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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages
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को वातपित्तश्लेष्मा कहना चाहते हैं। भारद्वाज, द्रव्य-प्रधानतावादी हैं। उनकी दृष्टि से वातपित्तश्लेष्मा भी द्रव्य ही हैं।

भारद्वाज, यद्यपि गुण वर्ग में गुर्वादि, शब्दादि, परादि सभी का अंतर्भाव करते हैं तथापि उनको गुर्वादि गुणों का ही प्राधान्यत्व मान्य है; इतना ही नहीं तो गुर्वादि गुण प्रधानता वाद के आद्य प्रवर्तक ही भारद्वाज हैं। भारद्वाज ने ही सर्व प्रथम आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादि लक्षण घोषित किया। प्रायः इसी हेतु से स्वभाववाद का समर्थन करते हुए भारद्वाज ने पृथिव्यादिकों के स्वर द्रवादि लक्षणों का ही उल्लेख किया है; शब्दादिकों का नहीं। और वातकला-कलीय परिषद् में भी जो कि अग्नीषोमलोकपक्षियों की थी; भारद्वाज सिर्फ गुर्वादि गुणों के आधार पर 'समानगुणाभ्यासो हि धातूनां वृद्धिकारणम्' यह प्रतिपादन करने के लिये ही उपस्थित हुए थे।

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कांकायन का प्रजापतिवाद।

वाल्हीकभिषक् कांकायनः—स्वभाववाद का खंडन करते हुएः—

कांकायनस्तु नेत्याह नह्यारंभ फलं भवेत् ।
भवेत् स्वभावाद्वावानामसिद्धिः सिद्धिरेव वा ॥

कांकायन ने कहा कि पुरुष और रोगों की उत्पत्ति में स्वभाव को कारण कहना उचित नहीं है। समस्त भावों की सिद्धि अथवा असिद्धि यदि स्वभावतः हो, तो कर्म और फल (जिनका अस्तित्व प्रत्यक्ष सिद्ध है) संबंधी समस्याएँ हल न होंगी।

कांकायन, 'कृत' कर्मवादी थे। उनका कहना था कि किसी भी रूप में विना कर्ता के कर्म पैदा नहीं हो सकता। उसी तरह कर्मफल को भोगनेवाला भी होना चाहिये। कांकायन, अब स्वमत कहते हैं किः—

स्रष्टात्वभित संकल्पो ब्रह्मोपत्यं प्रजापतिः ।
चेतनाचेतनस्यास्य जगतः मुख दुःखयोः ॥

अर्थात् ब्रह्म का अपत्य प्रजापति ही जो कि अभित संकल्पकारी है; इस सचेतन और अचेतन जगत् को तथा उसके मुख दुःखों को पैदा करता है।

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यह जान लेने पर कि कांकायन, बल्हीक देश के भिषक् थे और उनका प्रजापतिवाद, विशुद्ध वैदिक ( ब्राह्मण ग्रंथों व उपनिषदों की स्मृति के पूर्व का अथवा केवल मंत्रों के आधार पर प्रतिपादित ) संप्रदाय है; ऐतिहासिक दृष्टि से यज्ञःपुरुषीयपरिषद् के काल निर्णय में एक साधन उपलब्ध हो जाता है अस्तु ।

कांकायन का प्रजापतिवाद, जिस वैदिक मंत्र के आधार पर है वह निम्न लिखित है:—

यस्माच्च जातःपरोऽअन्यो अस्ति, य आविवेश भुवनानि विश्वा ।
प्रजापतिः प्रजया सर्द-रराण स्त्रीणि ज्योतीर्द-षि सचेत
सपोदशी ॥ ( यजुर्वेद अ. ८ मंत्र १६ )

अर्थात् जिससे उत्कृष्ट अन्य कोई नहीं है, जो समस्त भुवनों में अंतर््यामी रूप से प्रविष्ट है, जो प्रजा ( सचेतन-स्मृतिगत जीवात्मा ) के रूप में रमा हुआ है और जो षोडष-कलात्मक अर्थात् पूर्ण है वह प्रजापति, अपनी तीन ज्योतियों को व्यक्त करता है ।

यह श्रुति, प्रजापति दैवत्या है अर्थात् इस में प्रजापति का वर्णन है । कांकायन, इस प्रजापति को 'ब्रह्म' का अपत्य कहते हैं । यहां ब्रह्म, प्रजापति, उसकी तीन ज्योतियाँ और उसकी प्रजा इन पर थोड़ा अधिक विचार करना होगा ।

