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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

सूक्त-३९ देवता—कुष्ठ

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समुद्र में उत्पन्न हो. (२)
उभयोरग्रभं नामास्मा अरिष्टतातये.. (३)
हे गुग्गुलु! मैं तुझे दोनों प्रकार के रोगों का नाम बताता हूं. दुःख देने वाले वर्तमान रोग
के विनाश हेतु मैं तुझ से प्रार्थना करता हूं. (३)
सूक्त-३९ देवता—कुष्ठ
ऐतु देवस्त्रायमाणः कुष्ठो हिमवतस्परि.
तक्मानं सर्वं नाशय सर्वांश्च यातुधान्यः.. (१)
कूठ नाम की विशेष ओषधि द्युलोक में उत्पन्न हुई है. यह हमारी रक्षा करती हुई
हिमवान पर्वत से आए. वह सभी क्लेशकारी रोगों का नाश करे तथा सभी राक्षसियों को नष्ट
करे. (१)
त्रीणि ते कुष्ठ नामानि नद्यमारो नद्यारिषः.
नद्यायं पुरुषो रिषत्.
यस्मै परिब्रवीमि त्वा सायंप्रातरथो दिवा.. (२)
हे कुष्ठ! तुम्हारे तीन नाम नद्यमार, नद्यारिष और नद्य हैं. तुम्हारा नाम लेने के अभाव में
यह पुरुष हिंसित हुआ है. मैं रोग से दुःखी पुरुष के लिए तुम्हारा नाम मंत्र के रूप में बता रहा
हूं. वह सायंकाल, प्रातः और दिन में तुम्हारे नाम का उच्चारण करे. (२)
जीवला नाम ते माता जीवन्तो नाम ते पिता.
नद्यायं पुरुषो रिषत्.
यस्मै परिब्रवीमि त्वासायंप्रातरथो दिवा.. (३)
हे कुष्ठ नाम की ओषधि! जीवला तेरी माता है और जीवंत तेरे पिता हैं. तुम्हारा नाम न
लेने के कारण इस पुरुष की हिंसा हुई है. मैं रोग से दुःखी पुरुष को तुम्हारा नाम मंत्र के रूप
में प्रातः, सायं और दिन में उच्चारण हेतु बताता हूं. (३)
उत्तमो अस्योषधीनामनड्वाण् जगतामिव व्याघ्रः श्वपदामिव.
नद्यायं पुरुषो रिषत्.
यस्मै परिब्रवीमि सायंप्रातरथो दिवा.. (४)
हे कुष्ठ ओषधि! जिस प्रकार गति करने वाला बैल श्रेष्ठ है उसी प्रकार ओषधियों में तुम
श्रेष्ठ हो. जंगली पशुओं में बाघ जिस प्रकार श्रेष्ठ है. उसी प्रकार तुम ओषधियों में श्रेष्ठ हो.
(४)
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त्रिः शाम्बुभ्यो अङ्गिरेभ्यस्त्रिरादित्येभ्यस्परि.
त्रिर्जातो विश्वेदेवेभ्यः.
स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति.
तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (५)
हे कुष्ठ ओषधि! तुम अंगिरा गोत्रीय ऋषियों की संतान शांबु नाम के ऋषियों से तीन
बार उत्पन्न हुए, आदित्यों से तीन बार उत्पन्न तथा विश्वे देवों से तीन बार उत्पन्न कहे जाते हो.
सभी रोगों की ओषधि कुष्ठ सोम के साथ स्थित होती हैं. तुम सभी रोगों तथा सभी राक्षसियों
का नाश करो. (५)
अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयस्यामितो दिवि.
तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत.
स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति.
तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (६)
इस भूलोक से तीसरे द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में देवों का घर पीपल का वृक्ष है. उस पीपल
पर मरण रहित सोम उत्पन्न हुआ है. उस सोम से कुष्ठ ओषधि उत्पन्न हुई है. सभी रोगों की
ओषधि यह कुष्ठ सोम के साथ स्थित होता है. हे कुष्ठ! तुम सभी रोगों और सभी राक्षसियों
का नाश करो. (६)
हिरण्ययी नौरचरद्धिरण्यबन्धना दिवि.
तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत.
स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति.
तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (७)
स्वर्ग में सोने से बनी रस्सी से बंधी हुई सोने की नाव घूमती रहती है. वहां मरणरहित
सोम की उत्पत्ति हुई है. उस सोम से कुष्ठ उत्पन्न हुआ है. सभी रोगों की ओषधि यह कुष्ठ सोम
के साथ स्थित रहता है. हे कुष्ठ! तुम सभी रोगों और राक्षसियों का विनाश करो. (७)
यत्र नावप्रभ्रंशनं यत्र हिमवतः शिरः.
तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत.
स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति.
तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (८)
जिस स्वर्ग से उत्तम कर्म करने वालों का पतन नहीं होता तथा जहां हिमवान पर्वत शीश
अर्थात् सब से ऊंचा शिखर है वहां अमृत की स्थिति है. उस अमृत से कुष्ठ उत्पन्न हुआ है.
सभी रोगों की ओषधि कुष्ठ वहां स्वर्ग में सोम से संबंधित रहता है. हे कुष्ठ! सभी रोगों और
राक्षसियों का विनाश करो. (८)
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यं त्वा वेद पूर्व इक्ष्वाको यं वा त्वा कुष्ठ काम्यः.
यं वा वसो यमात्स्यस्तेनासि विश्वभेषजः.. (९)
हे कुष्ठ नाम की ओषधि! तुम को इक्ष्वाकु वंश के प्राचीन राजा जानते थे तथा तुझ को
कामदेव का पुत्र जान गया था. तुम्हें वसु नाम का देवता जानता था. इस कारण तुम सभी
रोगों की ओषधि हो, तुम्हें सभी रोगों के विनाश के रूप में जाना जाता है. (९)
शीर्षलोकं तृतीयकं सदन्दिर्यश्च हायनः.
तक्मानं विश्वधायीर्याधराञ्चं परा सुव.. (१०)
तृतीय लोक अर्थात् स्वर्ग को तुम्हारा शीश कहा जाता है. वह सभी रोगों का खंडन
करने वाला हो. हे सभी प्रकार की शक्तियों से युक्त कुष्ठ! तुम सभी रोगों को तथा नीचे होने
वाले पतन को हम से दूर करो. (१०)
सूक्त-४० देवता—विश्वे देव, बृहस्पति
यन्मे छिद्रं मनसो यच्च वाचः सरस्वती मन्युमन्तं जगाम.
विश्वैस्तद् देवैः सह संविदानः सं दधातु बृहस्पतिः.. (१)
जो मेरे मन का छिद्र अर्थात् दोष है तथा वाणी का दोष है, उस के कारण सरस्वती क्रोध
से युक्त मुझ को छोड़ कर चली गई है. सभी देवों के साथ एकमत हुए बृहस्पति मेरे इन दोषों
को दूर करें. (१)
मा न आपो मेधां मा ब्रह्म प्र मथिष्टन.
