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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages
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भिखु आत्रेय का कालवाद

१४१

और:—

‘विसर्गादानविश्वेषैः सोमसूर्यानिला यथा ।

धारयति जगदेहं कफपित्तानिला तथा ॥ ३०

किंतु जब इन सब वदनाओं का तात्विक दृष्टि से विचार होने लगा तब इस विषय में भिन्न २ मत प्रकट किये जाने लगे ।

धातुपंचकवादियों का कहना था कि जब कि सोमसूर्य-वायु, तत्त्वतः धातुपंचक से आविरिक्त नहीं हैं तब संवत्सरात्मक काल भी धातुपंचक का ही परिणाम है ।


१ त्रिधातुसिद्धांत या प्रजापतिवाद के अनुसार यहाँ अनिल, सूर्य, सोम शब्दों से घर्मत्रयी का भी ग्रहण किया जा सकता है । पर उस अवस्था में विशेष का अर्थ ‘व्यक्तीभवन’ होगा । क्योंकि भिखु आत्रेय ने काल को और उक्त दोनों संप्रदायोंने वायु को ‘जगद्व्यक्ति कर’ अथवा ‘भावकर’ ही सिद्ध किया है । अन्यत्र भी विशेष का अर्थ ‘सूक्ष्म का स्थूल में अथवा एक का अनेक में परिणत होना’ ही किया गया है । जैसा कि ‘द्वे रूपे निश्चिते पूर्वे मायायाः कूलनंदन । विशेषावरणे तत्र प्रथमं कल्पयेज्जगत् ॥ लिंगाद्य ब्रह्म-पर्यंतं सूक्ष्म स्थूल विभेदतः । अपरं त्वखिलं ज्ञानरूपमाहृत्य तिष्ठति ॥ इस पर से व्यक्त होता है । ‘विसर्ग’ और ‘आदान’ शब्दों से ‘संस्कत्याकर्षण’ तथा ‘घनता’ के अर्थात ही बल के दृष्टि-क्षयों को स्वीकार करना उचित है ।

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आयुर्वेद-दर्शन

षड्धातुवादियों का भी यही कथन था पर वे धातु-पंचक को अप्रतीघातकत्वादि गुण मात्र मानते थे। अतः उनकी दृष्टि से संवत्सरात्मककाल गुणों का परिणाम सिद्ध होता था।

अग्नीषोमवादियों की दृष्टि मुख्यतः अग्नीषोम संज्ञक धर्म द्रव्य पर थी। वे काल को इन धर्मों का ही परिणाम समझते थे। धातुपंचकवादियों के प्रति उनका यह कथन था कि “धातुपंचक में प्रतीत होने वाले गुर्वादिगुण जब कि उष्ण व शीत इन दो प्रधान वीर्यों के विविध संयुक्त परिणाम हैं और उक्त जागतिक विभूतियों में भी इनका ही अस्तित्व प्रतीत होता है तब उक्त विभूतियाँ और पंचधातु तत्त्वतः अग्नीषोमात्मक हैं। उसी तरह संवत्सरात्मक काल में भी जब कि उष्ण शीत प्रयुक्त आदानविसर्गात्मक दो ही प्रधान विभाग दिखाई देते हैं तब काल भी अग्नीषोम का ही परिणाम है। अग्नीषोम-वादियों के इस वक्तव्य को अष्टांगसंग्रह में “अन्ये तु गुर्वा-दीनांमग्नीषोमात्मकत्वात् आदानविसर्गविभागेन कालस्य च उष्णशीतात्मकत्वात् द्विविधमेवामनंति।” (अ. सं. सू. अ. १७) इस तरह उद्धृत किया है।

यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि उक्त सब संप्रदाय, काल विषयक अपना मत स्थिर करने के समय

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भिक्षु आत्रेय का कालवाद

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मुख्यतः शीतोष्णवर्षलक्षणों अथवा स्वभावों पर ही ध्यान रखते थे। परिभ्रमण गतियों पर उनका समुचित लक्ष्य नहीं था।

किंतु भिक्षु आत्रेय का ध्यान इन परिभ्रमण गतियों पर था। वे एक ऐसी विश्वव्यापिनी गति या शक्ति का अनुभव करते थे जो कि उक्त स्वभाव तथा मार्गों की जनयित्री है। अन्वेषण से उनको यह भली-भांति ज्ञात हुआ कि समस्त जगत् में जो कुछ भी हलचल ( कलयति ) या संगठन ( कालयति ) है वह इसके ही कारण है। यह एक कला भी स्थिर या तिरोहित ( कलां न लीयते ) नहीं होती। और वह उत्पत्तिविनाश रहित ( अनादि निधनः ) है। वे इसको ' काल ' शब्द से संबोधित करते थे। और यह प्रतिपादन करते थे किः—

