आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
Page 180 of 235
Read in context१६०
आयुर्वेद-दर्शन
भी सत्त्व रहित नहीं रहता बल्कि सत्त्व जिस प्रकार का हो उस प्रकार का उसे ज्ञान रहता है।
यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि 'कर्ता का कार्य-विषयक ज्ञान, इन्द्रियाभाव के कारण प्रवृत्त नहीं होता। क्योंकि जो किया जिन इन्द्रियों के द्वारा होती है वह उन इन्द्रियों के बिना नहीं हो सकती। कुम्भकार, घट बनाना जानता है पर उसका यह कार्य ज्ञान, मिट्टी के अभाव के कारण घट नहीं बना सकता।'
भारद्वाज, अब आप इस 'अध्यात्म' को सुनो। क्योंकि आत्म-विषयक ज्ञान का बल बहुत बड़ा है। इन्द्रियों को उनके विषयों से परावृत्त करके और चंचल मन को भी उस के विषयों से विमुख करके आत्मविद् पुरुष अध्यात्म में प्रविष्ट होता है अर्थात् अपने ज्ञान में ही स्थिर हो जाता है तब वह सर्वत्र 'अंकुठित ज्ञान' होकर बिना इन्द्रियों के ही समस्त भावों को जानता है। इसके अतिरिक्त भारद्वाज, इस निर्णय को भी सुनलो कि 'ज्ञानेन्द्रिय और वाणी के व्यापारों से निवृत्त होकर मनुष्य जब सोता है तब उसे स्वप्न में भी सुख दुःखादि विषयों का अनुभव होता ही है; अर्थात् यह ज्ञान, इन्द्रियों के बिना होता है और इस पर से भी यह जाना जा सकता है कि आत्मा 'अज्ञ' नहीं है। आत्मनिष्ठ उक्त ज्ञान (ज्ञानुत्प) के बिना अकेला इन्द्रियजन्यज्ञान