आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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अर्थात् वह हैदक ही उरोभाग में संचार करके त्रिक (ऊर्ध्वत्रिक) को धारण करता है और अन्नरस से युक्त अपनी शक्ति से हृदय का अवलंबन करता है, अतः उसको अवलंबक कहते हैं।
यह श्लेष्मा, 'अवलंबिकाकला' में रहता है। अवलंबिका कला, फुफ्फुसावरण और हृदयावरण इनके दो तहों के बीच में रहती है। इसमें एक तरल बहुत थोड़ी मात्रा में रहता है। इसमें रस धातु मिश्रित है। इस तरल की यहाँ उतनी ही मात्रा रहती है जिससे कि हृदय को व फुफ्फुस को किधर से भी रगड़ या धक्का न लगने पावे और उनका निमेषोन्मेषण भी आसानी से होता रहे। इस तरल के अर्थात् ही अवलंबक के विकृत होने पर 'उरस्तोय' (प्ल्यूरसी) नामक भयंकर रोग होता है। अवलंबिका कला, त्रिक में बंधी हुई है और वहाँ से ही (संभवतः) अवलंबक का आगम होता है। वाग्भट ने इसको ही शेष श्लेष्मस्थानों का अवलंबन कर्ता कहा है।
बोधकः—इसके विषय में यह कहा गया है कि—
जिन्हामूलकंठस्थो जिन्हेन्द्रियस्य
सौम्यस्त्वात् सम्यक् रसज्ञाने प्रवर्तते। (सु. सू. अ. २१)
अर्थात् बोधक कफ, जिन्हामूल व कंठ में रहता है। जिन्हेन्द्रिय, सोमगुणात्मक होने के कारण उससे रसज्ञान होता है।
रसज्ञान यद्यपि धातुप्रसाद के कारण अर्थात् प्राणधर्म के कारण होता है तथापि रसज्ञान के समय अलांश का बोधक से गीला होना जरूरी है। बोधक कफ, जिन्हाधःस्थ 'बोधककफ पिंडों' से सुत होता है।