान, लेप आदि उपायों के द्वारा व्यवहार की जानेवाली औषधियों का पाचन करता है और छायाओं को प्रकाशित करता है।

त्वचा के द्वारा कई तरह की औषधियों को तथा स्नेहों को शोषित किया जाता है। भ्राजक पित्त, इन शोषित पदार्थों का पाचन करके उनको शारीर धातुओं में उपशयन करने योग्य बनाता है। वाग्भट ने अपने भ्राजक पित्त के विवेचन में इस कार्य का उल्लेख नहीं किया है।

साधारणतया मनुष्य, काले, कालेसांबले, निमगोरे, या गोरे होते हैं। इसके अतिरिक्त भी कुछ प्राकृतिक वर्ण हैं। फिर भी केवल नील, केवल श्याम, केवल ताम्र, हरित, और श्वेत ये अप्राकृतिक कहे जाते हैं।

वर्ण, प्रभा और छाया से युक्त रहते हैं। कोई भी पुरुष बिना प्रभा या छाया के नहीं रह सकता। प्रभा वर्ण को प्रकाशित करती है तो छाया तिरोहित करती है। प्रभा दूर से भी चमकती है पर छाया पास से दिखाई देती है।

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प्रभा ' तैजसी ' होकर सात प्रकार की है; रक्ता, पीता, श्यामा हरिता, पांडुरा और कृष्णा ।

छाया में दो प्रकार हैं; छाया और प्रतिच्छाया ( पडछाह ) तहां छाया, वर्ण प्रभाश्रिता रहती है और इसके ' सुषमा ' व ' विषमा ' दो प्रकार हैं । चूंकि जब कि शरीर पंच महाभूतों का बना है तब छाया भी विविध होती है । जैसा कि:— नाभसी छाया निर्मला, सस्नेहा, व सप्रभा रहती हैं; वायवी रूक्षा, श्यावारुणा व हतप्रभा रहती है; आग्नेयी रक्ता, दीप्तामा व दर्शनप्रिया रहती है; जलीया, स्फटिक विमला व सुस्निग्धा रहती है और पार्थिवी स्थिरा, स्निग्धा, घना, श्लक्ष्णा, श्यामा व श्वेता रहती है । प्रतिच्छाया ' संस्थानाकृतिलक्षिता ' होती है । इसके संस्थान जल, ऐना, आतप आदि होते हैं और आकृति अल्प, मध्य, महान् इ. होती है ।

ब्राजक पित्त व प्रभा दोनों तेजस् होने के कारण ब्राजक, प्रभा की वृद्धि करता है और प्रभा, छाया को प्रकाशित करती है ।

इस ब्राजक पित्त का संबंध हमारी राय में वसाख्य तेज से है । यह तेज ही मांसधरात्वक् में केश ग्रहों के नीचे जो स्निग्धपिंड ' हैं उनमें रहता है और स्वचा को मृदु, चिकनी व कांतियुक्त रखता है । इसमें पक्ति धर्म भी है जैसा कि ' तेन मार्दवंसौकुमार्यमृदुत्प रोमतात्साहृष्टिस्थितिपात्तिकातिदीप्तयो भवंति ' इसमें स्वीकार किया गया है । और यदि यह सत्य हो तो वसाख्य तेज की व्याप्ती के अनुसार ब्राजक पित्त को भी अधिक व्यापक बनाना उचित था ।

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परिशिष्ट

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श्लेष्मा के प्रकार

कार्य के अनुसार श्लेष्मा के भी पांच प्रकार किये गये।
जैसा कि:—हृदक, अवलंबक, बोधक, तर्पक, और श्लेपक।

हृदक:—इसके विषय में यह कहा गया है कि:—

तत्र आमाशयः....चतुर्विधस्य आहारस्य आधारः

सच तत्र औदुम्बैर्गुणैराहारः प्रकृत्नो भिन्नसंघातः

सुखजरश्च भवति ॥

माधुर्यातिपिच्छलत्वाच्चप्रकृतेदित्वात्तथैवच ।

आमाशये संभवति श्लेष्मा मधुरशीतलः ॥

सतत्रस्थ एव स्वशक्त्या शेषाणां श्लेष्मस्थानानां

शरीरस्योदक कर्मणाऽनुग्रहं करोति ॥ (सु. सू. अ. २१)