तावेतावर्कवायू सोमश्च कालस्वभावमार्ग परिगृहीताः;
काल, ऋतु, रस, दोष, देह, बल, निर्वृत्ति प्रत्ययभूताः समुप-
दिश्यते । ( च. सू. अ. ६ )

अर्थात् ये सूर्यवायुसोम, उस काल संज्ञक शक्ति के स्वभावों और मार्गों से परिगृहीत ( व्याप्त ) हैं अर्थात् इनमें जिन उष्णत्वादि स्वभावों और परिभ्रमण मार्गों की प्रतीति होती है वे तत्त्वतः उस काल संज्ञक गति के प्रकार हैं। और

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आयुर्वेद-दर्शन

इसीसे ये संवत्सर, ऋतु, रस, दोष, देह, बल इनकी उत्पत्ति में कारण कहे जाते हैं ।

भिन्न आत्रेय की इस घोषणा पर से यह भी ज्ञात होगा कि वे धातुपंचक, गुणपंचक और अग्नीषोम धर्म इनका सबका समन्वय काल में करते थे । क्योंकि वे सर्वत्र काल को ही कारण मानते थे, समस्त जगत् को कालवश समझते थे और इसी हेतु काल को पुरुष रोगोत्पादक कहते थे ।

यह हम पहिले बतला चुके हैं कि इस काल का समन्वय वायु में और उस वायु का भी समन्वय प्रजापति में किस कदर किया गया ।

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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक

सिद्धांत

पुनर्वसु आत्रेयः—‘तथ्यार्थिणां विवादतामुवाचैवं पुनर्वसुः’
अर्थात् इस तरह विवाद करते हुए ऋषियों के प्रति पुनर्वसु
आत्रेय ने कहा कि:—

मैवं बोचत तत्त्वं हि दुष्प्रापं पक्षसंश्रयात् ॥

वादान् स प्रतिवादान् हि वदन्तो निश्चितानिव ।

पक्षान्तं नैव गच्छन्ति तिलपीडकवद् गतो ॥

मुक्तवैवं वादसंघट्टमध्यात्मभतुचित्यताम् ।

नाविभूततमस्कंधे ज्ञेये ज्ञानं प्रवर्तते ॥

येषामेव हि भावानां संपत्सजनयेन्नरम् ।

तेषामेव विपद व्याधीन्निविधान्समुदीरयेत् ॥

अर्थात् आप लोग इस तरह विवाद करना छोड़ दें ।
क्योंकि किसी एक ही पक्ष को स्वीकार करने से सत्य तत्व
दुर्लभ हो जाता है । जिस तरह तेही अपनी घानी को ही
चक्कर लगाता रहता है उस तरह यदि आप अपने ही पक्ष
को ठीक समझकर खदतभेदन करते रहेंगे तो सर्व सम्मत
निर्णय पर नहीं पहुँच सकेंगे । अतः इस वाद संघर्ष को
छोड़ कर ‘अध्यात्म’ का चिंतन कीजिये । जबतक पक्षराग-

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आयुवेद-द शीन

रूप मल धुल नहीं जाता तबतक जिज्ञास्य विषय में बुद्धि प्रवेश नहीं करती। वास्तविक सिद्धांत यह है कि ‘जिन भावों’ की ‘संपदा’ से पुरुष पैदा होता है उनकी ‘विपदा’ से व्याधियाँ पैदा होती हैं”।

काशीपति वामक का मुख्य सवाल यह था कि ‘जिन कारणों से पुरुष पैदा होता है उन कारणों से उसको रोग होते हैं या नहीं’। इसका उत्तर सभी ऋषियों ने यह दिया कि ‘जिन कारणों से पुरुष पैदा होता है उन्हीं से उसको रोग भी होते हैं’। पुनर्वसु आत्रेय ने उसी का कुछ संशोधन करके यह निर्णय दिया कि “पुरुषरोगोत्पत्ति में क्रमशः भावों की ‘संपदा’ और ‘विपदा’ कारण हैं”।

किंतु काशीपति के दूसरे सवाल के विषय में अर्थात् ‘पुरुष, किन कारणों से पैदा होता है’ इसके विषय में ऋषियों में गहरा मतभेद था। अतः अब यह देखना आवश्यक है कि इस विषय में पुनर्वसु आत्रेय का अंतिम निर्णय क्या है।

इस पर विचार करने के पहिले यह ध्यान में रखना चाहिये कि यज्ञःपुरुषीय परिषद् में जितने भी ऋषि अथवा संप्रदाय उपस्थित थे उनमें आत्मा को स्वतःसिद्ध न मानने वाले चार संप्रदाय थे। इनमें दो अग्नीषोम लोकपक्षीय

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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागाल्मक सिद्धांत

