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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद दर्शन

राजसुसत्व, रोषाशयुक्त रहता है। यह दैत्य, राक्षस, पैशाच, सारंग, प्रेत, व शकुन इस तरह छः प्रकार का है। तदनुसारः—

(१) दैत्य कायः—ये शूर, भयंकर, परोक्षप्रसाहिण्य, ऐश्वर्यशाली, उग्र, निर्दय, बहुभोजी और आपमतलक्षी होते हैं।

(२) राक्षस कायः—ये क्रोधी, क्रूर, सुकृषड, मांसप्रिय, निद्रालु, छिद्रान्वेषी, मेहेनती व ईर्ष्यायुक्त होते हैं। अपमान या नीचापन इनको बिलकुल सहन नहीं होता।

(३) पैशाच कायः—ये महा आलसी, लंपट, स्त्रियों में बड़ी बड़ी बातें बनाने वाले, अपवित्र, पवित्रताद्वेषी, डर बताने वाले, किंतु डरपोक, सर्वभक्षी और अनाचारी होते हैं।

(४) सारंग कायः—ये क्रोधी, शूर, मिडर, क्रूर, तीखे मिजाज, ताडवाज, जासूस, झूठ समझने वाले और मितहाराविहार होते हैं।

(५) प्रेत कायः—ये सुकृषड, क्षुद्रस्वभाव, क्षुद्राचार, क्षुद्रोपचार, निंदक, स्वार्थी, अतिलोभी और हर काम में अयोग्य होते हैं।

(६) शकुन कायः—ये सदा वासनायुक्त, सदा खान-पान-रत, अतिधर चित्त, अपमानासहिण्य, उडाऊ, और धन-संचय न करने वाले होते हैं।

तामस सत्व में मोह का अंश रहता है। यह पशु, मत्स्य और चनस्वति इन तीन प्रकारों का रहता है। तदनुसारः—