अर्थात् आमाशय, चतुर्विध अन्नपान का (पहिला) आधार-स्थान है उसमें तत्रत्य उदक गत गुणों के द्वारा आहार पतला होता है, उसके कण अलग अलग होते हैं और वह पाचन के योग्य बनता है। उक्त उदक के माधुर्य, पेंच्छित्य और प्रकृतेदित्य इन गुणों पर से यह सिद्ध होता है कि मधुर व सोमात्मक श्लेष्मा, (सर्वेप्रथम) आमाशय में पैदा होता है। आमाशयस्थ यह श्लेष्माही अपनी शक्ति (बल) व उदक कर्म से अन्य श्लेष्मस्थानों को और शरीर को उपकृत करता है।

महास्रोत की श्लेष्मधरा कला में 'सूर्य मंडलों' के सहस्र ही सहस्रों 'सोममंडल' हैं और उनसे हृदक स्रुत होता है। इसके भी स्थानतः प्रभेद किये जा सकते हैं। जैसा कि:—

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मुखगत क्लेदकः—यह कर्णमूलस्थ पिंडोंसे व घीवक पिंडों से स्तुत होता है और लालारस में 'मुखगतपाचकपित्त' के साथ शामिल रहता है। लालारस में इनके साथ २ बोधक कफ भी रहता है अन्नकर्णों को अलग २ करना जो कि एक रासायनिक कार्य है; सुख्यतः लालासत्य नामक अभिपूर्त्ता का अर्थात् मुखगतपाचकपित्त का है। पर यह कार्य सुखपूर्वक होने के लिये क्लेदन की आवश्यकता रहती है।

आमाशय गत क्लेदकः—आमाशय की उपश्लेष्मी कला में जो श्लेष्मपिंड हैं उनसे यह स्तुत होता है और जाठर रस में अम्लपित्त के साथ शामिल रहता है।

शुद्रांत्रगत क्लेदकः—शुद्रांत्र की उपश्लेष्मी कला में सोममंडलों के गुच्छ के गुच्छ हैं जोकि सूर्यमंडलों को घेरे हुए हैं। इनसे क्लेदक स्तुत होता है।

बृहदत्रगत क्लेदकः—यहां के 'सोममंडल,' शुद्रांत्रस्थ मंडलों की अपेक्षा बड़े हैं। उनसे पैदा होने वाला क्लेदक ही यहां का प्रधान रस है।

चूक जब कि शरीरगत उदक सिद्धांततः श्लेष्मा है और उसकी पूर्ति क्लेदक करता है तब पित्तगत उदक भी इसका ही अंश है। और इस कारणही लालारस में तथा याकृतपित्त में पिच्छिच्छगुण श्लेष्क उपलब्ध होता है।

अवलंबकः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

उरःस्थः, त्रिकसंधारणमात्सवीर्येणान्नरस-

सहितेन हृदयावलंबनं करोति । (सु. सू. अ. २१)

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अर्थात् वह हैदक ही उरोभाग में संचार करके त्रिक (ऊर्ध्वत्रिक) को धारण करता है और अन्नरस से युक्त अपनी शक्ति से हृदय का अवलंबन करता है, अतः उसको अवलंबक कहते हैं।

यह श्लेष्मा, 'अवलंबिकाकला' में रहता है। अवलंबिका कला, फुफ्फुसावरण और हृदयावरण इनके दो तहों के बीच में रहती है। इसमें एक तरल बहुत थोड़ी मात्रा में रहता है। इसमें रस धातु मिश्रित है। इस तरल की यहाँ उतनी ही मात्रा रहती है जिससे कि हृदय को व फुफ्फुस को किधर से भी रगड़ या धक्का न लगने पावे और उनका निमेषोन्मेषण भी आसानी से होता रहे। इस तरल के अर्थात् ही अवलंबक के विकृत होने पर 'उरस्तोय' (प्ल्यूरसी) नामक भयंकर रोग होता है। अवलंबिका कला, त्रिक में बंधी हुई है और वहाँ से ही (संभवतः) अवलंबक का आगम होता है। वाग्भट ने इसको ही शेष श्लेष्मस्थानों का अवलंबन कर्ता कहा है।