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और दो पंचाल्मक लोकपक्षीय थे। तहां अग्नीषोम लोक-पक्षीयों का विरोध अधिक प्रबल नहीं था। क्योंकि प्रजा-पतिवाद का उनपर काफी प्रभाव पड़ चुका था। किंतु पंचाल्मकलोकपक्षीयों में भारद्वाज एक ऐसे प्रभावशाली पुरुष थे कि जिनको षड्धातुवादी, आत्मवादी, कर्मवादी और सत्त्ववादी मिलकर भी समझा न सके। पुनर्वसु आत्रेय ने भी षड्धातुवाद का पक्ष लेकर (क्योंकि भारद्वाज, पंचाल्मकलोकपक्षीय थे अतः उनको पंचाल्मकलोकपक्ष के सिद्धान्तों के द्वारा समझाना ही युक्तियुक्त और सरल था) इनको समझाने का यत्न किया। इस प्रकार के एक प्रसंग को हम यहां उद्धृत करते हैं।

‘गर्भावकांति’ पर विचार करते हुए पुनर्वसु आत्रेय ने यह कहा था कि ‘मातृजन्मार्थं गर्भः, पितृजन्म आत्म-जन्म सात्त्व्यजन्म रसजन्म; अस्ति च खलु सत्वमौपपादुकम्’ (च. शा. अ. ३) अर्थात् माता, पिता, आत्मा, सात्त्व्य, इन सब कारणों से गर्भ पैदा होता है और सत्व, इनका सबका संबंध विधायक है। किंतु भारद्वाज ने इनका सबका अलग २ खंडन किया। भारद्वाज के उस वक्तव्यको हम स्वभाववाद के विवेचन में उद्धृत कर चुके हैं। पुनर्वसु आत्रेय ने षड्धातुवादानुसार इसका जो उत्तर दिया वह निम्न लिखित है। जैसा कि:—

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आयुर्वेद-दर्शन

“ नेति भगवान् आत्रेयः, सर्वेभ्य एभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भोऽभिनिर्वर्तते । मातृजन्त्राय गर्भः, न हि मातुर्विना गर्भोत्पत्तिः स्यात् न च जन्म जरायुजानाम् । पितृजन्त्राय गर्भः, न हि पितृकृते गर्भोत्पत्तिः स्यात् न च जन्म जरायुजानाम् । यानि खल्वस्य गर्भस्य मातापितृजानि मातापितृतः संभवतः संभवति, तान्यनुन्याख्यास्यामः । तद्यथा त्वक् च लोहितं च मांसं च मेदश्च नाभिश्च हृदयं च क्रोमं च यकृश्च प्रीहा च वृक्कौ च वस्तिश्च पुरीपाधानं च आमाशयश्च पक्षाशयश्च उत्तरगुदं च अघरगुदं च शुद्धात्रां च स्थूलात्रं च वपां च वपावहनं चेति मातृजानि । केशरमश्रुनखलोमदंतास्थि-सिरास्त्रायुधमन्यः शुक्रमिति पितृजानि ।

आत्मजन्त्राय गर्भो, गर्भात्मा हि अंतरात्मा यः, तं ‘जीव’ इत्याचक्षते । शाश्वतमरुजमजरममरमक्षरमभेद्यमच्छेद्यमलोढ्यं विश्वरूपं विश्वकर्माण्म अन्व्यक्तमनादिमानिधनमक्षरमपि स गर्भाशयमनुग्रविश्य शुक्रशोणिताभ्यां संयोगमेत्य गर्भत्वेन जनयत्यात्मानम् । आत्म संज्ञा हि गर्भे, तस्य पुनरात्मनो जन्म अनादित्वात्रोपपद्यते । तस्माद् जात एव गर्भं जनयति, अजातो हि अयम् अजातं गर्भं जनयति, स चैव गर्भः कालांतरणे बालयुवस्थविरतां प्राप्नोति, स यस्यां यस्यामवस्थायां वर्तते, तस्यां तस्यां जातो भवति । या त्वस्य पुरस्कृता, तस्यां जनित्यमाणश्च । तस्मात् स एव जातश्च अजातश्च युगपद्-

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पुनर्वसु आश्रय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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भवति । यस्मिन्नेतदुभयं संभवति जातत्वं जनित्यमाणं च स जातो जन्यते स चैव अनागतेष्ववस्थांतरेषु अजातो जनयत्यात्मानम् । सतो हि अवस्थांतरगमनमात्रमेव हि 'जन्म' चोच्यते तत्र तत्र वयसि तस्यां तस्यां अवस्थायाम् । यथा सतामेव हि शुक्रशोणितजीवानां प्राक्संयोगात् गर्भत्वं न भवति, तच्च संयोगात् भवति, यथा सतस्तस्यैव पुरुषस्य प्रागपत्यात् पितृत्वं न भवति, तच्च अपत्यात् भवति तथा सतस्तस्यैव गर्भस्य तस्यां तस्यां अवस्थायाम् जातत्वं अजातत्वं चोच्यते ।

