Skip to content
SarvaKosh
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

Page 163 of 235

Read in context
Page 163

भिक्षु आत्रेय का कालवाद

१४३

मुख्यतः शीतोष्णवर्षलक्षणों अथवा स्वभावों पर ही ध्यान रखते थे। परिभ्रमण गतियों पर उनका समुचित लक्ष्य नहीं था।

किंतु भिक्षु आत्रेय का ध्यान इन परिभ्रमण गतियों पर था। वे एक ऐसी विश्वव्यापिनी गति या शक्ति का अनुभव करते थे जो कि उक्त स्वभाव तथा मार्गों की जनयित्री है। अन्वेषण से उनको यह भली-भांति ज्ञात हुआ कि समस्त जगत् में जो कुछ भी हलचल ( कलयति ) या संगठन ( कालयति ) है वह इसके ही कारण है। यह एक कला भी स्थिर या तिरोहित ( कलां न लीयते ) नहीं होती। और वह उत्पत्तिविनाश रहित ( अनादि निधनः ) है। वे इसको ' काल ' शब्द से संबोधित करते थे। और यह प्रतिपादन करते थे किः—

तावेतावर्कवायू सोमश्च कालस्वभावमार्ग परिगृहीताः;
काल, ऋतु, रस, दोष, देह, बल, निर्वृत्ति प्रत्ययभूताः समुप-
दिश्यते । ( च. सू. अ. ६ )

अर्थात् ये सूर्यवायुसोम, उस काल संज्ञक शक्ति के स्वभावों और मार्गों से परिगृहीत ( व्याप्त ) हैं अर्थात् इनमें जिन उष्णत्वादि स्वभावों और परिभ्रमण मार्गों की प्रतीति होती है वे तत्त्वतः उस काल संज्ञक गति के प्रकार हैं। और