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कांकायन का प्रजापतिवाद

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क्योंकि इन शब्दों में वह सृष्टिविज्ञान है जिसको कि हम प्रजापतिवाद कहते हैं। वास्तव में देखा जाय तो 'पुरुषसूक्त' में जिस विशुद्ध वैदिक सृष्टिविज्ञान का विवेचन है उसी विज्ञान का उक्त प्रजापति देवत्या श्रुति में भिन्न संज्ञाओं में उल्लेख किया है।

यहां 'ब्रह्म' शब्द से पुरुषसूक्त प्रतिपादित उस अनादि पुरुष को संबोधित किया गया है जिसका त्रिपाद अर्थात् ब्रह्महंश, 'अमृतत्व' (निर्विकार) रूप होकर एकपाद अर्थात् स्वल्पांश साशन (सचेतन) अनशन (अचेतन) रूप 'विराट' में परिणत है। [ पु. सू. में १-४ ]

पुरुषसूक्त की भाषा में उक्त एकपाद 'विराट' के अभिमानी पुरुष को 'विराटपुरुष' कहते हैं। किंतु प्रजापतिवाद की भाषा में उसी को 'प्रजापति' कहते हैं। यह, ब्रह्म का ही अंश होने के कारण कांकायन ने उसको ब्रह्म का अपत्य कहा है।

पुरुषसूक्त में यह कहा गया है कि अचेतन सचेतन विराट को पैदा करने के पूर्व विराटपुरुष, प्रधान धर्मों में ('अत्यरिच्यत' में, ५) अलग २ परिणत हुआ। इन धर्मों को पुरुषसूक्त में 'देव' भी कहते हैं। इन देवों के विषय में यह भी कहा गया है कि "यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि

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धर्माणि प्रथमान्यासन् । तेह नाकं महिमानः संचत यत्र पूर्व साध्याः सति देवाः” । ( पु. सू. मं. १६ ) अर्थात् प्रजापति के ‘ प्राण ’ रूप देवों ने परस्पर के संगतिकरणदानरूप व्यापार के द्वारा यज्ञपुरुष की पूजा की अर्थात् अचेतन-सचेतन बिराट् पैदा किया । ये देव, जोकि वास्तव में ‘ धर्म ’ हैं; सर्व प्रथम पैदा हुए । सृष्टिरूपयज्ञ के विधायक उक्त प्राथमिक धर्म, सृष्ट्युत्पत्ति के पूर्व उस ‘ अमृतत्व ’ रूप त्रिपाद स्वर्ग में अनादि चतुष्पाद पुरुष की ‘ महिमा ’ होकर रहते थे जहां कि पुरा कल्प क भी साधक धर्म रहते आये हैं ।

प्रजापति दैवत्या श्रुति में इन धर्मों को ‘ व्योति ’ शब्द से संबोधित किया है और यह स्पष्ट किया है कि उक्त धर्म ‘ तीन ’ हैं । सारांश प्रजापति, सर्व प्रथम प्राण संज्ञक तीन प्रधान धर्मों म परिणत होता है ।

इन धर्मों के विषय में भिन्न २ मत भी दिखाई देते हैं । उदा० ‘ यस्मान्न जातः ’ यह मंत्र आयुर्वेद में दो जगह आया है । तहां ८ वें अध्याय में भाष्यकार ने अग्नि, वायु और सूर्य इनका उल्लेख किया है और ३२ वें अध्याय में रवि, इंद्र और अग्नि का । किंतु आयुर्वेद में क्रमशः वायु, अग्नि, सोम इन्हीं को स्वीकार किया है । आयुर्वेद में इनको प्राण शब्द से भी संबोधित करते हैं ।