न खलु गर्भस्य मातुर्नपितुर्नात्मनः सर्वभावेषु यथेष्टकारित्वमस्ति । ते किंचित् स्ववशात् कुर्वति, किंचित् कर्मवशात् क्वचिच्छैषां करणशक्तेर्भवति क्वचिन्न भवति । यत्र सत्त्वादि करणसंपत् तत्र यथाबलमेव यथेष्टकारित्वम्; अतोऽन्यथा विपर्ययः । न च करणदोषात् अकारणमात्मा संभवति गर्भजनने, दृष्टं च इष्टयोनिरैर्यथैः मोक्षश्च आत्मविद्भिः आत्मान्यत्म् । न हि अन्यः सुखदुःखयोः कर्ता, नच अन्यतो गर्भो जायते जायमानः, न च अकुरोत्यतिरबीजात् ।

यानि तु खलु अस्य गर्भस्य आत्मजानि यानि चास्य आत्मतः संभवतः संभवति तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा तासु तासु योनिषु उत्पत्तिः, आयुः, आत्मज्ञानं, मनः, इंद्रियाणि, प्राणापानौ, श्रेरणं, धारणम्, आकृतिस्वरवरणविशेषाः, सुखदुःखे, इच्छाद्वेषौ, चेतना, धृतिर्बुद्धिः, स्थितिर्हंकारः प्रयत्नश्चैत्यात्मजानि ।

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आयुर्वेद-दर्शन

सात्त्व्यजज्ञायं गर्भः न ह्यसात्त्व्यसेवित्वमंतरेण स्त्रीपुरुष-
योर्यन्ध्यत्वमस्ति गर्भेषु वाप्यनिष्टो भावः, यावत् खलु
असात्त्व्य सेविनां स्त्रीपुरुषाणां त्रयो दोषाः प्रकृपिताः शरीरमुप-
सर्पते न शुक्लशोणितगर्भाशयोपघातायोपपद्यते, तावत्
समर्था गर्भजननाय भवति । सात्त्व्यसेविनां पुनः स्त्री-
पुरुषाणाम् अनुपहत शुक्लशोणितगर्भाशयानाम् ऋतुकाले सन्नि-
पतितानां जीवस्य अन्वक्रमणात् गर्भा न प्रादुर्भवति । नहि
केवलं सात्त्व्यज एवायं गर्भः, समुदायोऽत्र कारणमुच्यते ।
यानि खल्वस्य गर्भस्य सात्त्व्यजानि, यानि चास्य सात्त्व्यतः
संभवतः संभवति तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा-आरोग्य-
मनालस्यमलोलुपत्त्वमिन्द्रियप्रसादः स्वरवर्णबीजसंपत्प्रहरि भूयस्त्वं
चेति सात्त्व्यजानि ।

रसजज्ञायं गर्भः न हि रसादृते मातुः प्राणयात्रापि स्यात्
किं पुनर्गर्भं जन्म । न चैवम् असम्यगुपयुज्यमाना रसा गर्भ-
मभिनिर्वर्तयति । न च केवलं सम्यगुपयोगादेव रसानां गर्भाभि-
निर्वृत्तिर्भवति । समुदायोऽप्यत्र कारणमुच्यते । यानि तु
खल्वस्य गर्भस्य रसजानि, यानि चास्य रसतः संभवतः संभवति
तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा शरीरस्याभिनिर्वृत्तिः अभिवृद्धिः
प्राणानुबंधः तृप्तिः पुष्टिरुत्साहश्चेति रसजानि ।

अस्ति खल्वपि सत्त्वं उपपादुकम्, यत् जीवं 'स्पृक्-
शरीरेण' अभिसंबध्नाति, यस्मिन् अपगमनपुरस्कृते शीलमस्य

