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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

अभिप्रेत है। इसके उपलक्ष में ही यह विधान किया है कि यह जब ऋतुओं में परिणत होता है तब सचेतन जगत् पैदा होता है।

प्राण से ही सूर्य व चन्द्र पैदा होते हैं। सूर्य-चन्द्र शब्द अग्नीपोम वाचक भी हैं। अग्नि और सूर्य की उत्पत्ति के विषय में ऋग्वेद में कहा गया है कि “परम आकाश में स्थित वह अग्नि, मातरिश्वा से पैदा हुआ। कुशलता और बल से सिलगे हुए इस अग्नि के तेज से वावापृथिवी प्रकाशमान हुई” (ऋ. १,१४३,२) और अन्यत्र यह भी कहा गया है कि “वायु से अग्नि और अग्नि से सूर्य पैदा हुआ।” (ऐतरेय ब्राह्मण। ८,२०) सोमोत्पत्ति के विषय में यजुर्वेद का “अपांसरस्य यो रसः” (यजु. अ. ९ मं. ३) यह मंत्र मननीय है। इसमें यह कहा गया है कि “उदकों का रस (सार अथवा मूल) सोम है और सोम का भी रस वायु है”। सारांश प्राण अथवा वायु संज्ञक महती शक्ति ही अग्नि व सोम संज्ञक धर्मों में परिणित हुई है।

वार्योविद् ने इस प्राण संज्ञक शक्ति को ही ‘वायु’ शब्द से संबोधित किया है और उसके लोकगत तथा देहगत दोनों कार्यों का विवेचन (इसका मूल अंश हम पहिले त्रिधातु सिद्धांत पर विचार करते हुए उद्धृत कर चुके हैं) किया है। वे कहते हैं कि:—