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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागाल्मक सिद्धांत

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और दो पंचाल्मक लोकपक्षीय थे। तहां अग्नीषोम लोक-पक्षीयों का विरोध अधिक प्रबल नहीं था। क्योंकि प्रजा-पतिवाद का उनपर काफी प्रभाव पड़ चुका था। किंतु पंचाल्मकलोकपक्षीयों में भारद्वाज एक ऐसे प्रभावशाली पुरुष थे कि जिनको षड्धातुवादी, आत्मवादी, कर्मवादी और सत्त्ववादी मिलकर भी समझा न सके। पुनर्वसु आत्रेय ने भी षड्धातुवाद का पक्ष लेकर (क्योंकि भारद्वाज, पंचाल्मकलोकपक्षीय थे अतः उनको पंचाल्मकलोकपक्ष के सिद्धान्तों के द्वारा समझाना ही युक्तियुक्त और सरल था) इनको समझाने का यत्न किया। इस प्रकार के एक प्रसंग को हम यहां उद्धृत करते हैं।

‘गर्भावकांति’ पर विचार करते हुए पुनर्वसु आत्रेय ने यह कहा था कि ‘मातृजन्मार्थं गर्भः, पितृजन्म आत्म-जन्म सात्त्व्यजन्म रसजन्म; अस्ति च खलु सत्वमौपपादुकम्’ (च. शा. अ. ३) अर्थात् माता, पिता, आत्मा, सात्त्व्य, इन सब कारणों से गर्भ पैदा होता है और सत्व, इनका सबका संबंध विधायक है। किंतु भारद्वाज ने इनका सबका अलग २ खंडन किया। भारद्वाज के उस वक्तव्यको हम स्वभाववाद के विवेचन में उद्धृत कर चुके हैं। पुनर्वसु आत्रेय ने षड्धातुवादानुसार इसका जो उत्तर दिया वह निम्न लिखित है। जैसा कि:—