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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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परिशिष्ट

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( तद्गत श्लेष्मपिंडों से ) भिन्न २ प्रकार के श्लेष्मा भी पैदा होते हैं और उनका भी प्रधान कार्य तर्पण ही है। उदाहरणार्थ—श्रासमार्ग के भीतर की श्लेष्मवराकला में पश्मापरा है और तद्गत पिंडों से एक प्रकार का श्लेष्मा पैदा होता है। उसी तरह दोनों अपस्तंभों और उनकी शाखा प्रशाखाओं की दिवाल में भी पश्मापरा है। फुफ्फुस में इस तर्पक के साथ ‘ श्लेषक ’ भी रहता है। नाक के भीतरी भाग में पश्मापरा है और वहां कुछ पिंड हैं। इन पिंडों से पैदा होने वाले तरल से नाक का भीतरी भाग तर रहता है और इस तरल में जो वस्तु घुल जाती है उसके गंध का ज्ञान होता है। इसका फोफुस तर्पक के साथ संबंध है। स्त्रियों के गर्भाशय और फलवाहिनीयों में पश्मापरा है और उससे पैदा होने वाला तरल स्त्री प्रजननैन्द्रिय का तर्पण करता है। उसी तरह पुरुष के वृषणगत ‘ उर्ध्वगाभीस्त्रोत्तों ’ में पश्मापरा है और उससे भी एक प्रकार का खाव होता है। सारंश पश्मापरा से पैदा होने वाले तरल को सामान्यतः तर्पक कहते हैं।

श्लेषकः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

संधिरथस्तु श्लेष्मा सर्वसंधिसंश्लेषात्

सर्वसंध्यनुग्रहं करोति । ( सु. सू. अ. २१ )

अर्थात् श्लेषक संधियों में रहता है और सब प्रकार की संधियों को लिपट कर बांधता है।

उदक में अथवा क्लेदक में रहने वाले पिच्छल गुण पर से इसका ज्ञान हुआ। शरीर में इसके अनेक प्रकार उपलब्ध होते हैं जो कि भिन्न २ स्थानों में अपने उत्पादक अणु अवयवों अर्थात् पिंडों