बोधकः—इसके विषय में यह कहा गया है कि—

जिन्हामूलकंठस्थो जिन्हेन्द्रियस्य

सौम्यस्त्वात् सम्यक् रसज्ञाने प्रवर्तते। (सु. सू. अ. २१)

अर्थात् बोधक कफ, जिन्हामूल व कंठ में रहता है। जिन्हेन्द्रिय, सोमगुणात्मक होने के कारण उससे रसज्ञान होता है।

रसज्ञान यद्यपि धातुप्रसाद के कारण अर्थात् प्राणधर्म के कारण होता है तथापि रसज्ञान के समय अलांश का बोधक से गीला होना जरूरी है। बोधक कफ, जिन्हाधःस्थ 'बोधककफ पिंडों' से सुत होता है।

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तर्पकः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

शिरःस्थः स्नेहसंतर्पणाधिकृतत्वात्

इंद्रियाणामात्मवैर्येणानुग्रहं करोति । (सु. सू. अ.२१)

अर्थात् तर्पक शिर में रहता है । स्नेहन ( चिकनाहट ) और तर्पण ( तरी ) उसका कार्य है । यह अपनी शक्ति से समस्त इंद्रियों पर अनुग्रह करता है ।

मस्तिष्क और सुषुम्नारज्जु के बीच में ' पश्मापरा ' Ciliated Epithelium की बनी हुई एक थैली है । इस थैली में यह भरा रहता है । यह मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को भीतर से तर रखता ही है सिवाय इसके आवरणों के बीच में और उनकी सतह पर फैल कर बाहर से भी तर रखता है ।

काय्य ने संभवतः इसीके उपलक्ष्य में यह कहा है कि ' अकुपित स्नेष्मा, उत्साह शान, बुद्धि, क्षमा, धृति, अलोभ आदि भावोंको पैदा करता है आर कुपित स्नेष्मा आलस्य, अशान, मोह, आदि ताद्विपरीत भावों को ।

इस तर्पक की विकृति से ही ' मोहज्वर ' ( Meningitis ) होता है ।

इस तर्पक के द्वारा अन्य इंद्रियों का तर्पण होना जिस हेतु से कहा गया है उस पर विचार किया जाय तो यह ज्ञात होगा कि जहां २ पश्मापरा है वहां २ के तरल को ऋषि, तर्पक कहना चाहते हैं । क्योंकि पश्मापरा शरीर में अन्यत्र भी रहती है; उससे

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( तद्गत श्लेष्मपिंडों से ) भिन्न २ प्रकार के श्लेष्मा भी पैदा होते हैं और उनका भी प्रधान कार्य तर्पण ही है। उदाहरणार्थ—श्रासमार्ग के भीतर की श्लेष्मवराकला में पश्मापरा है और तद्गत पिंडों से एक प्रकार का श्लेष्मा पैदा होता है। उसी तरह दोनों अपस्तंभों और उनकी शाखा प्रशाखाओं की दिवाल में भी पश्मापरा है। फुफ्फुस में इस तर्पक के साथ ‘ श्लेषक ’ भी रहता है। नाक के भीतरी भाग में पश्मापरा है और वहां कुछ पिंड हैं। इन पिंडों से पैदा होने वाले तरल से नाक का भीतरी भाग तर रहता है और इस तरल में जो वस्तु घुल जाती है उसके गंध का ज्ञान होता है। इसका फोफुस तर्पक के साथ संबंध है। स्त्रियों के गर्भाशय और फलवाहिनीयों में पश्मापरा है और उससे पैदा होने वाला तरल स्त्री प्रजननैन्द्रिय का तर्पण करता है। उसी तरह पुरुष के वृषणगत ‘ उर्ध्वगाभीस्त्रोत्तों ’ में पश्मापरा है और उससे भी एक प्रकार का खाव होता है। सारंश पश्मापरा से पैदा होने वाले तरल को सामान्यतः तर्पक कहते हैं।

श्लेषकः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

संधिरथस्तु श्लेष्मा सर्वसंधिसंश्लेषात्

सर्वसंध्यनुग्रहं करोति । ( सु. सू. अ. २१ )