सुष्यदा यूयं स्यन्धध्वमुपहूतो ऽ हं सुमेधा वर्चस्वी.. (२)
हे जल देवता! तुम मेरी बुद्धि को भ्रष्ट मत करो. ब्रह्मा मेरे द्वारा अध्ययन किए गए वेद
को भ्रष्ट न करें. मेरा जो जो कर्म सूख रहा है अर्थात् नष्ट हो रहा है, उसे लक्ष्य बना कर तुम
सभी ओर से उसे गीला बनाओ अर्थात् सुरक्षित करो. आप सभी की अनुमति से मैं उत्तम
बुद्धि वाला बनूं तथा ब्रह्म के तेज से युक्त हो जाऊं. (२)
मा नो मेधां मा नो दीक्षां मा नो हिंसिष्टं यत् तपः.
शिवा नः शं सन्त्वायुषे शिवा भवन्तु मातरः.. (३)
हे द्यावा पृथ्‍वी! तुम मेरी बुद्धि को तथा दीक्षा को नष्ट मत करो. जल देवता मेरे लिए
सुखकारी हों तथा मेरी आयु वृद्धि के लिए कहें. माता के समान हितकारी जल मेरे लिए
कल्याणकारी हों. (३)
या नः पीपरदश्विना ज्योतिष्मती तमस्तिरः. तामस्मे रासतामिषम्.. (४)
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हे अश्विनीकुमारो! सभी व्यवहारों को बाधा पहुंचाने वाला अंधकार हमारे पास आए.
प्रकाश वाली रात उस अंधकार का तिरस्कार करे. हमें इस प्रकार की प्रकाश युक्त रात्रि प्रदान
करो. (४)
सूक्त-४१ देवता—तप
भद्रमिच्छन्त ऋषयः स्वर्विदस्तपो दीक्षामुपनिषेदुरग्रे.
ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उपसंनमन्तु.. (१)
सृष्टि के आदि में सब के कल्याण की इच्छा करते हुए ऋषियों ने स्वर्ग प्राप्त करते हुए
तप की दीक्षा प्राप्त की. उस से राष्ट्र, बल और ओज उत्पन्न हुए. देव उस राष्ट्र आदि को इस
पुरुष के लिए प्रदान करें. (१)
सूक्त-४२ देवता—ब्रह्म
ब्रह्म होता ब्रह्म यज्ञा ब्रह्मणा स्वरवो मिताः.
अध्वर्युर्ब्रह्मणो जातो ब्रह्मणो ऽ न्तर्हितं हिवः.. (१)
जगत् की उत्पत्ति का कारण ब्रह्म होता है, ब्रह्म ही यज्ञ है. ब्रह्म ने उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित आदि स्वरों का गमन निश्चित किया है. ब्रह्म से ही अध्वर्यु उत्पन्न हुए. यज्ञ का साधन
हवि ब्रह्म में ही स्थित है. (१)
ब्रह्म सुचो घृतवतीर्ब्रह्मणा वेदिरुद्धिता.
ब्रह्म यज्ञस्य तत्त्वं च ऋत्विजो ये हविष्कृतः. शमिताय स्वाहा.. (२)
घृत से पूर्ण तथा होम का साधन सुवा भी ब्रह्म है. ब्रह्म ने ही यज्ञवेदी को खोदा है. ब्रह्म
यज्ञ का तत्त्व है. हवि तैयार करने वाले ऋत्विज् भी ब्रह्म ही हैं. अभेद को प्राप्त ब्रह्म के लिए
आहुति उत्तम हो. (२)
अंहोमुचे प्र भरे मनीषामा सुत्राव्णे सुमतिमावृणानः.
इममिन्द्र प्रति हव्यं गृभाय सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः.. (३)
पापों से छुटकारा दिलाने वाले तथा भलीभांति रक्षा करने वाले इंद्र के लिए मैं उत्तम
स्तुति बोलता हुआ उपासना पूर्ण करता हूं. हे इंद्र! तुम मेरा हव्य स्वीकार करो. तुम्हारी कृपा
से यजमान की इच्छाएं पूर्ण हों. (३)
अंहोमुचं वृषभं यज्ञियानां विराजन्तं प्रथममध्वराणाम्.
अपां नपातमश्विना हुवे धिय इन्द्रियेण त इन्द्रियं दत्तमोजः.. (४)
यज्ञ के योग्य देवों में श्रेष्ठ, पाप से मुक्त कराने वाले तथा यज्ञों में प्रमुख रूप में

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विराजमान इंद्र का मैं आह्वान करता हूं. जलों की वर्षा करने वाले अग्नि तथा अश्विनीकुमारों
का मैं आह्वान करता हूं. वे अश्विनीकुमार इंद्रियों की सामर्थ्य से तुम्हें बुद्धि, ओज और बल
प्रदान करें. (४)
सूक्त-४३ देवता—मंत्रों में कहे गए अग्नि
आदि
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
अग्निर्मा तत्र नयत्वग्निर्मेधा दधातु मे. अग्नये स्वाहा.. (१)
जिस स्थान में सगुण ब्रह्म के स्वरूप को जानने वाले दीक्षा और तप के द्वारा जाते हैं,
अग्नि देव मुझे वहां ले जाएं. अग्नि देव मुझे बुद्धि प्रदान करें. यह आहुति अग्नि को
भलीभांति प्राप्त हो. (१)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
वायुर्मा तत्र नयतु वायुः प्राणान् दधातु मे. वायवे स्वाहा.. (२)
सगुण ब्रह्म के स्वरूप को जानने वाले दीक्षा और तप के कारण जहां जाते हैं, वायु मुझे
वहां ले जाएं तथा वायु मुझ में प्राणों का आधान करें. यह आहुति भलीभांति वायु को प्राप्त
हो. (२)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
सूर्यो मा तत्र नयतु चक्षुः दधातु मे. सूर्याय स्वाहा.. (३)
सगुण ब्रह्म के स्वरूप को जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं, सूर्य
देव मुझे वहां ले जाएं. सूर्य देव मुझे नेत्र प्रदान करें. यह आहुति सूर्य देव को भलीभांति प्राप्त
हो. (३)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
चन्द्रो मा तत्र नयतु मनश्चन्द्रो दधातु मे. चन्द्राय स्वाहा.. (४)
सगुण ब्रह्म का स्वरूप जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं, चंद्र
मुझे वहां पहुंचाएं. चंद्र देव मुझ में मन धारण करें. यह आहुति चंद्र देव को भलीभांति प्राप्त
हो. (४)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
सोमो मा तत्र नयतु पयः सोमो दधातु मे. सोमाय स्वाहा.. (५)
सगुण ब्रह्म के स्वरूप को जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं,
सोम मुझे वहां ले जाएं. सोम मुझे दूध प्रदान करें. यह आहुति सोम को भलीभांति प्राप्त हो.
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(५)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
इन्द्रो मा तत्र नयतु बलमिन्द्रो दधातु मे. इन्द्राय स्वाहा.. (६)
सगुण ब्रह्म का स्वरूप जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं, इंद्र देव
मुझे वहां ले जाएं. इंद्र देव मुझ में बल धारण करें. यह आहुति इंद्र को भलीभांति प्राप्त हो.
