आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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श्लेष्मा के प्रकार
कार्य के अनुसार श्लेष्मा के भी पांच प्रकार किये गये।
जैसा कि:—हृदक, अवलंबक, बोधक, तर्पक, और श्लेपक।
हृदक:—इसके विषय में यह कहा गया है कि:—
तत्र आमाशयः....चतुर्विधस्य आहारस्य आधारः
सच तत्र औदुम्बैर्गुणैराहारः प्रकृत्नो भिन्नसंघातः
सुखजरश्च भवति ॥
माधुर्यातिपिच्छलत्वाच्चप्रकृतेदित्वात्तथैवच ।
आमाशये संभवति श्लेष्मा मधुरशीतलः ॥
सतत्रस्थ एव स्वशक्त्या शेषाणां श्लेष्मस्थानानां
शरीरस्योदक कर्मणाऽनुग्रहं करोति ॥ (सु. सू. अ. २१)
अर्थात् आमाशय, चतुर्विध अन्नपान का (पहिला) आधार-स्थान है उसमें तत्रत्य उदक गत गुणों के द्वारा आहार पतला होता है, उसके कण अलग अलग होते हैं और वह पाचन के योग्य बनता है। उक्त उदक के माधुर्य, पेंच्छित्य और प्रकृतेदित्य इन गुणों पर से यह सिद्ध होता है कि मधुर व सोमात्मक श्लेष्मा, (सर्वेप्रथम) आमाशय में पैदा होता है। आमाशयस्थ यह श्लेष्माही अपनी शक्ति (बल) व उदक कर्म से अन्य श्लेष्मस्थानों को और शरीर को उपकृत करता है।
महास्रोत की श्लेष्मधरा कला में 'सूर्य मंडलों' के सहस्र ही सहस्रों 'सोममंडल' हैं और उनसे हृदक स्रुत होता है। इसके भी स्थानतः प्रभेद किये जा सकते हैं। जैसा कि:—