अर्थात् श्लेषक संधियों में रहता है और सब प्रकार की संधियों को लिपट कर बांधता है।

उदक में अथवा क्लेदक में रहने वाले पिच्छल गुण पर से इसका ज्ञान हुआ। शरीर में इसके अनेक प्रकार उपलब्ध होते हैं जो कि भिन्न २ स्थानों में अपने उत्पादक अणु अवयवों अर्थात् पिंडों

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से पैदा होते हैं। तदनुसार इनके रासायनिक संगठन में और गुणधर्मों में भी भिन्नता रहती है। लार, जाठर रस, पित्त, मूत्र तथा शरीर में पैदा होने वाले अन्य कई प्रकार के रसों में ये रहते हैं। प्रत्येक अणु अवयव में, उनकी संधि में, कलाओं में, ( कलाएँ श्लेष्म, स्नायु, fibres और अपरा ओ Epithelium की बनी हुई हैं ) धातुओं में, पर्वों में, प्रतानों में, खास संस्था में, अंतः फलों में, कलल में, तथा नेत्र में ये प्रकार उपलब्ध होते हैं। इनमें कुछ धर्म समान होते हैं। यद्यपि ये सब श्लेषक हैं तथापि इनका सब का जो मूलभूत द्रव्य है वही मुख्य है अतः उसको ही ‘ श्लेषक ’ ( mucin ) कहना उचित है। यह ‘ स्तंभापरा ’ के श्लेष्मपिंडों से विशुद्ध अवस्था में भी पैदा होता है। यह स्तंभापरा महाश्लोत में मुख से गुदतक है।

इस पर से यह भली भांति ज्ञात होता है कि शरीर गत समस्त पदार्थों का वात-पित्त-श्लेष्माओं में समन्वय करने की बुद्धि से उत्क प्रकारों की कल्पना की गई है। इस कल्पना को वैज्ञानिक-दृष्ट्या पूर्ण करना भविष्य-के आधीन है।

सत्व के प्रकार

यद्यपि ‘ वृत्ति ’ तः सत्व, एक है तथापि विशेषताओं के कारण उसके अनेक प्रकार माने गये हैं। विशेषकर भावों के विषय में यह कहा गया है कि “ सत्त्ववैशेष्यकराणि पुनस्तेषां तेषां प्राणिनां मातापितृसत्त्वान्यन्तर्वर्तन्याः श्रुतयश्चाभिर्गुणं स्वीचिन्ते च कर्म सत्त्वविशेषाभ्यासश्चेति ”। [ चं. शा. अ. ८ ] अर्थात् भिन्न २ प्राणियों का ( क्षेत्रज्ञ के साथ आया हुआ ) सत्व, अपने २ मातापिता ( फल क बीज ) के सत्त्वों का अनुकरण करता है। गर्भावस्था में गर्भिणी के

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श्रुतगतिचितित का भी गर्भसत्व पर संस्कार होता है। पूर्वजन्माजीत विशेषताएँ उसमें रहती ही हैं और इस जन्म में भी वह विशिष्ट प्रकार का बौद्धिक अभ्यास करता है। इन सब कारणों से सत्व में अनेक विशेषताएँ पैदा होती हैं। अन्यत्र यह भी कहा गया है कि ‘ योनिविशेष और अवयत रचना विशेष के कारण ( अन्योन्यानुविधायित्व के कारण ) सत्व में जो विशेषताएँ पैदा होती हैं उनमें सात्विकादि प्रभेदों और उनके तरतमादि योगों से जो प्रकार होते हैं वे अखेख्य हैं’। संक्षेप में इनका दो तरह से विवेचन उपलब्ध होता है; बलभेदानुसार और महाप्रकृति संज्ञक।

बलभेदानुसारः-सत्वमुच्यते मनः। तत् शरीरस्य तंत्रकमात्मसंयोगात्।
त्रिविधं बलभेदेन प्रवरमध्यमवर्गमिति। अतश्च प्रवरमध्यावरसत्वा भवति
पुरुषाः। तत्र प्रवरसत्वाः स्वत्पास्ते सारेपूषदिष्टाः। ( यथा स्मृतिमंतो,
भक्तिमंतः, कृतज्ञाः, प्राज्ञाः, शुचयो, महोत्साहा, दक्षा, धीराः,
समरविर्कांतयेधिनः, त्यक्तविषादाः, स्ववस्थितगततिर्गभीरखुडिचेतसः,
कल्याणाभिनिवेशिनश्च ) स्वल्पशरीराद्यपि ते निजगंगुनिमितासु
महतीष्वपि पीडास्वव्यथा दृश्यंते सत्वगुणविशेष्यात्। मध्यमसत्वास्तु
अपरानात्मस्युपधाय संस्तंभयत्यात्मनात्मानं परैश्रापि संस्तंभ्यंते।
हीनसत्वास्तु नात्मना नापि परैः सत्वबलं प्रति शक्यंते उपस्तंभयितुम्।
महाशरीरा ह्यपि ते स्वल्पानामपि वेदानामसहा दृश्यंते;
सन्नद्धितभयशोकलोभमोहमाना रोद्रभैरवद्विष्टभीमस्तविकृत संकथास्वपि
च पशुपुरुषमांसशोणितानि चाविश्य विषादवैषण्यमूर्च्छांमाद
अमप्रपतनानामन्यतममानुबल्यथा मरणमिति। (च. वि. अ. ८)

सत्व कहते हैं मन को। वह आत्मा के संबंध से शरीर का संज्ञक है। बल के प्रवर, मध्य और अवर भेदानुसार वह तीन प्रकार

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का है। अतः पुरुषों में भी प्रवरसत्व, मध्यसत्व और अवरसत्व इस तरह तीन प्रकार दिखाई देते हैं। तहां प्रवर सत्व, जो कि कम उपलब्ध होते हैं; उनका वर्णन सार के विवेचन में किया गया है। (ये स्मृतिशास्त्री, भक्तिमान, कृतज्ञ, बुद्धिमान्, पवित्र, बड़े उत्साहयुक्त, अपने कार्य में दक्ष, धैर्यशील, समर में खूब लड़ने वाले, विषाद रहित सुस्थिरगति, गंभीरबुद्धि और कल्याणचित्तक होते हैं) छोटे डील वाले होते हुए भी इनका सत्व बलवान् होता है। फलतः वे निजगंतुक व्याधियों के कष्ट सहन करते हुए दिखाई देते हैं। मध्य-सत्व पुरुषों में यद्यपि कष्टसहिष्णुता कम होती है तथापि दूसरों के ढाटस को देख कर अथवा दूसरों के द्वारा ढाटस दिये जाने पर उनको धैर्य आ जाता है। किंतु हीनसत्व पुरुष किसी अवस्था में भी धैर्य नहीं रख सकते। उनका डील कितना ही बड़ा क्यों न हो पर वे तनिक भी कष्ट सह नहीं सकते। भय, शोक, लोभ, मोह सब्दा उनके पास रहते हैं। उग्र, भीतिप्रद, क्रोधयुक्त, बीभत्स या विकृत बातों को सुनकर अथवा प्राणियों के रक्त-मांस को देखकर उनको बड़ा दुःख होता है, चेहरा फीका पड़ जाता है, मूर्च्छा आंन लगती है, भ्रम हो जाता है, उन्माद होता है, पतन होता है और कदाचित् मृत्यु भी होती है।

महाप्रकृति संज्ञकः —शुद्ध सत्व, दोष रहित और कल्याणांश युक्त रहता है। यह ब्राह्म, आर्य, ऐंद्र, याम्य, वरुण, कौवेर और गांधर्व इस तरह सात प्रकार का है और तदनुसार शुद्धसत्व पुरुष भी सात प्रकार के हैं। तहां:—

(१) ब्राम्ह काय पुरुषः—ये पवित्र, सत्यपरायण, जितेंद्रिय, न्यायप्रिय, ज्ञानविज्ञान सम्पन्न, वक्ता, जिम्मेदार, स्मरण रखने वाले,

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काम क्रोध लोभ मान इष्यां इषं इनकी असत्यवृत्ति से रहित और भूत मात्र में समदृष्टि रखने वाले होते हैं।