(६)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
आपो मा तत्र नयन्त्वमृतं मोप तिष्ठतु. अद्भ्यः स्वाहा.. (७)
सगुण ब्रह्म का स्वरूप जानने वाले अपनी दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं,
जल देवता मुझे वहां ले जाएं. जल देवता मुझ में अमृत धारण करें. यह आहुति जल देवता
को भलीभांति प्राप्त हो. (७)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
ब्रह्मा मा तत्र नयतु ब्रह्मा ब्रह्म दधातु मे. ब्रह्मणे स्वाहा.. (८)
सगुण ब्रह्म का स्वरूप जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां पहुंचते हैं,
ब्रह्मा मुझे वहां ले जाएं. ब्रह्मा मुझ में ब्रह्म की उपासना करें. यह आहुति ब्रह्मा को भलीभांति
प्राप्त हो. (८)
सूक्त-४४ देवता—आंजन, वरुण
आयुषो ऽ सि प्रतरणं विप्रं भेषजमुच्यसे.
तदाञ्जन त्वं शंताते शमापो अभयं कृतम्.. (१)
हे आंजन! तुम सौ वर्ष की आयु देने वाले हो. तुम प्रसन्न करने वाली ओषधि कहे जाते
हो, इसलिए हे आंजन! तुम सुख रूप कहे जाते हो. हे जल के लक्षण आंजन! तुम और जल
देवता मुझे सुख प्रदान करें तथा अभय प्रदान करें. (१)
यो हरिमा जायान्यो ऽ ङ्गभेदो विसल्पकः.
सर्वं ते यक्ष्ममङ्गेभ्यो बहिर्निर्हन्त्वाञ्जनम्.. (२)
हल्दी के समान पीले रंग का जो पांडु रोग कठिनता से चिकित्सा करने योग्य है, वह
अंगों को भिन्न करता है और अनेक प्रकार के घाव कर देता है. यह आंजन के अंगों से सभी
रोगों को बाहर निकाल कर नष्ट करे. (२)
आञ्जनं पृथिव्यां जातं भद्रं पुरुषजीवनम्.
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कृणोत्वप्रमायुकं रथजूतिमनागसम्.. (३)
पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ आंजन कल्याण करने वाला तथा पुरुषों को जीवित करने वाला
है. यह आंजन हमें मरण रहित, रथ के समान तीव्र गति वाला तथा पाप रहित करे. (३)
प्राण प्राणं त्रायस्वासो असवे मृड. निर्ऋते निर्ऋत्या नः पाशेभ्यो मुञ्च..
(४)
हे प्राण रूप आंजन! तुम मेरे प्राण की रक्षा करो तथा अकाल में नष्ट न होने वाला
बनाओ. हे प्राणरूप आंजन! तुम प्राणों को सुखी बनाओ. हे निर्ऋति रूप आंजन! हमें
निर्ऋति के फंदों से छुड़ाओ. (४)
सिन्धोगर्भो ऽ सि विद्युतां पुष्पम्.
वातः प्राणः सूर्यश्चक्षुर्दिवस्पयः.. (५)
हे आंजन! तुम सागर के गर्भ और बिजली के फूल हो. तुम वायु के प्राण, सूर्य के नेत्र
और आकाश के जल हो. (५)
देवाञ्जन त्रैककुद परि मा पाहि विश्वतः.
न त्वा तरन्त्योषधयो बाह्याः पर्वतीया उत.. (६)
हे त्रिककुद पर्वत पर उत्पन्न एवं देवों के द्वारा अपनी रक्षा के लिए धारण किए जाते हुए
आंजन! सभी ओर से हमारी रक्षा करो. पर्वत से अधिक ऊंचे स्थान पर उत्पन्न ओषधियां
अर्थात् जड़ीबूटियां तुम्हारे प्रभाव को नहीं लांघ सकतीं. (६)
वी ३ दं मध्यमवास्पद् रक्षोहामीवचातनः.
अमीवाः सर्वाश्चातयन् नाशयदभिभा इतः.. (७)
राक्षसों का विनाश करने वाला तथा रोगों को नष्ट करने वाला यह आंजन सभी रोगों का
विनाश करता हुआ तथा सभी रोगों को पराजित करता हुआ प्रसिद्ध हो. (७)
बह्वी ३ दं राजन् वरुणानृतमाह पूरुषः.
तस्मात् सहस्रवीर्य मुञ्च नः पर्यंहसः.. (८)
हे राजा वरुण! यह मनुष्य सवेरे से शाम तक अनेक प्रकार का असत्य भाषण करता है.
इस के असत्य भाषण को क्षमा करो. हे हजारों प्रकार की शक्ति वाले आंजन! इस असत्य
भाषण रूप बाण से हमें सभी ओर से छुड़ाओ. (८)
यदापो अघ्न्या इति वरुणेति यदूचिम.
तस्मात् सहस्रवीर्य मुञ्च नः पर्यंहसः.. (९)
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हे वरुण! हम ने जो कहा था, तुम जल के स्वामी होने के कारण उसे जानते हो. हे
गायो! तुम मेरे चित्त को जानती हो. हे वरुण! मैं ने जो कहा है, उसे तुम जानते हो. हे हजार
गुणी शक्ति वाले आंजन! हमें उस पाप से मुक्ति दिलाओ. (९)
मित्रश्च त्वा वरुणश्चानुप्रेयतुराञ्जन.
तौ त्वानुगत्य दूरं भोगाय पुनरोहतुः.. (१०)
हे आंजन! मित्र देव और वरुण देव तुम्हारे पीछेपीछे भूमि पर पहुंचे तथा बाद में स्वर्ग
को गए. तुम सुख का उपभोग करने के लिए उन्हें लाओ. (१०)
सूक्त-४५ देवता—आंजन
ऋणादृणमिव संनयन् कृत्यां कृत्याकृतो गृहम्.
चक्षुर्मन्त्रस्य दुर्हर्दः पृष्टीरपि शृणाञ्जन.. (१)
हे आंजन! जिस प्रकार ऋण लेने वाला धन ऋण दाता को लौटा देता है, उसी तरह मुझे
पीड़ा पहुंचाने वाली कृत्या नाम की राक्षसी को उसी के घर भेज दो, जिस ने उसे मेरे पास
भेजा है. हे आदित्य के चक्षु आंजन! दुष्ट हृदय वालों के समीपवर्तियों का भी विनाश करो.
(१)
यदस्मासु दुष्षप्न्यं यद् गोषु यच्च नो गृहे.
अनामगस्तं च दुर्हर्दः प्रियः प्रति मुञ्चताम्.. (२)
हमारे पुत्र, पौत्र आदि में जो बुरा स्वप्न है, हमारी गायों से संबंधित जो बुरा स्वप्न है,
हमारे घर में स्थित दास आदि का जो बुरा स्वप्न है, उसे नाम रहित शत्रुओं के लिए छोड़ दो.
(२)
अपामूर्ज ओजसो वावृधानमग्नेर्जातमधि जातवेदसः.
चतुर्वीरं पर्वतीयं यदाञ्जनं दिशः प्रदिशः करदिच्छिवास्ते.. (३)
हे जल के सार, ओज को बढ़ाने वाले तथा जातवेद अग्नि से उत्पन्न तथा त्रिककुद नाम
के पर्वत पर जन्म लेने वाले आंजन! मेरे लिए दिशाओं और प्रदिशाओं को मंगलकारी
बनाओ. (३)
चतुर्वीरं बध्यत आञ्जनं ते सर्वा दिशो अभयास्ते भवन्तु.
