आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextकांकायन का प्रजापतिवाद
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क्योंकि इन शब्दों में वह सृष्टिविज्ञान है जिसको कि हम प्रजापतिवाद कहते हैं। वास्तव में देखा जाय तो 'पुरुषसूक्त' में जिस विशुद्ध वैदिक सृष्टिविज्ञान का विवेचन है उसी विज्ञान का उक्त प्रजापति देवत्या श्रुति में भिन्न संज्ञाओं में उल्लेख किया है।
यहां 'ब्रह्म' शब्द से पुरुषसूक्त प्रतिपादित उस अनादि पुरुष को संबोधित किया गया है जिसका त्रिपाद अर्थात् ब्रह्महंश, 'अमृतत्व' (निर्विकार) रूप होकर एकपाद अर्थात् स्वल्पांश साशन (सचेतन) अनशन (अचेतन) रूप 'विराट' में परिणत है। [ पु. सू. में १-४ ]
पुरुषसूक्त की भाषा में उक्त एकपाद 'विराट' के अभिमानी पुरुष को 'विराटपुरुष' कहते हैं। किंतु प्रजापतिवाद की भाषा में उसी को 'प्रजापति' कहते हैं। यह, ब्रह्म का ही अंश होने के कारण कांकायन ने उसको ब्रह्म का अपत्य कहा है।
पुरुषसूक्त में यह कहा गया है कि अचेतन सचेतन विराट को पैदा करने के पूर्व विराटपुरुष, प्रधान धर्मों में ('अत्यरिच्यत' में, ५) अलग २ परिणत हुआ। इन धर्मों को पुरुषसूक्त में 'देव' भी कहते हैं। इन देवों के विषय में यह भी कहा गया है कि "यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि