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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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परिशिष्ट

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(१) पशु कायः—ये झगडाड़, दरिद्रवेण, निर्दित आहाराविहार, अतिव्यभिचारी, और निद्राछ होते हैं।

(२) मात्स्य कायः—ये डरपोक, मूर्ख, भुक्खड, अस्थिर चित्त, सर्वदा कामक्रोध रत, भटकने वाले और जलप्रिय होते हैं।

(३) वनस्पति कायः—ये आलसी, सुक्खड, व हीन ज्ञानेन्द्रिय होते हैं।

उक्त सब प्रकार एक ही पुरुष में रह सकते हैं किन्तु एक समय में नहीं रह सकते। अभ्यास से इनमें परिवर्तन भी हो सकता है।