ध्रुवस्तिष्ठासि सवितेव चार्य इमा विशो अभि हरन्तु ते बलिम्.. (४)
हे रक्षा रूपी फल की कामना करने वाले पुरुष! तेरे हाथ में चारों दिशाओं में शक्ति का
प्रदर्शन करने वाली आंजन मणि रूपी ओषधि अर्थात् जड़ी बांधी जाती है. इस मणि को
धारण करने से तेरी दिशाएं और प्रदिशाएं भय रहित हो जाएं. हे अधिकार संपन्न आंजन! तुम
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सूर्य के समान चारों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए स्थिर रूप में रहो. ये सभी दिशाएं तुम्हें
बल प्रदान करें. (४)
आङ्क्ष्वैकं मणिमेकं कृणुष्व स्नाह्येकेना पिबैकमेषाम्.
चतुर्वीरं नैर्ऋतेभ्यश्चतुर्भ्यो ग्राह्या बन्धेभ्यः परि पात्वस्मान्.. (५)
हे पुरुष! एक आंजन को अपनी आंख में धारण करो तथा दूसरे आंजन को मणि
बनाओ. एक आंजन से स्नान करो. इस प्रकार पर्वत की तीन चोटियों पर उत्पन्न तीन आंजनों
का उपयोग करो. ये तीनों वहां धारण की जाएं. इस का ज्ञान न कर के इच्छानुसार इन का
प्रयोग करो. चार शक्तियों वाले इस आंजन को ग्रहण करने के योग्य ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी
के साथ निर्ऋति देवता से संबंधित बंधनों से हमारी रक्षा करो. (५)
अग्निर्माग्निनावतु प्राणायापानायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये सुभूतये
स्वाहा.. (६)
अग्नि अपने अग्नित्व धर्म के द्वारा मेरी रक्षा करें. अग्नि प्राण की स्थिरता के लिए,
अपान की स्थिरता के लिए, आयु की वृद्धि के लिए, वेद के अध्ययन से उत्पन्न तेज के लिए,
बल के लिए, शरीर की कांति के लिए, कुशल के लिए तथा शोभन संपत्ति के लिए मेरी रक्षा
करें. यह आहुति भलीभांति अग्नि को प्राप्त हो. (६)
इन्द्रो मेन्द्रियेणावतु प्राणायापानायायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये
सुभूतये स्वाहा.. (७)
इंद्र अपनी असाधारण शक्ति से मेरी रक्षा करें. इंद्र प्राण की स्थिरता के लिए, अपान की
स्थिरता के लिए, आयु की वृद्धि के लिए, शरीर की कांति के लिए, कुशल के लिए तथा
शोभन संपत्ति के लिए मेरी रक्षा करें. यह आहुति भलीभांति इंद्र को प्राप्त हो. (७)
सोमो मा सौम्येनावतु प्राणायापानायायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये
सुभूतये स्वाहा.. (८)
सोम अपनी शक्ति प्राण की स्थिरता के लिए, अपान की स्थिरता के लिए, आयु की
वृद्धि के लिए, शरीर की कांति के लिए, कुशल के लिए तथा शोभन संपत्ति के लिए मेरी रक्षा
करें. यह आहुति सोम को भलीभांति प्राप्त हो. (८)
भगो मा भगेनावतु प्राणायापानायायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये
सुभूतये स्वाहा.. (९)
भग देव अपनी शक्ति से प्राण की स्थिरता के लिए, अपान की स्थिरता के लिए, आयु
की वृद्धि के लिए, शरीर की कांति के लिए, कुशल के लिए तथा शोभन संपत्ति के लिए मेरी
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रक्षा करें. यह आहुति कामदेव को भलीभांति प्राप्त हों (९)
मरुतो मा गणैरवन्तु प्राणायापानायायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये
सुभूतये स्वाहा.. (१०)
मरुत अपने गणों के साथ प्राण की स्थिरता के लिए, अपान की स्थिरता के लिए, आयु
की वृद्धि के लिए, शरीर की क्रांति के लिए, कुशल के लिए तथा शोभन संपत्ति के लिए मेरी
रक्षा करें. यह आहुति मरुत् देव को भलीभांति प्राप्त हो. (१०)
सूक्त-४६ देवता—आस्तृत मणि
प्रजापतिष्ट्वा बध्नात् प्रथममस्तृतं वीर्याय कम्.
तत् ते बध्नाम्यायषे वर्चस ओजसे च बलाय चास्तृतस्त्वाभि रक्षतु (१)
हे आस्तृत मणि! सृष्टि के आदि से प्रजापति ने तुम्हें वीरता पूर्ण काम के लिए बांधा था.
शत्रु तुम्हें बाधा नहीं पहुंचा सकते. हे पुरुष! आयु वृद्धि के लिए, दीप्ति के लिए, ओज के लिए
तथा बल के लिए मैं तेरे हाथ में शत्रुओं का उपद्रव शांत करने वाली मणि को बांधता हूं. यह
मणि तुम्हारी रक्षा करे. (१)
ऊर्ध्वस्तिष्ठतु रक्षन्नप्रमादमस्तृतेमं मा त्वा दभन् पणयो यातुधानाः.
इन्द्र इव दस्यूनव धूनुष्व पृतन्यतः सर्वाञ्छत्रून् वि षहस्वास्तृतस्त्वाभि
रक्षतु.. (२)
हे आस्तृत मणि! तुम सावधानीपूर्वक इस धारणकर्ता की रक्षा करती हुई सर्वदा
जागरूक रहो. यातुधान अर्थात् राक्षस एवं पणि नाम के असुर तुम्हारी हिंसा न करें. इंद्र ने
जिस प्रकार अपने शत्रुओं को रण से भगाते हुए कंपित किया था, उसी प्रकार तुम लुटेरों को
कंपित करो. जो संग्राम की इच्छा करते हैं उन सभी शत्रुओं को विशेष रूप से पराजित करो.
आस्तृत मणि तुम्हारी रक्षा करे. (२)
शतं च न प्रहरन्तो निघ्नन्तो न तस्तिरे.
तस्मिन्निन्द्रः पर्यदत्त चक्षुः प्राणमथो बलमस्तृतस्त्वाभि रक्षतु.. (३)
सैकड़ों शत्रु शस्त्र आदि से प्रहार करते हुए तथा प्राणों से हीन करते हुए हिंसा न कर
सकें. इंद्र ने शत्रुओं द्वारा हिंसित न होने वाली आस्तृत मणि के मध्य चक्षु, प्राण तथा बल पूर्ण
किया. आस्तृत मणि तुम्हारी रक्षा करे. (३)
इन्द्रस्य त्वा वर्मणा परि धापयामो यो देवानामधिरोजो बभूव.
पुनस्त्वा देवाः प्र णयन्तु सर्वेऽस्तृतस्त्वाभि रक्षतु.. (४)
हे आस्तृत मणि! मैं तुम्हें इंद्र के कवच से आच्छादित करता हूं. वे इंद्र देवों के राजा हुए.

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सभी देव तुझे अपने कार्यों की सिद्धि के लिए अपनेअपने कवचों से आच्छादित करें. हे
आस्तृत मणि! सब देव तुम्हारी रक्षा करें. (४)
अस्मिन् मणावेकशंतं वीर्याणि सहस्रं प्राणा अस्मिन्नस्तृते.
