आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आर्यवेद-दर्शन
भारतवर्ष की दैशिक स्थिति के अनुसार साधारणतः उदगयन में आदान, दक्षिणायन में विसर्ग और इनकी संधि में वर्षा होती है। अतः तत्कालीन समाज ने उदगयन में शिक्षित वसंत प्रीष्म और दक्षिणायन में वर्षा शरद् हेमंत इस प्रकार ऋतु विभाग किये। उक्त समस्त काल विभागों का भी सूर्य सोम वायुओं के परिभ्रमणों के साथ प्रत्यक्ष ही संबंध प्रतीत हो रहा था।
इस तरह एक समय यह सर्व समत था कि “ चंद्र, सूर्य, वायु इन जागतिक विभूतियों के स्वभावों तथा परिभ्रमण मार्गों के कारण ही संवत्सरात्मक काल, विसर्गदानविशेषात्मक अथवा शीतोष्णवर्षलक्षण ( शीतोष्णवर्षलक्षणः कालः ) होकर कलाकाष्ठादि, अहोरात्र, पक्ष, ऋतु, अयन इन विभागों में विभक्त है। सारांश काल, चंद्रसूर्यवायु इनका ‘ परिणाम ’ ( कालः पुनः परिणामः ) है ”
षड्खंडादी कहते थे कि ये सोमसूर्यवायु ही अपने स्वभावों तथा मार्गों के कारण संवत्सर, ऋतु, रस, दोष, देह, बल इन को क्रमशः पैदा करते हैं। और किसी समय इनकी देहगत दोषों के साथ तुलना व एकता प्रदर्शित करने के हेतु से यह भी कहा जाता था कि:—
लोकं वायवर्कसोमानां दुर्विज्ञेया यथा गतिः ।
तथा शरीरे वातस्य पित्तस्य च क्रफस्य च ॥