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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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व्यावर्तते भक्तिर्विपर्यस्यते सर्वेन्द्रियाण्युपतप्यंते बलं हीयते व्याधय आप्यायंते, यस्माद्धीनः प्राणान् जहति यत् इन्द्रियाणामभिप्राहकं च 'मन' इत्यभिधीयते, तत् त्रिविधमारुहायते शुद्धे राजसे तामसमिति । येनास्य खलु प्रयतो भूयिष्ठम्, तेन द्वितीयायां वा जातौ संप्रयोगो भवति, यदा तु तेनैव शुद्धेन संयुज्यते तदा जातेरतिक्ताताया अपि स्मरति । स्मार्तं हि ज्ञानम् आत्मनस्तस्यैव मनसोऽनुबन्धादनुवर्तते, यस्यानुवृत्तिं पुरस्कृत्य पुरुषो 'जातिस्मर' इत्युच्यते इति सत्वमुक्तम् यानि खल्वस्य गर्भस्य सत्वजानि यान्यस्य सत्वतः संभवतः संभवति तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा भक्तिः शीलं शौचं द्वेषः स्मृतिर्भेदहत्यागो मात्सर्यं शौर्यं भयं क्रोधस्तद्व्रोत्साहस्तैरुण्यं मार्दवं गांभीर्यम् अनवस्थितत्वम् इत्येवमादयश्चान्ये, ते सत्ववि-काराः तान् उत्तरकालं सत्वभेदमाधिकृत्य उपदेक्ष्याम इति सत्वजानि । नानाविधानि खलु सत्वानि, तानि एकपुरुषे भवन्ति, न च भवत्येककालम्, एकं तु प्रायो 'वृत्त्या' आह ।

एवमयम् नानाविधानाम् एषां गर्भकराणां भावानां समु-दयात् अभिनिर्वर्तते गर्भो यथा कूटागारं नाना द्रव्यसमुदायात् यथा वा रथो नाना रथांगसमुदायात् । तस्मादेतद्वैचाम 'मातृजन्मार्थं गर्भः पितृजन्म आत्मजन्म सात्स्यजन्म रसजन्म अस्ति च सत्वं उपपादुकम्' इति होवाच भगवानात्रेयः॥

पुरस्तादेतत् प्रतिज्ञातं 'सत्वं' जीवं स्मृक्क्षरीरेणाभि-संबन्धाति इति । यस्मात् समुदायप्रभवः सन् स गर्भो मनुष्य-

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आनुवंद-दर्शन

विग्रहेण जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव उच्यते तद्वक्ष्यामः ।
भूतानां चतुर्विधा योनिभेवति, जराण्वेदस्वेदोद्भूतः । तासां खलु
चतसृणामपि योनिनामैकैका योनिरपरिसंख्येयभेदा भवति,
भूतानामाकृतिविशेषापारिसंख्येयत्वात् । तत्र जरायुजानामेह
जानां प्राणिनामेते यां गर्भकरा भावा योनिमापद्यते, तस्यांतस्यां
योनी तथा तथा रूपा भवति, तद्यथा कनकरजतताप्रत्रपुसीसकानि
तेषु तेषु मधुरिच्छु विग्रहेषु । ते यदा मनुष्यविंबमापद्यते तदा
मनुष्यविग्रहेण जायते, तस्मात् समुदायात्मकः सन् गर्भो
मनुष्य विग्रहेण जायते, मनुष्यश्च मनुष्यप्रभव उच्यते;
तद्योनित्वात् । यच्छोक्तं 'यदि च मनुष्यो मनुष्यप्रभवः,
कस्माज्ज जडादिभ्यो जाताः पितसदृशरूपा भवन्तीति' तत्रोच्यते
यस्य यस्यावयवस्य बीजे बीज भाग उपततो भवति, तस्य
तस्यावयवस्य विकृतिरुपजायते नोपजायते चानुपतापात्, तस्मा-
दुभयोपपत्तिरप्यत्र । सर्वस्य च आत्मजानि इंद्रियाणि ।
तेषां भावाभावहेतुद्वैवम् । तस्मान्नैकान्ततो जडादिभ्यो जाताः
पितृसदृशरूपा भवन्ति ।

न च आत्मा, सत्सु इंद्रियेषु असत्सु वा भवति अन्नः ।
न हि असत्तः कदाचिदात्मा । सत्त्वविशेषासोपलभ्यते ज्ञानविशेष
इति । भवतिचात्रः—

न कर्तुर्निद्रियाभावात् कार्यज्ञानं प्रवर्तते ।
या क्रिया वर्तते भावैः सा विना तैर्न वर्तते ॥

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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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जानन्नपि मृदोऽभावात् कुंभकृत्न व्रतर्तते ।
श्रूयतां चेदमध्यात्ममात्मज्ञानबलं महत् ॥
इन्द्रियाणि च संक्षिप्य मनःसंक्षिप्य चंचलम् ।
प्राविश्याध्यात्ममात्मज्ञः स्वे ज्ञानं पर्यवस्थितः ॥
सर्वत्रावहितज्ञानः सर्वभावान् परीक्षते ।
गृष्णीष्व चेदमपरं भरद्वाज विनिर्णयाम् ॥
निवृत्तौद्रियवाक्कृच्छ्रः सुप्तः स्वप्नगतात् यदा ।
विषयान्मुखदुःखे च वेत्ति नाज्ञोऽप्यतः स्मृतः ॥
आत्मज्ञानादृते चैकं ज्ञानं किंचिन्न वर्तते ।
न द्वेको वर्तते भावो वर्तते नाप्येहतुकः ॥
तस्मात्तु ज्ञः प्रकृतिश्चात्मा द्रष्टा कारणमेव च ।
सर्वमेतत् भरद्वाज निर्णीतं जहि संशयम् ॥ इति.