व्याघ्रः शत्रूनभि तिष्ठ सर्वान् यस्त्वा पृतन्यादधरः सो अस्तवस्तृतस्त्वाभि
रक्षतु.. (५)
इंद्र के कवच से सुरक्षित होने के कारण इस आस्तृत मणि के एक सौ एक सामर्थ्य हैं
तथा हजारों प्राण अर्थात् बल हैं. तुम बाघ के समान सभी शत्रुओं पर आक्रमण कर के उन्हें
पराजित करने में समर्थ बनो. मेरा जो शत्रु तुझ मणि से युद्ध करने की इच्छा करे, वह
पराजित हो. हे आस्तृत मणि! सब देव तुम्हारी रक्षा करें. (५)
घृतादुल्लुप्तो मधुमान् पयस्वान्त्सहस्रप्राणः शतयोनिर्वयोधाः.
शंभूश्च मयोभूश्चोर्जस्वांश्च पयस्वांश्चास्तृतस्त्वाभि रक्षतु.. (६)
ऊपर के भाग में घी से लिए हुए, शहद से युक्त, दूध से संपन्न, सभी देवों से अनुगृहीत
होने के कारण हजारों शक्तियों से पूर्ण, इंद्र के कवच से सुरक्षित होने के कारण सौ बलों से
संपन्न, मणि धारक पुरुष को अन्न प्रदान करने वाले, सुख देने वाले, सुविधा प्रदान करने वाले,
अन्न के दाता तथा दूध आदि देने वाले आस्तृत नाम की इस मणि की सभी देव रक्षा करें. (६)
यथा त्वमुत्तरो ऽ सो असपत्नः सपत्नहा.
सजातानामसद वशी तथा त्वा सविता करदस्तृतस्त्वाभि रक्षतु.. (७)
हे साधक! तुम सब से श्रेष्ठ बनो. कोई तुम्हारा शत्रु न बने तथा तुम सभी शत्रुओं का
विनाश करो. तुम अपने सजातीय जनों के मध्य में दूसरों को वश में करने वाले बनो. सविता
देव मणि बांधने वाले तुम को इसी प्रकार का करें. आस्तृत मणि तुम्हारी रक्षा करे. (७)
सूक्त-४७ देवता—रात्रि
आ रात्रि पार्थिवं रजः पितुरप्रायि धामभिः.
दिवः सदांसि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः.. (१)
हे रात्रि! तुम ने अपने अंधकारों से पृथ्वीलोक तथा पितरों के लोक स्वर्ग को पूर्ण कर
दिया है. महती रात्रि द्युलोक के स्थानों को विशेष रूप ये व्याप्त करती है. नील वर्ण का
अंधकार सब को व्याप्त करता है. (१)
न यस्याः पारं ददृशे न योयुवद् विश्वमस्यां नि विशते यदेजति.
अरिष्टासस्त उर्व तमस्वति रात्रि पारमशीमहि भद्रे पारमशीमहि.. (२)
रात का पार दिखाई नहीं देता है. लोक व्यापिनी रात्रि में चराचर विश्व एकाकार ही हो
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जाता है, अलगअलग दिखाई नहीं देता है. जगत् कांपता है, तथा प्राणी इस रात्रि में इधरउधर
जाने में असमर्थ हो जाते हैं. हे अंधकार वाली रात्रि! सर्प, बाघ, चोर आदि की बाधा से रहित
हम तेरे अंतिम नाम अर्थात् प्रातःकाल को प्राप्त करें. हे कल्याणकारिणी रात्रि! हम कल्याण
को प्राप्त करें. (२)
ये ते रात्रि नृचक्षसो द्रष्टारो नवतिर्नव.
अशीतिः सन्त्यष्टा उतो ते सप्त सप्ततिः.. (३)
हे रात्रि! मनुष्यों के कर्म फल के देखने वाले तुम्हारे जो निन्यानवे गण देवता हैं, अठासी
गण देवता हैं तथा सतहत्तर गण देवता हैं, वे तुम्हारी महिमा का विस्तार करते हैं. (३)
षष्टिश्च षट् च रेवति पञ्चाशत् पञ्च सुम्नयि.
चत्वारश्चत्वारिंशच्च त्रयस्त्रिंशच्च वाजिनि.. (४)
हे धन प्रदान करने वाली रात्रि! छियासठ और पचपन जो गण देवता हैं, हे सुख देने
वाली रात्रि! चवालीस जो गण देवता हैं, हे अन्न प्रदान करने वाली रात्रि! तैंतीस जो गण देवता
हैं, वे तुम्हारी महिमा का विस्तार करते हैं. (४)
द्वौ च ते विंशतिश्च ते राज्येकादशावमाः.
तेभिर्नो अद्य पायुभिर्नु पाहि दुहितर्दिवः.. (५)
हे रात्रि! तुम्हारे जो बाईस और ग्यारह गण देवता हैं तथा इस से कम संख्या वाले जो
गण देवता हैं, हे द्युलोक की पुत्री रात्रि! इस समय उन रक्षक गण देवों के साथ हमारी रक्षा
करो. (५)
रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत मा नो दुःशंस ईशत.
मा नो अद्य गवां स्तेनो मावीनां वृक ईशत.. (६)
हे रात्रि! हमारा पालन करो, पाप कर्म करने की बात कहने वाला कोई भी हमें बाधा
पहुंचाने में समर्थ न हो. दुष्टता पूर्ण वचन बोलने वाला हमें बाधा न पहुंचाए. हे रात्रि! आज
चोर हमारी सभी गायों को चुराने में समर्थ न हो. भेड़िया हमारी भेड़ों का बलपूर्वक अपहरण
करने में समर्थ न हो. (६)
माश्वानां भद्रे तस्करो मा नृणां यातुधान्यः.
परमेभिः पथिभि स्तेनो धावतु तस्करः.
परेण दत्वती रज्जुः परेणाघायुरर्षतु.. (७)
हे भली रात्रि! चोर हमारे घोड़ों को चुराने में समर्थ न हो तथा यातुधान हमारे पुत्रों आदि
के स्वामी न बन सकें. चोर और तस्कर अति दूर मार्गों से अपने साधनों द्वारा दूर भाग जाएं.
दांतों वाली रस्सी के समान विशाल सर्प दूर भाग जाएं. दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक हम
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से दूर चले जाएं. (७)
अध रात्रि तृष्टधूममशीर्षाणमहिं कृणु.
हनू वृकस्य जम्भयास्तेन तं द्रुपदे जहि.. (८)
हे रात्रि! प्यास उत्पन्न करने वाले तथा धुआं छोड़ने वाले सर्प को तुम बिना शीश वाला
बनाओ अर्थात् मार डालो. दृढ़ दाढ़ों के कारण दूसरों का भक्षण करने वाले भेड़ियों को टूटी
हुई ठोड़ी वाला बना कर नष्ट करो. हे सर्वत्र व्याप्त रात्रि उस भेड़िए को मारो. (८)
त्वयि रात्रि वसामसि स्वपिष्यामसि जागृहि.
गोभ्यो नः शर्म यच्छाश्वेभ्यः पुरुषेभ्यः.. (९)
हे रात्रि! हम तुझ में निवास करते हैं. हम रात्रि के समय सोते हैं, पर तुम जाग्रत रहो.
तुम हमारी गायों को, घोड़ों को तथा परिवारी जनों को सुख प्रदान करो. (९)
सूक्त-४८ देवता—रात्रि
अथो यानि च यस्मा ह यानि चान्तः परीणहि.
