आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextकांकायन का प्रजापतिवाद।
वाल्हीकभिषक् कांकायनः—स्वभाववाद का खंडन करते हुएः—
कांकायनस्तु नेत्याह नह्यारंभ फलं भवेत् ।
भवेत् स्वभावाद्वावानामसिद्धिः सिद्धिरेव वा ॥
कांकायन ने कहा कि पुरुष और रोगों की उत्पत्ति में स्वभाव को कारण कहना उचित नहीं है। समस्त भावों की सिद्धि अथवा असिद्धि यदि स्वभावतः हो, तो कर्म और फल (जिनका अस्तित्व प्रत्यक्ष सिद्ध है) संबंधी समस्याएँ हल न होंगी।
कांकायन, 'कृत' कर्मवादी थे। उनका कहना था कि किसी भी रूप में विना कर्ता के कर्म पैदा नहीं हो सकता। उसी तरह कर्मफल को भोगनेवाला भी होना चाहिये। कांकायन, अब स्वमत कहते हैं किः—
स्रष्टात्वभित संकल्पो ब्रह्मोपत्यं प्रजापतिः ।
चेतनाचेतनस्यास्य जगतः मुख दुःखयोः ॥
अर्थात् ब्रह्म का अपत्य प्रजापति ही जो कि अभित संकल्पकारी है; इस सचेतन और अचेतन जगत् को तथा उसके मुख दुःखों को पैदा करता है।