अर्थात् गर्भोत्पत्ति में उक्त माता पिता आदि भावों का 'समुदाय' कारण है। क्योंकि बिना माता-पिता के गर्भोत्पत्ति नहीं हो सकती; विशेषतः जरायुज प्राणियों का जन्म नहीं हो सकता। गर्भ के कुछ अवयव (त्वचा, लोहित, मांस, भेद, नाभि, हृदय, क्रोम, यकृत, क्रीहा, वृक्कदय, बाल्मि, पुरीषाधान, आमाशय, पक्काशय, उत्तरगुद, अघरगुद, क्षुद्रांत्र, स्थूलान्त्र, वपा और वपाबहन) माता के अंश से पैदा होते हैं और कुछ अवयव (केश, रसश, नख, लोम, दंत, अस्थि, सिरा, स्नायु, धमनी, और शुक्र) पिता के अंश से।

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आयुर्वेद-दर्शन

आत्मा से भी गर्भ पैदा होता है। यहाँ 'आत्मा' शब्द से उस 'समुदायात्मक आत्मा' को समझना चाहिये जिसको कि गर्भात्मा, अंतरात्मा अथवा जीव कहते हैं। वह अपनी विशुद्ध अवस्था में शाश्वत, अरुज, अजर, अमर, अच्युत, अमेघ, अलोछ्य, [जिसको कि प्रतीघात नहीं किया जा सकता।] विश्वरूप, विश्वकर्मा, अन्वयक, अनादि, अनिधन और अक्षर होते हुए भी गर्भाशयगत बीज फल संयोग में प्रविष्ट होकर अपने आपको गर्भ के रूप में पैदा करता है। तदनुसार गर्भ को भी आत्म संज्ञा है। इस तरह यद्यपि गर्भात्मा पैदा होता है तथापि विशुद्धावस्थ आत्मा अनादि होने के कारण पैदा नहीं होता। अतः अजात आत्मा ही अजात गर्भ को पैदा करता है। चूँकि जब कि यह अजात आत्मा, अजात गर्भ का जनन करता है और वह गर्भ भी कालांतर से बाल्य, यौवन, वार्धक्य आदि अवस्थाएँ प्राप्त करता है तब यह कहना उचित ही है कि वह जिन २ अवस्थाओं में रहता है उन २ अवस्थाओं में 'जात' है और जो अवस्थाएँ उसे भविष्य में प्राप्त होने वाली हैं उनके अनुसार 'अजात'। अतः आत्मा 'जात' भी है और 'अजात' भी। इस तरह जिसमें जातत्व और जनिष्य-माणत्व दोनों ही संभव है वह एक अवस्था में पैदा होकर दूसरी अवस्था को पैदा करता है। और वह ही अनागत अवस्थाओं में 'अजात' होकर (उन अग्रिम अवस्थाओं में)

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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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अपने आपको पैदा करता है। उसका एक अवस्था में से दूसरी अवस्था में जाना ही 'जन्म' है चाहे वह भिन्न २ शरीर हों अथवा शरीर की भिन्न २ वयो मर्यादा हों। जिस तरह शुक्ल, शोणित और जीव इनके संयोग के बाद ही गर्भ को गर्भत्व प्राप्त होता है; अन्यथा नहीं होता अथवा जिस तरह संतान पैदा होने के बाद ही पुरुष को पितृ-पद प्राप्त होता है; अन्यथा नहीं होता उसी तरह गर्भात्मा को भी भिन्न २ अवस्थाओं में जातपद और अजातपद प्राप्त होता है।

फिर भी यह ध्यान में रखना चाहिये कि माता, पिता अथवा आत्मा, गर्भ की सब बातें अपनी इच्छा के अनुसार पैदा नहीं कर सकते। क्योंकि कुछ बातें इनकी इच्छा के अनुसार तो कुछ पूर्वजन्माजित कर्म के अनुसार तो कुछ करणशक्ति के अनुसार होती हैं अथवा नहीं भी होतीं। जहाँ सत्त्व आदि करणों की संपदा रहती है वहाँ संपदा के बल के अनुसार यथेष्टकारित्व रहता है अन्यथा नहीं रहता। किंतु इस पर से यह नहीं कहा जा सकता कि 'यदि करणदोष के कारण गर्भोत्पत्ति नहीं हो सकती तो गर्भोत्पत्ति में आत्मा कारण नहीं है'। क्योंकि आत्माविद् पुरुषों ने यह अनुभव करके देखा है कि दृष्टयोन, ऐश्वर्य और मोक्ष आत्मा के ही आधीन हैं। सुख दुःखों का कर्ता और गर्भोत्पादक, आत्मा के सिवाय कोई नहीं है। जो बढता है वह आत्मा से भिन्न नहीं है अर्थात् बीज के बिना अंकुर की उत्पत्ति नहीं होती।

