आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुर्वेद-दर्शन
घनविरलता के कारण 'वक्कीभवन' होता है। फलतः फैले हुए प्रकाश किरण लिमिट जाते हैं और बड़े से बड़े दृश्य की प्रतिमा उसके अंतर के सहित अत्यल्प अवकाश या बिंदु में समा जाती है।
रूप ग्रहण के लिये उक्त 'प्रतिमाबिंदु' का लिंग भाग पर पड़ना आवश्यक है। जब तक उक्त 'नेत्रगत प्रतिमाबिंदु' लिंग भाग पर ठीक केंद्रित न होगा (आगे या पीछे पड़ता होगा) तब तक रूप-ग्रहण नहीं होगा। यह कार्य नेत्रगत 'केंद्रीकरणसाहस्य' के द्वारा होता है।
पास का या उजियाले का दृश्य देखने के समय 'वर्तुल स्नायु' संकुचित होता है; फलतः दृष्टिसंघटन व दृष्टि दोनों संकुचित जाते हैं और इससे प्रकाशकिरणों का नियमन होता है। इसके विपरीत अर्थात् अधियारे में दृष्टि बड़ी होती है। दृष्टि के इस आकुंचन प्रसरण से देखने में बड़ी सुविधा होती है। दूर का दृश्य देखने के समय 'नेत्र-कंडरा' मध्य पटल को आवश्यक सीमा तक आगे पीछे तानती है। इस तनाव के कारण तृतीय पटल का पुरोभाग भी ओग की तरफ तनकर अधिक बहिर्गोल बनता है। इस व्यापार से प्रकाश-किरणों का उक्त नेत्रगत प्रतिमाबिंदु लिंग भाग पर ठीक-ठीक केंद्रित होता है।
इस तरह बाह्य दृश्य की प्रतिमा लिंग भाग पर जब पड़ती है तब तत्रत्य संकाशकृति अणु अवयवों के तथा नाडियों के कारण रूप ज्ञान होता है। अतः प्रस्तुत में दृष्टि शब्द का अर्थ व्यापक करके अत्रत्य धातु प्रसाद को आलोचकपिक्त कहना उचित है। फिर भी यह ध्यान में रखना चाहिये कि यह विवेचन उन संप्रदायों को मान्य नहीं हो सकता जो रूप ग्रहण को प्राण धर्म का कार्य मानते हैं।