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यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि प्रजापति, जिस तरह वायु, अग्नि, सोम संज्ञक धर्मों में अतिरिक्त हुआ उस तरह वह असंख्य प्रजा (पशुपुरुष, मूर्ति, भूतात्मा अथवा जीवात्मा) ओं में भी अतिरिक्त हुआ। धर्मों का आपस में यज्ञ होकर 'भूमि' अर्थात् सप्त आवरण, (सत्य, तप, जन, मह, स्वर, भुव, भू) आकाशादि धातु, सूर्यादि लोक, ऋतु इ० अचेतन सृष्टि पैदा हुई। और तत्पश्चात् शरीर (पुरः) अर्थात् सचेतन सृष्टि पैदा हुई। सचेतन सृष्टि की पैदाइश के समय धर्मों ने यज्ञसाधनभूत 'पुरुषपशु' (जीवात्मा) का 'बहिः' (इसका अर्थ सायणाचार्य ने 'मानस यज्ञ' किया है। किंतु सृष्टिविज्ञान की भाषा में यह उस स्थिति विशेष का बोधक मालूम होता है जिसमें कि अचेतन, सचेतन में परिणत होता है) में प्रोक्षण किया। इस प्रोक्षण के समय वसंत, घी हुआ; ग्रीष्म, समिद हुआ और शरद, हविर्द्रव्य हुआ। इस तरह पशुपुरुष को ७ परिधियों और २१ समिधाओं से बांध दिया गया ! अस्तु। अब वायु, अग्नि, सोम इन प्राथमिक धर्मों के विषय में कुछ अधिक विचार करना आवश्यक है।

वायुः—इसके विषय में निम्न लिखित मंत्र मननीय हैं।

प्राणमाहुर्मातरिश्चानं वातो ह प्राणभुज्यते ।
प्राणो ह भूतं भज्यं च प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

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उक्त मंत्रों पर से यह भी ज्ञात होता है कि यह प्राण संज्ञक महती शक्ति ही 'मातरिश्वा' और 'वात' संज्ञक दो प्रकारों में विभक्त है। तहां 'अग्निविसर्जिका' अथवा विसर्जिका शक्ति को मातरिश्वा कहते हैं जैसाकि 'आगे कहा गया है। वात शब्द गत्यर्थक है। भिक्षु आत्रेय, जिस गति को 'काल' शब्द से संबोधित करते हैं वह ही यहां वात शब्द से

१ इस महती शक्ति के विषय में पाश्चात्य वैज्ञानिकों का कथन है कि द्रव्य, शक्ति, संवेदन इस त्रयी में शक्ति से इनऑर्गनिक और ऑर्गनिक सृष्टि अलग २ पैदा होती है। इन आर्गनिक विभाग में प्रथम ईयर, ईयर से विद्युत्परमाणु, विद्युत्परमाणुओं से ८२ मूल द्रव्यों के परमाणु और उनसे सूर्य, पृथ्वी, मिट्टी, पाषाण, क्षार, स्फटिक इत्यादि पैदा होते हैं। आर्गनिक विभाग में प्रथम वह आद्य जीव अथवा आद्य-जीवोत्पादक द्रव्य पैदा हुआ जिससे कि विकास परंपरा के अनुसार समस्त प्राणियों की सृष्टि हुई। यह शक्ति, अविनाशिनी, परिवर्तनशीला और अनेकरूपिणी है। जड़ सृष्टि के कुल चमत्कार इस शक्ति के रूपांतर से ही साध्य हुए हैं। अबतक इसके दो रूप उपलब्ध हुए हैं; 'विसर्जन' और 'प्रेरणा'। प्रत्येक पदार्थ में जो विसर्जन का व्यापार हो रहा है वह इस शक्ति का ही एक प्रकार है। व्यवहार में जिनको उष्णता, (अग्नि) नाद, (वाणी) प्रकाश (तेज) विद्युत् (इंद्र, 'क' इंद्रस्तद्विद्युदिति' शतपथ ब्रा.) और सुंवक्त्व कहते हैं वे गति के क्रमशः कंपन, लहरी, लघुलहरी, तनाव और आवर्त हैं और यह गति भी प्रेरणा का एक प्रकार है। प्रेरणा के कई विशिष्ट प्रकार ऑर्गनिक द्रव्यों में भी रहते हैं।

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अभिप्रेत है। इसके उपलक्ष में ही यह विधान किया है कि यह जब ऋतुओं में परिणत होता है तब सचेतन जगत् पैदा होता है।