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आयुर्वेद-दर्शन

भित्र २ योनिओं में जन्म, आयुष्य, आत्मज्ञान, मन, इंद्रिय, प्राणापान, प्रेरणा, धारणा, आकार, स्वर, वर्ण, मुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, चेतना, धृति, बुद्धि, स्थिति, अहंकार, व प्रयत्न ये सब आत्मा से प्राप्त होते हैं।

सात्त्व्य, भी गर्भोत्पादक है। सात्त्व्यसेवन के अभाव से स्त्री पुरुष दोनों को बंधत्व आता है; अथवा गर्भ में अनिष्ट बातें पैदा होती हैं। यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि जब तक असात्त्व्यसेवी स्त्री-पुरुषों के प्रकृपित बात-पित्तश्लेष्मा, समस्त शरीर में संचार करके शुक्र, आर्तव व गर्भाशय को हानि नहीं पहुंचाते तब तक ही वे ( स्त्री पुरुष ) गर्भोत्पादन में समर्थ रहते हैं। सात्त्व्यसेवी स्त्री-पुरुषों को भी संतति नहीं होती। इसका कारण उनके बीज फल संयोग में ( कर्मवशात् ) आत्मा प्रविष्ट नहीं होता। केवल सात्त्व्य से भी गर्भोत्पत्ति नहीं होती क्योंकि उसमें समुदाय ही कारण है। सात्त्व्य से आरोग्य, अनालस्य आदि भाव पैदा होते हैं।

रस से भी गर्भोत्पत्ति होती है। बिना अन्नरस के माता की जीवन यात्रा तक नहीं हो सकती फिर गर्भ जन्म तो दूर रहा। अयोग्य रीति से रस सेवन किया जाय तो गर्भोत्पत्ति नहीं होती; ना ही केवल सम्यक् रससेवन से ही गर्भोत्पत्ति होती है। सारांश उक्त समुदाय ही कारण है।

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युनवैसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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रस से गर्भोत्पादक द्रव्यों की उत्पत्ति और वृद्धि होती है; गर्भस्थ प्राणों का समुचित संबंध होता है और वृत्ति-पुष्ट्यादि भाव पैदा होते हैं।

सत्त्व भी संबंध विधायक अर्थात् औपपादक है। यह स्पर्शनेन्द्रिय के द्वारा (क्योंकि स्पर्शनेन्द्रिय में सत्त्व का संचार रहता है,) जीव और शरीर में संबंध प्रस्थापित करता है। जब (मरण के समय) यह स्पर्शनेन्द्रिय से बाहर जाने को उद्यत होता है तब प्राणी का स्वभाव बदल जाता है; अभिरूचि का विपर्यास होता है; इंद्रिय उपतप्त होते हैं; बलक्षय होता है और रोग, अत्यधिक कुश कर देते हैं। जब यह शरीर को छोड़ देता है तब प्राण भी शरीर को त्याग देते हैं। इंद्रियों को अपने २ विषयों के ग्रहण में प्रवृत्त करनेवाले को ही 'मन' कहते हैं। वह तीन प्रकार का है शुद्ध, राजस् और तामस्। इस जन्म में इन गुणों में से जो गुण अधिक रहता है उसी का अगले जन्म में संबंध रहता है यदि इस जन्म में मन शुद्ध हो, तो उसे गत जन्मों का स्मरण होता है। यह स्मृतिजन्य ज्ञान, आत्मा में रहता है और उसीसे प्राप्त होता है। मन का उसके साथ अनुबंध रहता ही है। ऐसी अवस्था में यदि मन शुद्ध हो तो उसकी वृत्तियाँ, आत्मा के स्मार्त ज्ञान में परिणत होती हैं और इसी हेतु से पुरुष को 'जातिस्मर' कहा

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आधुनिक-दर्शन

जाता है। सत्त्व के कारण भक्ति, शील, शौच, द्वेष, स्मृति, मोह, त्याग, मात्सर्य, शौर्य, भय, क्रोध, तंद्रा, उत्साह, तैक्षण्य, मार्दव, गार्भीर्य, अनवस्थितत्व (अस्थिरता) आदि भाव तथा वे सब सत्त्वज विकार-जिनका सत्त्व के प्रकारों के विवेचन में ( देखो परिशिष्ट ) उपदेश किया जायगा पैदा होते हैं।

