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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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कांकायन का प्रजापतिवाद

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कहा गया है कि वैदिक ऋषि यह भली भांति जानते थे कि सचेतन स्तुति को पैदा करने के लिये आरंभिक जलों की अत्यन्त आवश्यकता है। इन जलों को सोम ( रस ) पैदा करता है अर्थात् सोम, जलों का प्रधान घटक है। किन्तु सोम, अकेला जलों को पैदा नहीं करता तो उसके साथ मित्र, वरुण और अग्नि भी रहते हैं अर्थात् सोम के अतिरिक्त ये भी जलों के घटक हैं।

जलोत्पादन के विषय में अन्यत्र यह कहा गया है कि “मित्रं हुवे पूतदृक्षं वरुणं च ऋषादसम् । धियं घृतार्ची साधता ” ॥ ( यजु० ३३-५७ ) अर्थात् पावित्र्यवर्धक तथा पापक्षयकारक मित्रावरुणों को ( हम ) इस बुद्धि से आवाहन करते हैं कि वे शुद्ध जल का साधन करें। किन्तु यह साधन तबतक नहीं हो सकता जबतक सोम के द्वारा इनको अभिप्रेत न किया जाय। अतः यह कहा गया कि “अयं वा मित्रा वरुणा सुतः सोम ऋतावृधः” ( यजु० ७-९ ) अर्थात् हे यज्ञ वर्धन मित्रावरुण, तुमको सोम ने ‘अभिप्रेत’ किया। मित्र और वरुण के इस अभिषेक के समय अर्थात् ही जलोत्पादन के समय ( अयं वेनश्रोदयत्वृश्रिगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । यजु० ७-१६ ) सोम, विद्युत् से आवृत हो कर झुलेकस्थ ( मित्रावरुणाभिषवरूप ) जलों को पृथ्वी पर प्रेरित करता है।