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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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भिक्षु आत्रेय का कालवाद

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ऋतुओं का और उनके शीत, उष्ण, वर्ष लक्षणों का जब अधिक अभ्यास होने लगा तब यह मालूम हुआ कि उद्विज स्वेदज, अंडज, जरागुज आदि सभी प्राणिजातियाँ प्रायः किसी खास ऋतु में पैदा होती हैं, निश्चित समय तक रहती हैं, और निश्चित ऋतु या अवस्था में नष्ट हो जाती हैं। इनमें उगाई, बहार, पतझड़, चय, प्रकोप, प्रशम, आदि जो प्रत्यक्ष परिवर्तन हुआ करते हैं वे ऋतुओं के मुख्यतः उष्ण, शीत, वर्ष लक्षणों के अनुसार होते हैं। जनपदो-ध्वंसक कारणों की उत्पत्ति में भी ऋतुओं का अथवा शीतोष्ण-वर्ष लक्षणों का विपर्यय ही कारण है। उक्त लक्षणों का अधिक अभ्यास करने पर यह भी ज्ञात हुआ कि शैत्य के कारण सृष्टि में मुख्यतः बलौत्पत्ति अर्थात् संगठन होता है, उष्णता के कारण बल का अपहरण होता है और वर्षा के कारण वायु प्रकृपित होकर फेंकने की क्रिया होती है। इन व्यापारों को संक्षेप में विसर्ग, आदान और विश्लेष इन नामों से संबोधित किया जाने लगा। इसके अतिरिक्त यह घटना नित्य के परिचय की थी कि—शीतांतुः क्रेदयत्यूर्वा विवस्वान् शोषयत्यपि। तातुभावापि संश्रित्य वायुः पालयति प्रजाः। ( सु० सं० ) इ०।

उस समय अयनगति के आधार पर संवत्सरात्मक काल के दो विभाग किये जाते थे; उदगयन और दक्षिणायन।