तानि ते परि दद्मसि.. (१)
मुझ से संबंधित जो बाहरी वस्तुएं गोचर तथा खुले प्रदेश में हैं तथा जो आसपास के
घरों में विद्यमान हैं, मैं वे सभी वस्तुएं तुझे देता हूं. (१)
रात्रि मातरुषसे नः परि देहि.
उषा नो अह्वे परि ददात्वहस्तुभ्यं विभावरि.. (२)
हे माता रात्रि! हमें उषाःकाल को प्रदान करो तथा उषाःकाल हमें दिन को प्रदान करे. हे
रात्रि! दिन हमें तुम को प्रदान करें. (२)
यत् किं चेदं पतयति यत् किं चेदं सरीसृपम्.
यत् किं च पर्वतायासत्वं तस्मात् त्वं रात्रि पाहि नः.. (३)
जो पक्षी आदि आकाश में संचरण करते हैं, जो धरती पर सरकने वाले सर्प आदि हैं,
जो पर्वत संबंधी जीव—जंतु हैं, हे रात्रि उन से हमारी रक्षा करो. (३)
सा पश्चात् पाहि सा पुरः सोत्तरादधरादुत.
गोपाय नो विभावरि स्तोतारस्त इह स्मसि.. (४)
हे पूर्व उक्त लक्षणों वाली रात्रि! तुम पश्चिम दिशा में, पूर्व दिशा में, उत्तर दिशा में तथा
दक्षिण दिशा में हमारी रक्षा करो. हे रात्रि! हमारी रक्षा करो. हम इस समय तुम्हारी स्तुति
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करने वाले हों. (४)
ये रात्रिमनुतिष्ठन्ति ये च भूतेषु जाग्रति.
पशून् ये सर्वान् रक्षन्ति ते न आत्मसु जाग्रति ते नः पशुषु जाग्रति.. (५)
जो मनुष्य रात्रि के समय अर्चनपूजन आदि अनुष्ठान करते हैं तथा जो भवन संबंधी
प्राणियों के कारण जागते हैं, जो सभी पशुओं की रक्षा करते हैं, वे हमारे तथा हमारे पुत्र
आदि की रक्षा के लिए जागते हैं, वे पशुओं की रक्षा के लिए भी जागें. (५)
वेद वै रात्रि ते नाम घृताची नाम वा असि.
तां त्वां भरद्वाजो वेद सा नो वित्ते ऽ धि जाग्रति.. (६)
हे रात्रि! मैं तेरे नामों को जानता हूं. तू दीप्तिमती नाम वाली है. ऐसी तुझ रात्रि को
भरद्वाज जानते हैं. वह रात्रि हमारे धन की रक्षा के लिए जागृत रहे. (६)
सूक्त-४९ देवता—रात्रि
इषिरा योषा युवतिर्दमूना रात्री देवस्य सवितुर्भर्गस्य.
अश्वक्षभा सुहवा संभृतश्रीरा पप्रौ द्यावापृथिवी महित्वा.. (१)
सब के द्वारा प्रार्थनीय, यौवन वाली तथा श्रेष्ठ मन वाली रात्रि सभी के प्रेरक सविता
और भग देव की पत्नी है. यह अपने विषय में चक्षु आदि इंद्रियों का तिरस्कार करती है. यह
उत्तम हवन करने योग्य तथा संपूर्ण कांति वाली रात्रि अपने महत्त्व से द्यावा और पृथ्वी को
पूर्ण करती है. (१)
अति विश्वान्यरुहद् गम्भीरो वर्षिष्ठमरुहन्त श्रविष्ठाः.
उशती रात्र्यनु सा भद्राभि तिष्ठते मित्र इव स्वधाभिः.. (२)
जिस में प्रवेश करना कठिन है, ऐसी रात्रि सभी चराचर वस्तुओं को व्याप्त कर के
वर्तमान है. इस अतिशय अन्न वाली रात्रि की सब स्तुति करते हैं. यह वन, पर्वत, सागर आदि
को व्याप्त कर के स्थित है. यजमान आदि के द्वारा प्रदत्त अन्न आदि साधनों से सूर्य जिस
प्रकार अपने तेज से प्रतिक्षण विश्व को आक्रांत करते हैं, उसी प्रकार यह रात्रि भी जगत् पर
छा जाती है. (२)
वर्यै वन्दे सुभगे सुजात आजगन् रात्रि सुमना इह स्याम्.
अस्मांस्त्रायस्व नर्याणि जाता अथो यानि गव्यानि पुष्ट्या.. (३)
हे न रुकने वाले प्रभाव वाली, सभी के द्वारा स्तुति की गई, सौभाग्य वाली तथा
भलीभांति उत्पन्न रात्रि! तुम आ गई हो. तुम्हारे आने पर मैं सुंदर मन वाला बनूं. मेरा पालन
करो तथा उत्पन्न वस्तुओं को, मनुष्यों की हितकारी वस्तुओं को तथा पुष्ट करने वाली गाय
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आदि जो हितकारी वस्तुएं हैं, उन की रक्षा करो. (३)
सिंहस्य रात्र्युशती पींपस्य व्याघ्रस्य द्वीपिनो वर्च आ ददे.
अश्वस्य ब्रध्नं पूरुषस्य मायुं पुरु रूपाणि कृणुषे विभाती.. (४)
इच्छा करती हुई यह रात्रि सिंह, हाथी, गैंडा, बाघ आदि के तेजों का अपहरण करती है.
यह अश्व के वेग को तथा पुरुष के शब्द को खींच लेती है. हे रात्रि! तुम दीप्तिमती हो कर
नाना प्रकार के रूप धारण करती हो. (४)
शिवां रात्रिमनुसूर्यं च हिमस्य माता सुहवा नो अस्तु.
अस्य स्तोमस्य सुभगे नि बोध येन त्वा वन्दे विश्वासु दिक्षु.. (५)
हे रात्रि! मैं कल्याण करने वाली तेरी तथा सूर्य की वंदना करता हूं. तुषार की माता रात्रि
हमारे उत्तम आह्वान का विषय हो. हे सौभाग्यशालिनी रात्रि! तुम इस समय किए जाते हुए
हमारे स्तोत्र को जानो. इस स्तोत्र के द्वारा हम सभी दिशाओं में तेरी वंदना करते हैं. (५)
स्तोमस्य नो विभावरि रात्रि राजेव जोषसे.
आसाम सर्ववीरा भवाम सर्ववेदसो व्युच्छन्तीरनुषस:.. (६)
हे प्रकाशित होती हुई रात्रि! जिस प्रकार राजा स्तोताओं के द्वारा की जाती हुई स्तुति
को ध्यानपूर्वक सुनता है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को सावधान हो कर सुनो. अंधकार
का विनाश करती हुई एवं उषा:काल के पश्चात आती हुई रात्रि की कृपा से हम वीर पुत्रों,
पौत्रों और सेवकों वाले बनें तथा सभी प्रकार के धन से संपन्न हों. (६)
शम्या ह नाम दधिषे मम दिप्सन्ति ये धना.