प्राण से ही सूर्य व चन्द्र पैदा होते हैं। सूर्य-चन्द्र शब्द अग्नीपोम वाचक भी हैं। अग्नि और सूर्य की उत्पत्ति के विषय में ऋग्वेद में कहा गया है कि “परम आकाश में स्थित वह अग्नि, मातरिश्वा से पैदा हुआ। कुशलता और बल से सिलगे हुए इस अग्नि के तेज से वावापृथिवी प्रकाशमान हुई” (ऋ. १,१४३,२) और अन्यत्र यह भी कहा गया है कि “वायु से अग्नि और अग्नि से सूर्य पैदा हुआ।” (ऐतरेय ब्राह्मण। ८,२०) सोमोत्पत्ति के विषय में यजुर्वेद का “अपांसरस्य यो रसः” (यजु. अ. ९ मं. ३) यह मंत्र मननीय है। इसमें यह कहा गया है कि “उदकों का रस (सार अथवा मूल) सोम है और सोम का भी रस वायु है”। सारांश प्राण अथवा वायु संज्ञक महती शक्ति ही अग्नि व सोम संज्ञक धर्मों में परिणित हुई है।

वार्योविद् ने इस प्राण संज्ञक शक्ति को ही ‘वायु’ शब्द से संबोधित किया है और उसके लोकगत तथा देहगत दोनों कार्यों का विवेचन (इसका मूल अंश हम पहिले त्रिधातु सिद्धांत पर विचार करते हुए उद्धृत कर चुके हैं) किया है। वे कहते हैं कि:—

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लोक में संचार करने वाले वायु के स्वाभाविक कार्य थे हैं:- धरणी को धारण करना, ( आकृष्टि ) अग्नि को प्रज्वलित करना, ( मातरिश्वा ) सूर्य, चंद्र, ग्रह गणों को पैदा ( तेजोमेघ से लोकमाला की उत्पत्ति ) करना, व उनके परिभ्रमणगतियों का विधान करना, ( काल ) वर्षाजल को पैदा करना, औद्भिज ( अक्षयओषधयः ) सष्टि को उगाना, ऋतुओं के प्रविभाग करना ( काल ) धातुओं ( आकाशादि द्रव्यों ) के प्रविभाग करना, उनके परिमाण और लक्षणों ( अप्रतीघातकत्व चलत्व उष्णत्वादि ) को व्यक्त करना, बीजों पर अकुरोत्पत्त्यनुकूल संस्कार करना, शस्य की वृद्धि करना, सड़ने न देना, शोषण करना, तथा अविकृत विकारों ( संयुक्त द्रव्यों ) को पैदा करना इत्यादि ।

क्षीरीरगत अकुपित वायु, अवयवों ( यंत्रों ) को और अवयवगत व्यापारों ( तंत्रों ) को धारण करता है । प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान ये उसके ( करणवृत्तिरूप ) प्रकार हैं । यह ऊर्ध्वाधो चेष्टाओं का ( चेष्टावहा नाडियों के ' वृत्ति ' यों अथवा ' वेगों ' Impulses का ) प्रवर्चक है; समस्त ज्ञानकर्मीन्द्रियों का ( अंतःस्थ ) उद्योजक है; इंद्रियार्थों का ( संज्ञावहा नाडियों के ' वृत्ति ' यों द्वारा ) अभिवाहक है तथा मन का ( चित्त की वृत्ति यों का ) उत्पादक ( कथों-कि कथोंविद् सत्त्व तथा चेतना को स्वतःसिद्ध नहीं मानते )

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व नियामक है। यह शरीरगत समस्त धातुओं में संगठन (बल) करता है; सब संधियों को जोड़ता है और वाणी का प्रवर्तक है। शब्द (नाद लहरी) व स्पर्श (मृदु, कठिन, उष्ण, शीत) की यह प्रकृति (क्यों कि लहरी कंपन इत्यादि गति विशेष, इसी के विकार हैं) है। अतः यह स्पर्शनेन्द्रिय व श्रवणेन्द्रिय का मूल है। यह हर्ष (मानसिक प्रसन्नता और पादहर्ष या झुनझुनी सट्टश प्रतिक्रिया भी) और उत्साह (कर्म में प्रवृत्ति) का जनक है। यह, अग्नि (तत्संज्ञक धर्म व अग्निमंडलगत पित्त) को प्रवलयित करता है; दोषों (अन्नरसगत गुणप्रसादात्म्य धातुओं) का (महास्रोत की दीवाल के द्वारा धातुरस में) शोषण करता है और मलों का (शुद्धांत्रस्थ 'मलविवेक' संज्ञक व्यापार के द्वारा) विश्लेषण करता है। यह मोटे व बारीक स्त्रोतों को (गर्भ में) बनाता है और गर्भ की आकृति को पैदा करता है। जीवन व्यापार इसी तंत्र यंत्र धर 'वायु' का परिचय है। ६० ”

वायु के उक्त सब अक्षिपत कार्यो का 'विश्लेष' इस एक ही शब्द में समन्वय किया गया है। क्योंकि अन्यक्त को व्यक्त करना ही उसका प्रधान कार्य है। इस संबंध में वायोवेद का 'भावाभावकर' शब्द भी मननीय है। अस्तु.

