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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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Page 223

परिशिष्ट

२०३

भ्राजक पित्तः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

यत्तु त्वच्चि पित्तम् तस्मिन्भ्राजकोऽग्निरिति संज्ञा;
सोऽभ्यंगपरिषेकावगाह्यावलेपनादीनां क्रियाद्व्ययाणां
पक्ता, छायानां च प्रकाशकः ॥ (सु. सू. अ. २१)

अर्थात् जो पित्त त्वचा में रहता है तद्वत्त आग्नि को भ्राजक कहते हैं। भ्राजक, मालिश, भंपारे, स्नान, लेप आदि उपायों के द्वारा व्यवहार की जानेवाली औषधियों का पाचन करता है और छायाओं को प्रकाशित करता है।

त्वचा के द्वारा कई तरह की औषधियों को तथा स्नेहों को शोषित किया जाता है। भ्राजक पित्त, इन शोषित पदार्थों का पाचन करके उनको शारीर धातुओं में उपशयन करने योग्य बनाता है। वाग्भट ने अपने भ्राजक पित्त के विवेचन में इस कार्य का उल्लेख नहीं किया है।

साधारणतया मनुष्य, काले, कालेसांबले, निमगोरे, या गोरे होते हैं। इसके अतिरिक्त भी कुछ प्राकृतिक वर्ण हैं। फिर भी केवल नील, केवल श्याम, केवल ताम्र, हरित, और श्वेत ये अप्राकृतिक कहे जाते हैं।

वर्ण, प्रभा और छाया से युक्त रहते हैं। कोई भी पुरुष बिना प्रभा या छाया के नहीं रह सकता। प्रभा वर्ण को प्रकाशित करती है तो छाया तिरोहित करती है। प्रभा दूर से भी चमकती है पर छाया पास से दिखाई देती है।