आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुवेद-द शीन
रूप मल धुल नहीं जाता तबतक जिज्ञास्य विषय में बुद्धि प्रवेश नहीं करती। वास्तविक सिद्धांत यह है कि ‘जिन भावों’ की ‘संपदा’ से पुरुष पैदा होता है उनकी ‘विपदा’ से व्याधियाँ पैदा होती हैं”।
काशीपति वामक का मुख्य सवाल यह था कि ‘जिन कारणों से पुरुष पैदा होता है उन कारणों से उसको रोग होते हैं या नहीं’। इसका उत्तर सभी ऋषियों ने यह दिया कि ‘जिन कारणों से पुरुष पैदा होता है उन्हीं से उसको रोग भी होते हैं’। पुनर्वसु आत्रेय ने उसी का कुछ संशोधन करके यह निर्णय दिया कि “पुरुषरोगोत्पत्ति में क्रमशः भावों की ‘संपदा’ और ‘विपदा’ कारण हैं”।
किंतु काशीपति के दूसरे सवाल के विषय में अर्थात् ‘पुरुष, किन कारणों से पैदा होता है’ इसके विषय में ऋषियों में गहरा मतभेद था। अतः अब यह देखना आवश्यक है कि इस विषय में पुनर्वसु आत्रेय का अंतिम निर्णय क्या है।
इस पर विचार करने के पहिले यह ध्यान में रखना चाहिये कि यज्ञःपुरुषीय परिषद् में जितने भी ऋषि अथवा संप्रदाय उपस्थित थे उनमें आत्मा को स्वतःसिद्ध न मानने वाले चार संप्रदाय थे। इनमें दो अग्नीषोम लोकपक्षीय