(२) आर्ष कायः—ये भजन वेदाध्ययन, व्रत होम, ब्रह्मचर्य, अतिथिसेवा इनमें रत रहते हैं। बुद्धिमान् और ज्ञान विज्ञान सम्पन्न होते हैं। इनके मद, मान राग, द्वेष, रोष आदि शांत रहते हैं।

(३) ऐंद्र कायः—ये ईश्वर प्रिय, यज्ञ कर्ता, तेजस्वी, ओजस्वी, शूर, दूरदर्शी और धर्मार्थकामों का समान उपयोग करने वाले होते हैं। इनका कहा सब मानते हैं।

(४) वाम्य कायः—ये स्मृतिमान्, ऐश्वर्यशाली और राग द्वेष मोह रहित होते हैं। ये लिखित नियमों के तथा प्रसंग के अनुसार काम करते हैं।

(५) वरुण कायः—ये शूर, धीर, स्वच्छ, अस्वच्छता द्वेषी, यज्ञकर्ता, जलविहारप्रिय, सुख कर्ता और योग्य स्थल में भ्रम व प्रसन्नता व्यक्त करने वाले होते हैं।

(६) कौबेर कायः—ये शुचिर्भूत, धर्मार्थपरायण, सुखविहारकर्ता, बहुपश्चिवार और योग्य स्थल में मानोपभोगाकांक्षी होते हैं। इनके राग व प्रसाद स्पष्ट होते हैं।

(७) गांधर्व कायः—ये नृत्य, गीत, वाद्य, स्तुति, कविता, कथा, इतिहास, पुराण इनमें कुशल होते हैं। इनको स्त्री, वस्त्राभूषण, फूल व सुगन्ध प्रिय रहते हैं। ये किसी से ईषां द्वेष नहीं रखते।

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आयुर्वेद दर्शन

राजसुसत्व, रोषाशयुक्त रहता है। यह दैत्य, राक्षस, पैशाच, सारंग, प्रेत, व शकुन इस तरह छः प्रकार का है। तदनुसारः—

(१) दैत्य कायः—ये शूर, भयंकर, परोक्षप्रसाहिण्य, ऐश्वर्यशाली, उग्र, निर्दय, बहुभोजी और आपमतलक्षी होते हैं।

(२) राक्षस कायः—ये क्रोधी, क्रूर, सुकृषड, मांसप्रिय, निद्रालु, छिद्रान्वेषी, मेहेनती व ईर्ष्यायुक्त होते हैं। अपमान या नीचापन इनको बिलकुल सहन नहीं होता।

(३) पैशाच कायः—ये महा आलसी, लंपट, स्त्रियों में बड़ी बड़ी बातें बनाने वाले, अपवित्र, पवित्रताद्वेषी, डर बताने वाले, किंतु डरपोक, सर्वभक्षी और अनाचारी होते हैं।

(४) सारंग कायः—ये क्रोधी, शूर, मिडर, क्रूर, तीखे मिजाज, ताडवाज, जासूस, झूठ समझने वाले और मितहाराविहार होते हैं।

(५) प्रेत कायः—ये सुकृषड, क्षुद्रस्वभाव, क्षुद्राचार, क्षुद्रोपचार, निंदक, स्वार्थी, अतिलोभी और हर काम में अयोग्य होते हैं।

(६) शकुन कायः—ये सदा वासनायुक्त, सदा खान-पान-रत, अतिधर चित्त, अपमानासहिण्य, उडाऊ, और धन-संचय न करने वाले होते हैं।

तामस सत्व में मोह का अंश रहता है। यह पशु, मत्स्य और चनस्वति इन तीन प्रकारों का रहता है। तदनुसारः—

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(१) पशु कायः—ये झगडाड़, दरिद्रवेण, निर्दित आहाराविहार, अतिव्यभिचारी, और निद्राछ होते हैं।

(२) मात्स्य कायः—ये डरपोक, मूर्ख, भुक्खड, अस्थिर चित्त, सर्वदा कामक्रोध रत, भटकने वाले और जलप्रिय होते हैं।

(३) वनस्पति कायः—ये आलसी, सुक्खड, व हीन ज्ञानेन्द्रिय होते हैं।

उक्त सब प्रकार एक ही पुरुष में रह सकते हैं किन्तु एक समय में नहीं रह सकते। अभ्यास से इनमें परिवर्तन भी हो सकता है।