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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

इसीसे ये संवत्सर, ऋतु, रस, दोष, देह, बल इनकी उत्पत्ति में कारण कहे जाते हैं ।

भिन्न आत्रेय की इस घोषणा पर से यह भी ज्ञात होगा कि वे धातुपंचक, गुणपंचक और अग्नीषोम धर्म इनका सबका समन्वय काल में करते थे । क्योंकि वे सर्वत्र काल को ही कारण मानते थे, समस्त जगत् को कालवश समझते थे और इसी हेतु काल को पुरुष रोगोत्पादक कहते थे ।

यह हम पहिले बतला चुके हैं कि इस काल का समन्वय वायु में और उस वायु का भी समन्वय प्रजापति में किस कदर किया गया ।