आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextपुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक
सिद्धांत
पुनर्वसु आत्रेयः—‘तथ्यार्थिणां विवादतामुवाचैवं पुनर्वसुः’
अर्थात् इस तरह विवाद करते हुए ऋषियों के प्रति पुनर्वसु
आत्रेय ने कहा कि:—
मैवं बोचत तत्त्वं हि दुष्प्रापं पक्षसंश्रयात् ॥
वादान् स प्रतिवादान् हि वदन्तो निश्चितानिव ।
पक्षान्तं नैव गच्छन्ति तिलपीडकवद् गतो ॥
मुक्तवैवं वादसंघट्टमध्यात्मभतुचित्यताम् ।
नाविभूततमस्कंधे ज्ञेये ज्ञानं प्रवर्तते ॥
येषामेव हि भावानां संपत्सजनयेन्नरम् ।
तेषामेव विपद व्याधीन्निविधान्समुदीरयेत् ॥
अर्थात् आप लोग इस तरह विवाद करना छोड़ दें ।
क्योंकि किसी एक ही पक्ष को स्वीकार करने से सत्य तत्व
दुर्लभ हो जाता है । जिस तरह तेही अपनी घानी को ही
चक्कर लगाता रहता है उस तरह यदि आप अपने ही पक्ष
को ठीक समझकर खदतभेदन करते रहेंगे तो सर्व सम्मत
निर्णय पर नहीं पहुँच सकेंगे । अतः इस वाद संघर्ष को
छोड़ कर ‘अध्यात्म’ का चिंतन कीजिये । जबतक पक्षराग-