अभिः—ऊपर यह बतलाया जा चुका है कि अभि, 'मातरिश्व' से अर्थात् वायु से पैदा हुआ। और यह भी

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विज्ञान सम्मत है कि शक्ति का कोई भी रूपान्तर क्यों न हो उसमें उष्णता पैदा करने की प्रवृत्ति सर्वदा रहती है। इस अग्नि धर्म के चार रूप माने गये हैं। वेदों में इन रूपों के विषय में यह कहा गया है कि 'हे अग्ने, हे तेजस्वी नृपते तुम प्रकाश में ( व्यक्तावस्था में ) आने के हेतु आकाश में, (तेजो-सेव, सूर्य, नक्षत्र आदि रूपों में ) उदकों में, ( 'विद्युदग्नि' के रूप में ) पाषाणों और वनों में ( वर्षणजन्य 'अरणाग्नि' के रूप में ) तथा ओषधियों में ( देहाग्नि के रूप में ) प्रगट होते हो। ( ऋ० २-१-१ )

अग्नि की धार्मिकता और सर्वधर्म व्यापकता के विषय में यह कहा गया है कि 'हे अग्ने, पहिले की चक्की जिस तरह आरों को वेष्टित करती है उस तरह तुम देवों को वेष्टित करते हो'। ( ऋ० ५-१३-६ ) एक धर्म का दूसरे धर्म में रूपान्तर होने के समय उष्णता का पैदा होना उसकी सर्व धर्म व्यापकता का परिचय है।

सूर्य रूप अग्नि के विषय में यह कहा गया है कि " हे ( सूर्यरूप ) अग्ने, तम ऋतुओं को जानते हो; ( सर्व निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि ) अतः हे ऋतुपते तुम यहाँ (पृथ्वी पर) यज्ञ (अपने 'आदान' धर्म के द्वारा लृष्ट्युत्पादन) करो। ( ऋ० १०-२-१ )

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षड्धातुवादी, अभि को चेतनाधातु का 'गुण' कहते हैं। अभि के विषय में यहाँ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है।

सोमः—वैदिक सृष्टिविज्ञान के अथवा प्रजापतिवाद के अनुसार सोम की उत्पत्ति वायु से होती है जैसा कि ऊपर 'अपां रसस्य यो रसः' इस श्रुति पर से बतलाया गया है। सोम धर्म के अलग अस्तित्व के विषय में यह कहा गया है कि "हे सोम, तुम्हारा धार्मिक महान स्वरूप दैवीप्यमान है"। "यह महान् शुक्र (सूर्य) और यह सोम (चन्द्र) दोनों ही सोम (धर्म) के पुरोगामी हैं"। (यजु० अ० ८ मं० ४९) सारांश सोम, इनसे भी परे (चौं में) रहता है।

सोम से पैदा होनेवाली सृष्टि के विषय में यह कहा गया है कि "त्वमिमा ओषधीः सोमं विश्वास्त्वमपोऽअजनय-स्त्वंगाः"। (यजु० ३४—२२) अर्थात् हे सोम, तुम ही जलों को, पृथ्वी को, और ओषधियों को (क्रमशः) पैदा करते हो।

जलोत्पत्ति के विषय में यह कहा गया है कि "सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो भित्रो अभिः"। (यजु० ७-१४) अर्थात् हे सोम, तुम्हारी विश्वरूपधारिणी वह संस्कृति (जलोत्पादन रूपा) पहिली है जिसमें भित्र, वरुण और अभि तुम्हारे भृत्य थे। रसवाद का विवेचन करते हुए यह

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कहा गया है कि वैदिक ऋषि यह भली भांति जानते थे कि सचेतन स्तुति को पैदा करने के लिये आरंभिक जलों की अत्यन्त आवश्यकता है। इन जलों को सोम ( रस ) पैदा करता है अर्थात् सोम, जलों का प्रधान घटक है। किन्तु सोम, अकेला जलों को पैदा नहीं करता तो उसके साथ मित्र, वरुण और अग्नि भी रहते हैं अर्थात् सोम के अतिरिक्त ये भी जलों के घटक हैं।

