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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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कांकायन का प्रजापतिवाद

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यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि प्रजापति, जिस तरह वायु, अग्नि, सोम संज्ञक धर्मों में अतिरिक्त हुआ उस तरह वह असंख्य प्रजा (पशुपुरुष, मूर्ति, भूतात्मा अथवा जीवात्मा) ओं में भी अतिरिक्त हुआ। धर्मों का आपस में यज्ञ होकर 'भूमि' अर्थात् सप्त आवरण, (सत्य, तप, जन, मह, स्वर, भुव, भू) आकाशादि धातु, सूर्यादि लोक, ऋतु इ० अचेतन सृष्टि पैदा हुई। और तत्पश्चात् शरीर (पुरः) अर्थात् सचेतन सृष्टि पैदा हुई। सचेतन सृष्टि की पैदाइश के समय धर्मों ने यज्ञसाधनभूत 'पुरुषपशु' (जीवात्मा) का 'बहिः' (इसका अर्थ सायणाचार्य ने 'मानस यज्ञ' किया है। किंतु सृष्टिविज्ञान की भाषा में यह उस स्थिति विशेष का बोधक मालूम होता है जिसमें कि अचेतन, सचेतन में परिणत होता है) में प्रोक्षण किया। इस प्रोक्षण के समय वसंत, घी हुआ; ग्रीष्म, समिद हुआ और शरद, हविर्द्रव्य हुआ। इस तरह पशुपुरुष को ७ परिधियों और २१ समिधाओं से बांध दिया गया ! अस्तु। अब वायु, अग्नि, सोम इन प्राथमिक धर्मों के विषय में कुछ अधिक विचार करना आवश्यक है।

वायुः—इसके विषय में निम्न लिखित मंत्र मननीय हैं।

प्राणमाहुर्मातरिश्चानं वातो ह प्राणभुज्यते ।
प्राणो ह भूतं भज्यं च प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