रात्रीहि तानसुतपा य स्तेनो न विद्यते यत् पुनर्न विद्यते.. (७)
हे रात्रि! तुम शम्या अर्थात् शत्रु के बल को शांत करने वाला नाम धारण करती हो. जो
शत्रु मेरे धनों का अपहरण करने की इच्छा करते हैं, हे रात्रि! तुम उन शत्रुओं के प्राणों को
संतप्त करती हुई आओ. मेरा विरोधी जो दिखाई दे रहा है, वह पुनः दिखाई न दे. (७)
भद्रासि रात्रि चमसो न विष्टो विष्वङ् गोरूपं युवतिर्बिभर्षि.
चक्षुष्मती मे उशती वपूंषि प्रति त्वं दिव्या न क्षाममुक्था:.. (८)
हे रात्रि! तुम चम्मच के समान कल्याण रूपा हो. तुम सर्वत्र व्याप्त यौवन वाली गाय का
रूप धारण करती हो. हमारा पोषण करने की कामना करती हुई एवं देखने की शक्ति से
संपन्न तुम मेरे तथा मेरे पुत्र आदि के शरीरों की रक्षा करो. जिस प्रकार दिव्य पुरुष शरीर का
त्याग नहीं करते, उसी प्रकार तुम धरती को मत छोड़ो. (८)
यो अद्य स्तेन आयत्यघायुर्मर्त्यो रिपु:.
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रात्री तस्य प्रतीत्य प्र ग्रीवाः प्र शिरो हनत्.. (९)
इस समय जो चोर, हिंसा करने वाला तथा मरणधर्मा शत्रु आता है, हे सुंदर रूप वाली
रात्रि! मेरे समीप आने वाले शत्रु के समीप जा कर उस की जिह्वा और शीश को काट दो. (९)
प्र पादौ न यथायति प्र हस्तौ न यथाशिषत्.
यो मलिम्लुरुपायति स संपिष्टो अपायति.
अपायति स्वपायति शुष्के स्थाणावपायति.. (१०)
हे रात्रि! तुम मेरे शत्रु के पैरों को इस प्रकार काट दो कि वह फिर आने योग्य न रहे. तुम
उस के हाथों को इस प्रकार काट दो जिस से वह मेरा आलिंगन न कर सके. जो चोर मेरे
समीप आता है. उसे इस प्रकार पीस दो कि वह मुझ से दूर चला जाए. वह भलीभांति पूर्ण
रूप से चला जाए. वह मेरे पास से जा कर सूखे खंभे का आश्रय प्राप्त करे. (१०)
सूक्त-५० देवता—रात्रि
अध रात्रि तृष्टधूममशीर्षाणमहिं कृणु.
अक्षौ वृकस्य निर्जह्यास्तेन तं द्रुपदे जहि.. (१)
हे रात्रि! जिस सर्प की धुएं के समान सांस कष्टदायक है, उस का सिर काट दो. भेड़िए
को नेत्रहीन कर के वृक्ष के नीचे मार डालो. (१)
ये ते रात्र्यनड्वाहस्तीक्ष्णशृङ्गाः स्वाशवः.
तेभिर्नो अद्य पारयाति दुर्गाणि विश्वाहा.. (२)
हे रात्रि! तुम्हारे वाहन जो नुकीले सींगों वाले तथा अत्यधिक शीघ्र चलने वाले बैल हैं,
उन के द्वारा हमें सभी रात्रियों के सभी अनर्थों से पार कराओ. (२)
रात्रिंरात्रिमरिष्यन्तस्तरेम तन्वा वयम्.
गम्भीरमप्लवा इव न तरेयुररातयः.. (३)
सभी रात्रियों में गमन करते हुए हम शरीर से पुनः पौत्र आदि के साथ रात्रि को पार करें.
हमारे शत्रु नदी पार करने के साथ नाव आदि से हीन पुरुषों के समान रात्रि को पार न कर
पाएं अर्थात् रात्रि में ही नष्ट हो जाएं. (३)
यथा शाम्याकः प्रपतन्नपवान् नानुविद्यते.
एवा रात्रि प्र पातय यो अस्माँ अभ्यघायति.. (४)
जिस प्रकार सवां अन्न पकने पर गिरता हुआ सारहीन हो जाता है तथा बिलकुल नहीं
बचता, हे रात्रि! जो हमारे प्रति हिंसा करने की इच्छा रखता है, उसे उसी प्रकार गिरा दो. (४)
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अप स्तेनं वासो गोअजमुत तस्करम्.
अथो यो अर्वतः शिरो ऽ भिधाय निनीषति.. (५)
जो चोर हमारे वस्त्र, गायें तथा बकरियां ले जाना चाहते हैं तथा जो हमारे घोड़ों के सिरों
को रस्सी से बांध कर ले जाना चाहते हैं, उन्हें दूर भगाओ. (५)
यदद्या रात्रि सुभगे विभजन्त्ययो वसु.
यदेतदस्मात् भोजय यथेदन्यानुपायसि.. (६)
हे सौभाग्यशालिनी रात्रि! आज जो चोर स्वर्ण आदि धातुओं का अपहरण करते हैं, उस
धन को हमारे उपभोग का साधन बनाओ. इस से शत्रु द्वारा छीने गए हमारे घोड़े, हाथी भी
हमें प्राप्त हो जाएं. (६)
उषसे नः परि देहि सर्वान् रात्र्यनागसः.
उषा नो अह्ने आ भजादहस्तुभ्यं विभावरि.. (७)
हे रात्रि! हम सभी स्तुतिकर्ताओं तथा पशुओं, पुत्रों, मित्र आदि को रक्षण के लिए उषा
को प्रदान करो. हे विभावरी! उषः हम सब को दिन प्रदान करे तथा दिन पुनः तुम्हें प्राप्त करे.
(७)
सूक्त-५१ देवता—आत्मा, सविता
अयुतो ऽ हमयुतो म आत्मायुतं मे चक्षुरयुतं मे श्रोत्रमयुतो मे.
प्राणो ऽ युतो मे ऽ पानो ऽ युतो मे व्यानो ऽ युतो ऽ हं सर्वः.. (१)
कर्म का अनुष्ठान करने का इच्छुक मैं पूर्ण हूं. मेरा शरीर पूर्ण है, मेरी आत्मा पूर्ण है, मेरे
नेत्र, कान, मेरी प्राण वायु, मेरी अपान वायु तथा मेरी व्यान वायु पूर्ण है. इस प्रकार मैं सभी
दृष्टि से पूर्ण हूं. (१)
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽ श्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां प्रसूत आ रभे..
(२)
हे कर्म! मैं सब के प्रेरक सविता देव की आज्ञा से, अश्विनीकुमारों की भुजाओं से तथा
पूषा देव के हाथों से तेरा आरंभ करता हूं. (२)
सूक्त-५२ देवता—काम
कामस्तदग्रे समवर्तत मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्.
स काम कामने बृहता सयोनी रायस्पोषं यजमानाय धेहि.. (१)
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इस वर्तमान सृष्टि के पहले परमेश्वर के मन में काम भलीभांति व्याप्त हो गया. माया में
विलीन अंतःकरण में वही काम बीज बना. हे काम! सारे संसार का निर्माण करने के लिए
उत्पन्न किए गए तुम महान परमेश्वर के द्वारा समान कारण बने. हे काम! तुम यजमान को
धन की अधिकता प्रदान करो. (१)
त्वं काम सहसासि प्रतिष्ठितो विभुर्विभावा सख आ सखीयते.