जलोत्पादन के विषय में अन्यत्र यह कहा गया है कि “मित्रं हुवे पूतदृक्षं वरुणं च ऋषादसम् । धियं घृतार्ची साधता ” ॥ ( यजु० ३३-५७ ) अर्थात् पावित्र्यवर्धक तथा पापक्षयकारक मित्रावरुणों को ( हम ) इस बुद्धि से आवाहन करते हैं कि वे शुद्ध जल का साधन करें। किन्तु यह साधन तबतक नहीं हो सकता जबतक सोम के द्वारा इनको अभिप्रेत न किया जाय। अतः यह कहा गया कि “अयं वा मित्रा वरुणा सुतः सोम ऋतावृधः” ( यजु० ७-९ ) अर्थात् हे यज्ञ वर्धन मित्रावरुण, तुमको सोम ने ‘अभिप्रेत’ किया। मित्र और वरुण के इस अभिषेक के समय अर्थात् ही जलोत्पादन के समय ( अयं वेनश्रोदयत्वृश्रिगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । यजु० ७-१६ ) सोम, विद्युत् से आवृत हो कर झुलेकस्थ ( मित्रावरुणाभिषवरूप ) जलों को पृथ्वी पर प्रेरित करता है।

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सोम की व्यापकता के विषय में यह कहा गया है कि “हे सोम, तुम ध्रुव में, मनुष्यों में, मन में, जल में, वृत्त में, न्योम में, पृथ्वी में, अन्तरिक्ष में, द्यौ में और स्वर्ग में रहते हो”। (यजु० ९-२) “तुम जहां रहते हो वहां वृद्धि (बल प्रयुक्त विसर्ग) होता है और यज्ञ पूर्ण होता है”। (यजु० ३६-३७) सचेतन सृष्टि को पैदा करना सोम का प्रधान कार्य है। अतः यह कहा गया है कि “सोम, ओषधि और अन्न के लिये संचार करता है”। (यजु० ९-३६)

वैदिक विज्ञान का अभ्यास करने वाले यह भलीभांति जानते हैं कि यह सोम धर्म, विश्वव्यापी महान् ‘शैत्य’ है। यह तो स्पष्ट ही है कि वैदिक ऋषि इसको आग्ने के सहस्र अलग धर्म मानते थे। किन्तु कुछ समय से विचारियों को यह सिखाया जाता है कि शैत्य, स्वतंत्र धर्म नहीं है बल्कि उष्णता का अभाव है! किन्तु इस महाशैत्य के विषय में पश्चात् वैज्ञानिकों के द्वारा अभी २ जो अन्वेषण हुआ है उसपर से वैज्ञानिक जगत् में इतना अवश्य ही स्वीकार कर लिया गया है कि “अणुओं की एक ऐसी स्थिति सम्भव है जिसमें कि अणु, कंपन और स्थलांतरगति रहित एवं निश्चल रहते हैं। यह कंपनविहीन अवस्था शतमान उष्णता के २७३ अंश नीचे रहती है। इस उष्णताविहीन अवस्था का (अर्थात् सोम का) आकाश में निसर्गतः रहना सम्भव है”। इस समय

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द्रव्याणुओं को शून्यांश उष्णता के नीचे की स्थिति में अर्थात् उष्णताविहीन स्थितिमें रखकर उसके विद्युच्चुंबकत्व आदि धर्मों की स्थिति को जांचने का यत्न हो रहा है। इस जांच पर से अबतक दो बातें निश्चित सी हो गई हैं। पहिली यह कि “किसी द्रव्य को उष्णताविहीन अवस्था में अर्थात् शैत्यावस्था में रक्खा जाय तो उसके अणुओं में ‘संसक्त्याकर्षण’ (Cohesion) और घनता (Density) की वृद्धि होती है”। दूसरी यह कि “उसकी ‘रासायनिक संयोजन शक्ति’ (Chemical Attraction) नष्ट होती है”। सारांश इस महाशैत्य के अर्थात् सोम के स्वतंत्र अस्तित्व पर नव्य वैज्ञानिकों का भी विश्वास धीरे २ बढ़ता जा रहा है। अस्तु।

त्रिधातुसिद्धान्तवादिओं का यह कथन था ही कि “अन्नगत, देहगत, और वंशांकुरगत वातापितक्षेपमा, तत्त्वतः इन वायुअग्निसोमसंज्ञक धर्मों के ही रूपान्तर अथवा विकास हैं। और उनका यह कथन प्रजापतिवाद का पोषक ही है। किन्तु त्रिधातु सिद्धान्तवादी इस बात पर विचार नहीं करते थे कि इन धर्मों का बिना किसी आश्रय के रहना संभव है या नहीं। क्योंकि उनकी दृष्टि से सत्त्व और चेतना दोनों