सारांश इस तरह उक्त गर्भोत्पादक भावों के समुदाय से गर्भ, पैदा होता है। जिस तरह लकड़ी, मिट्टी, पत्थर आदि नाना द्रव्य समुदाय से मकान बनता है अथवा पहिये आदि अनेक पुरजों के संयोग से रथ तैयार होता है उसी तरह हम लोगों का कथन है कि माता, पिता, आत्मा, सात्त्व, व रस इनके समुदाय से गर्भ बनता है और सत्त्व, संबंध विधायक हैं।

पहिले यह कहा गया है कि सत्त्व, स्पर्शेन्द्रिय के द्वारा जीव और शरीर इनके बीच में संबंध प्रस्थापित करता है अतः दुबारा यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि गर्भोत्पादक भावों का संधान किस तरह होता है। अतः अब यह देखना आवश्यक है कि समुदायप्रभव गर्भ, मनुष्याकर कैसे बनता है और मनुष्य, मनुष्य को क्यों पैदा करता है।

प्राणियों की चार प्रकार की योनि है; जरायुज, अंडज, स्वदेज और उद्भिज। इनमेंसे प्रत्येक योनि के असंख्य

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पुनर्वसु आश्रय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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प्रकार हैं। क्योंकि उनमें पैदा होने वाले प्राणियों की रचना असंख्य प्रकार की है। तहाँ जरागुज और अंढज प्राणियों को पैदा करने के समय उक्त गर्भोत्पादक भाव, रचना विशेष के अनुसार भिन्न २ य्रेनिओं में भिन्न-भिन्न रूप-धारण करते हैं। जिस तरह सोना, चाँदी, तांबा आदि धातुओं का तत्परस भिन्न-भिन्न आकार के मोम के सांचे में ढालने पर भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है; यदि उसे मनुष्याकृति सांचे में ढाला जाय तो वह मनुष्याकृति बनता है उसी तरह गर्भ, समुदायात्मक होते हुए भी मनुष्य योनि में मनुष्य रूप धारण करता है। यही कारण है कि मनुष्य, मनुष्य से पैदा होता है। इस पर यदि यह कहो कि अंधे से अंधे की और मूर्ख से मूर्ख की पैदाइश क्यों नहीं होती ? तो इसका उत्तर यह है कि बीज व फल में अंगों के जो सूक्ष्म भाग रहते हैं उनमें से एक या अनेक भाग जब विकृत होते हैं, तब गर्भ के भी वे अंग विकृत पैदा होते हैं, अन्यथा नहीं होते। फलतः पितृ सृष्टि पैदा होना और न होना दोनों बातें सम्भवनीय हैं। प्राणीमात्र के इन्द्रिय, आत्मा से ( आत्म-निबद्ध कर्म से ) पैदा होते हैं। उनका होना या न होना देवाधीन है। अतः जड़ आदि से पितृसृष्टि ही सन्तान पैदा हो यह नियम नहीं है।

यह कहना भी उचित नहीं है कि इंद्रियों के रहते आत्मा, ज्ञाता है और इंद्रियों के बिना अज्ञ। क्योंकि आत्मा, कभी

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आयुर्वेद-दर्शन

भी सत्त्व रहित नहीं रहता बल्कि सत्त्व जिस प्रकार का हो उस प्रकार का उसे ज्ञान रहता है।

यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि 'कर्ता का कार्य-विषयक ज्ञान, इन्द्रियाभाव के कारण प्रवृत्त नहीं होता। क्योंकि जो किया जिन इन्द्रियों के द्वारा होती है वह उन इन्द्रियों के बिना नहीं हो सकती। कुम्भकार, घट बनाना जानता है पर उसका यह कार्य ज्ञान, मिट्टी के अभाव के कारण घट नहीं बना सकता।'

भारद्वाज, अब आप इस 'अध्यात्म' को सुनो। क्योंकि आत्म-विषयक ज्ञान का बल बहुत बड़ा है। इन्द्रियों को उनके विषयों से परावृत्त करके और चंचल मन को भी उस के विषयों से विमुख करके आत्मविद् पुरुष अध्यात्म में प्रविष्ट होता है अर्थात् अपने ज्ञान में ही स्थिर हो जाता है तब वह सर्वत्र 'अंकुठित ज्ञान' होकर बिना इन्द्रियों के ही समस्त भावों को जानता है। इसके अतिरिक्त भारद्वाज, इस निर्णय को भी सुनलो कि 'ज्ञानेन्द्रिय और वाणी के व्यापारों से निवृत्त होकर मनुष्य जब सोता है तब उसे स्वप्न में भी सुख दुःखादि विषयों का अनुभव होता ही है; अर्थात् यह ज्ञान, इन्द्रियों के बिना होता है और इस पर से भी यह जाना जा सकता है कि आत्मा 'अज्ञ' नहीं है। आत्मनिष्ठ उक्त ज्ञान (ज्ञानुत्प) के बिना अकेला इन्द्रियजन्यज्ञान