आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुर्वेद-दर्शन
आत्मा से भी गर्भ पैदा होता है। यहाँ 'आत्मा' शब्द से उस 'समुदायात्मक आत्मा' को समझना चाहिये जिसको कि गर्भात्मा, अंतरात्मा अथवा जीव कहते हैं। वह अपनी विशुद्ध अवस्था में शाश्वत, अरुज, अजर, अमर, अच्युत, अमेघ, अलोछ्य, [जिसको कि प्रतीघात नहीं किया जा सकता।] विश्वरूप, विश्वकर्मा, अन्वयक, अनादि, अनिधन और अक्षर होते हुए भी गर्भाशयगत बीज फल संयोग में प्रविष्ट होकर अपने आपको गर्भ के रूप में पैदा करता है। तदनुसार गर्भ को भी आत्म संज्ञा है। इस तरह यद्यपि गर्भात्मा पैदा होता है तथापि विशुद्धावस्थ आत्मा अनादि होने के कारण पैदा नहीं होता। अतः अजात आत्मा ही अजात गर्भ को पैदा करता है। चूँकि जब कि यह अजात आत्मा, अजात गर्भ का जनन करता है और वह गर्भ भी कालांतर से बाल्य, यौवन, वार्धक्य आदि अवस्थाएँ प्राप्त करता है तब यह कहना उचित ही है कि वह जिन २ अवस्थाओं में रहता है उन २ अवस्थाओं में 'जात' है और जो अवस्थाएँ उसे भविष्य में प्राप्त होने वाली हैं उनके अनुसार 'अजात'। अतः आत्मा 'जात' भी है और 'अजात' भी। इस तरह जिसमें जातत्व और जनिष्य-माणत्व दोनों ही संभव है वह एक अवस्था में पैदा होकर दूसरी अवस्था को पैदा करता है। और वह ही अनागत अवस्थाओं में 'अजात' होकर (उन अग्रिम अवस्थाओं में)