१ आयुर्वेदांतर्गत ‘बल’ शब्द, संसक्त्याकर्षण और घनता दोनों का वाचक है।

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ही इन त्रिधातुओं का अथवा रस का परिणाम होने के कारण वे आत्मा, प्रजापति, ईश्वर इनमें से किसी का भी स्वतःसिद्ध अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे। त्रिधातुवादियों के उक्त शिरो बिहीन सिद्धान्त का वैदिक ऋषि, घोर विरोध करते थे और उनको यज्ञों में निर्मात्र नहीं करते थे। अन्त में जब अश्विनीकुमारों ने प्रजापति का अस्तित्व स्वीकार किया अर्थात् त्रिधातुसिद्धान्त को 'सशिरः' बनाया तब कहीं वे यज्ञों में निर्मात्र किये जाने लगे। यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि इस ऐतिहासिक घटना का उल्लेख सुश्रुत संहिता के अतिरिक्त शतपथ ब्राह्मण में भी किया है अर्थात् यह घटना वैदिक काल में हुई है।

प्रजापतिवादानुसार समस्त जगत् की परिणति या व्यक्ति में यद्यपि उक्त धर्मत्रय प्रधान कारण हैं तथापि उनके साथ प्रजापति की अभिन्न कल्पकता का साहचर्य भी आवश्यक है। प्रजापति का यह संकल्प, त्रिधातुओं की सृष्टि नहीं है। वह प्रजापति का 'ज्ञातृत्व' है। वेदों में इसको 'आजानदेव' कहते हैं। वैदिक-सृष्टि-विज्ञान के अनुसार यह संकल्प भी कल्पांत में 'असूतत्व' में उसकी महिमा होकर रहने वाला और कल्प के आदि में वहाँ से व्यक्त होने वाला धर्म है। इसकी व्यक्ति, त्रिधातुओं के पहिले भले ही हुई हो पर इस संकल्प का त्रिधातुओं में परिणत होना प्रजापतिवादियों को सम्मत

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नहीं है जिस तरह षड्धातुवादियों की दृष्टि से चेतनाधातु का ज्ञातृत्व, सत्वरूप होकर कर्तृत्व, अप्रतीघातकत्वादि पंचगुण रूप है उस तरह प्रजापतिवादियों की दृष्टि से प्रजापति का ज्ञातृत्व, संकल्प रूप होकर कर्तृत्व त्रिव्योति रूप है। दोनों के मत से ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में जन्यजनक सम्बन्ध नहीं है किन्तु ‘अन्योन्यानुविधायित्व’ अवश्य है।

यह मालूम नहीं हुआ कि आकाश के विषय में प्रजापति-वादियों का क्या कथन है। अर्थात यह विषय भविष्य में विचारणीय है।

प्रजापतिवाद में गुर्वादि गुणों को प्रधान माना जाता है। क्योंकि कांकायन, वातकलाकलीयपरिषद् में उपस्थित थे और वहाँ उन्होंने ‘प्रकोपन विपर्ययो हि धातूनां प्रशमकारणम्’ इस वक्तव्य के द्वारा गुर्वादिगुणप्रयुक्त प्रकोपनप्रशमन का समर्थन किया है।

कांकायन, रस परिषद् में भी उपस्थित थे। उनका रस विषयक मत उनके “अपरिसंख्येया रसा इति कांकायनो बाल्हीकभिषक् आश्रय गुण कर्म संस्वाद विश्लेषाणामपरि संख्येयत्वात्” इस वक्तव्य पर से व्यक्त होता है।

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भिष्म आत्रेय का कालवाद

भिष्म आत्रेयः—कांकायन के प्रति भिष्म आत्रेय ने यह कहा किः—

तन्नेति भिक्षुरात्रेयो न क्षपत्यं प्रजापतिः ।
प्रजाहिर्तैषी सततं दुःखैर्युज्यादासाधुवत् ॥

अर्थात् प्रजापति को पुरुषरोगोत्पादक कहना अनुचित है । क्योंकि जो प्रजा का हितचिंतक है वह असत् पुरुष की तरह अपने ही अपत्यों को सर्वदा दुःख में नहीं डाल सकता।

