आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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काम क्रोध लोभ मान इष्यां इषं इनकी असत्यवृत्ति से रहित और भूत मात्र में समदृष्टि रखने वाले होते हैं।
(२) आर्ष कायः—ये भजन वेदाध्ययन, व्रत होम, ब्रह्मचर्य, अतिथिसेवा इनमें रत रहते हैं। बुद्धिमान् और ज्ञान विज्ञान सम्पन्न होते हैं। इनके मद, मान राग, द्वेष, रोष आदि शांत रहते हैं।
(३) ऐंद्र कायः—ये ईश्वर प्रिय, यज्ञ कर्ता, तेजस्वी, ओजस्वी, शूर, दूरदर्शी और धर्मार्थकामों का समान उपयोग करने वाले होते हैं। इनका कहा सब मानते हैं।
(४) वाम्य कायः—ये स्मृतिमान्, ऐश्वर्यशाली और राग द्वेष मोह रहित होते हैं। ये लिखित नियमों के तथा प्रसंग के अनुसार काम करते हैं।
(५) वरुण कायः—ये शूर, धीर, स्वच्छ, अस्वच्छता द्वेषी, यज्ञकर्ता, जलविहारप्रिय, सुख कर्ता और योग्य स्थल में भ्रम व प्रसन्नता व्यक्त करने वाले होते हैं।
(६) कौबेर कायः—ये शुचिर्भूत, धर्मार्थपरायण, सुखविहारकर्ता, बहुपश्चिवार और योग्य स्थल में मानोपभोगाकांक्षी होते हैं। इनके राग व प्रसाद स्पष्ट होते हैं।
(७) गांधर्व कायः—ये नृत्य, गीत, वाद्य, स्तुति, कविता, कथा, इतिहास, पुराण इनमें कुशल होते हैं। इनको स्त्री, वस्त्राभूषण, फूल व सुगन्ध प्रिय रहते हैं। ये किसी से ईषां द्वेष नहीं रखते।