उक्त निषेध में उतनी ही रोचकता है जितनी कि सत्वबादी शरलोमा के ‘दुःख द्वेष्टी आत्मा खद को दुःख में नहीं डाल सकता’ इस विधान में है। अस्तु, अब स्वमत कहते हैं किः—

कालजस्त्वेव पुरुषः कालजास्तस्य चामयाः ।
जगत् कालवशं सर्वं कालः सर्वत्र कारणम् ॥

अर्थात् पुरुष, काल से ही पैदा होता है, उसके रोग भी काल से पैदा होते हैं, समस्त जगत् कालाधीन होकर काल सर्वत्र कारण है।

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भिक्षु आत्रेय का कालवाद

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ऋतुओं का और उनके शीत, उष्ण, वर्ष लक्षणों का जब अधिक अभ्यास होने लगा तब यह मालूम हुआ कि उद्विज स्वेदज, अंडज, जरागुज आदि सभी प्राणिजातियाँ प्रायः किसी खास ऋतु में पैदा होती हैं, निश्चित समय तक रहती हैं, और निश्चित ऋतु या अवस्था में नष्ट हो जाती हैं। इनमें उगाई, बहार, पतझड़, चय, प्रकोप, प्रशम, आदि जो प्रत्यक्ष परिवर्तन हुआ करते हैं वे ऋतुओं के मुख्यतः उष्ण, शीत, वर्ष लक्षणों के अनुसार होते हैं। जनपदो-ध्वंसक कारणों की उत्पत्ति में भी ऋतुओं का अथवा शीतोष्ण-वर्ष लक्षणों का विपर्यय ही कारण है। उक्त लक्षणों का अधिक अभ्यास करने पर यह भी ज्ञात हुआ कि शैत्य के कारण सृष्टि में मुख्यतः बलौत्पत्ति अर्थात् संगठन होता है, उष्णता के कारण बल का अपहरण होता है और वर्षा के कारण वायु प्रकृपित होकर फेंकने की क्रिया होती है। इन व्यापारों को संक्षेप में विसर्ग, आदान और विश्लेष इन नामों से संबोधित किया जाने लगा। इसके अतिरिक्त यह घटना नित्य के परिचय की थी कि—शीतांतुः क्रेदयत्यूर्वा विवस्वान् शोषयत्यपि। तातुभावापि संश्रित्य वायुः पालयति प्रजाः। ( सु० सं० ) इ०।

उस समय अयनगति के आधार पर संवत्सरात्मक काल के दो विभाग किये जाते थे; उदगयन और दक्षिणायन।

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आर्यवेद-दर्शन

भारतवर्ष की दैशिक स्थिति के अनुसार साधारणतः उदगयन में आदान, दक्षिणायन में विसर्ग और इनकी संधि में वर्षा होती है। अतः तत्कालीन समाज ने उदगयन में शिक्षित वसंत प्रीष्म और दक्षिणायन में वर्षा शरद् हेमंत इस प्रकार ऋतु विभाग किये। उक्त समस्त काल विभागों का भी सूर्य सोम वायुओं के परिभ्रमणों के साथ प्रत्यक्ष ही संबंध प्रतीत हो रहा था।

इस तरह एक समय यह सर्व समत था कि “ चंद्र, सूर्य, वायु इन जागतिक विभूतियों के स्वभावों तथा परिभ्रमण मार्गों के कारण ही संवत्सरात्मक काल, विसर्गदानविशेषात्मक अथवा शीतोष्णवर्षलक्षण ( शीतोष्णवर्षलक्षणः कालः ) होकर कलाकाष्ठादि, अहोरात्र, पक्ष, ऋतु, अयन इन विभागों में विभक्त है। सारांश काल, चंद्रसूर्यवायु इनका ‘ परिणाम ’ ( कालः पुनः परिणामः ) है ”

षड्खंडादी कहते थे कि ये सोमसूर्यवायु ही अपने स्वभावों तथा मार्गों के कारण संवत्सर, ऋतु, रस, दोष, देह, बल इन को क्रमशः पैदा करते हैं। और किसी समय इनकी देहगत दोषों के साथ तुलना व एकता प्रदर्शित करने के हेतु से यह भी कहा जाता था कि:—

लोकं वायवर्कसोमानां दुर्विज्ञेया यथा गतिः ।
तथा शरीरे वातस्य पित्तस्य च क्रफस्य च ॥