त्वमुग्रः पृतनासु सासहिः सह ओजो यजमानाय धेहि.. (२)
हे काम! तुम अपने सामर्थ्य से प्रतिष्ठित हो. हे व्यापक एवं विशेष दीप्ति वाले! तुम
हमारे प्रति मित्र के समान आचरण करते हो. हे काम! तुम क्रोधित होने पर शत्रु सेनाओं को
सहन करते हो. तुम यजमान को ऐसा बल प्रदान करो जो शत्रु को पराजित करने में समर्थ
हो. (२)
दूराच्चकमानाय प्रतिपाणायाक्षये.
आस्मा अशृण्वन्नाशाः कामेनाजनयन्त्स्वः.. (३)
अति दुर्लभ फल की इच्छा करने वाले मुझ को सभी ओर से रक्षा करने के लिए तथा
अनिष्ट के निवारण के लिए सभी दिशाएं काम के सहयोग से सुख उत्पन्न करें. (३)
कामेन मा काम आगन् हृदयाद् हृदयं परि.
यदमीषामदो मनस्तदैतूप मामिह.. (४)
फल विषयक इच्छा से काम मेरे समीप आए. ब्राह्मणों का फल प्राप्त करने वाला मन
भी मुझे प्राप्त हो. (४)
यत्काम कामयमाना इदं कृण्मसि ते हविः.
तन्नः सर्वं समृध्यतामथैतस्य हविषो वीहि स्वाहा.. (५)
हे काम! जिस फल की इच्छा करते हुए हम तेरे लिए हवि प्रदान करते हैं, उस हवि का
तुम भक्षण करो. यह हवि तुम्हें भलीभांति प्राप्त हो. हम ने जो कामना की है, यह सभी प्रकार
से पूर्ण हो. (५)
सूक्त—५३ देवता—काल
कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः.
तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा.. (१)
सात किरणों अथवा रस्सियों वाला, हजार नेत्रों वाला, वृद्धावस्था रहित तथा अत्यधिक
वीर्य से युक्त कालरूपी घोड़ा रथ को खींचता है. सभी लोक उस के चक्र अर्थात् पहिए हैं.
विद्वान् पुरुष उस रथ पर सवार होते हैं. (१)
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सप्त चक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभीरमृतं न्वक्षः.
स इमा विश्वा भुवनान्यज्जत् कालः स ईयते प्रथमो नु देवः.. (२)
यह काल रूप परमात्मा क्रम से पहियों के समान सात ऋतुओं को धारण करता है. इस
संवत्सर रूप काल की सात नाभियां हैं और इस के अक्ष अर्थात् अरे नष्ट न होने वाले हैं. वह
संवत्सर रूप काल उन सात भुवनों तथा इन में रहने वाले प्राणियों को व्यक्त करता हुआ सब
से पहले उत्पन्न एवं दिव्य है. (२)
पूर्णः कुम्भो ऽ धि काल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तम्ः.
स इमा विश्वा भुवनानि प्रत्यङ् कालं तमाहुः परमे व्योमन्.. (३)
यह ब्रह्मांड रूप भरा हुआ कुंभ अर्थात् घड़ा संवत्सर रूपी काल पर रखा हुआ है. संत
अर्थात् ज्ञानी पुरुष उस काल के दिवस, रात्रि आदि अनेक रूपों को देखते हैं. यह काल रूप
परमात्मा सभी उपस्थित प्राणियों के सामने प्रकट होता है तथा उन्हें अपने में मिला लेता है.
इस काल को आकाश के समान निर्लेप कहा जाता है. (३)
स एव सं भुवनान्याभरत् स एव सं भुवनानि पर्यैत्.
पिता सन्नभवत् पुत्र एषां तस्माद् वै नान्यत् परमस्ति तेजः.. (४)
वही काल सब भुवनों को उत्पन्न करता है. वही काल सब भुवनों में व्याप्त होता है. वही
काल इन भुवनों को उत्पन्न करने वाला पिता होता हुआ पुत्र भी होता है. उस काल के
अतिरिक्त कोई भी तेज महान नहीं है. (४)
कालोऽमूं दिवमजनयत् काल इमाः पृथिवीरुत.
काले ह भूतं भव्यं चेषितं ह वि तिष्ठते.. (५)
काल रूप परमात्मा ने इस द्युलोक अर्थात स्वर्ग को जन्म दिया. काल ने उन पृथ्वियों
को उत्पन्न किया. काल में ही यह भूत, भविष्य एवं वर्तमान विश्व चेष्टा करता है. (५)
कालो भूतिमसृजत काले तपति सूर्यः.
काले ह विश्वा भूतानि काले चक्षुर्वि पश्यति.. (६)
काल ने भवनों वाले संसार को उत्पन्न किया है. काल की प्रेरणा से ही सूर्य संसार को
प्रकाशित करता है. सभी प्राणी काल में ही वर्तमान रहते हैं. चक्षु आदि इंद्रियां अपना काम
करती हैं. (६)
काले मनः काले प्राणः काले नाम समाहितम्.
कालेन सर्वा नन्दन्त्यागतेन प्रजा इमाः.. (७)
काल में मन, प्राण तथा नाम व्याप्त हैं. ये सब प्रजाएं वसंत आदि रूप काल के कारण
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प्रसन्न रहती है. (७)
काले तपः काले ज्येष्ठं काले ब्रह्म समाहितम्.
कालो ह सर्वस्येश्वरो यः पितासीत् प्रजापतेः.. (८)
काल में तप, काल में संसार का कारण हिरण्य गर्भ व्याप्त है. काल में ही अंगों सहित
वेद व्याप्त था. काल ही सब का स्वामी है. काल ही प्रजाओं का ईश्वर और पिता था. (८)
तेनेषितं तेन जातं तदु तस्मिन् प्रतिष्ठितम्.
कालो ह बह्म भूत्वा बिभर्ति परमेष्ठिनम्.. (९)
काल ने इस संसार को बनाने की इच्छा की. काल से उत्पन्न जगत् काल में ही प्रतिष्ठित
हुआ. काल ही बल बन कर परमेष्ठी ब्रह्म को धारण करता है. (९)
कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम्.
स्वयम्भूः कश्यपः कालात् तपः कालादजायत.. (१०)
काल ने प्रजाओं को उत्पन्न किया. काल ने सृष्टि के आरंभ में प्रजापति को उत्पन्न
किया. काल से ही स्वयं भू ब्रह्मा और कश्यप ऋषि उत्पन्न हुए. तेज भी काल से ही उत्पन्न
हुआ. (१०)
सूक्त—५४ देवता—काल
कालादापः समभवत् कालाद् ब्रह्म तपो दिशः.
कालेनोदेति सूर्यः काले नि विशते पुनः.. (१)
काल से जलों की उत्पत्ति हुई. काल से ब्रह्म अर्थात् यज्ञ आदि कर्म, चांद्रायण आदि तप
तथा पूर्व आदि दिशाएं उत्पन्न हुईं. काल के कारण ही सूर्य उदय होता है तथा काल में ही
अस्त हो जाता है. (१)
कालेन वातः पवते कालेन पृथिवी मही. द्यौर्मही काल आहिता.. (२)
काल के कारण वायु चलती है. काल के कारण पृथ्वी महिमामयी है. द्युलोक काल से
महिमामय है तथा काल के आश्रित है. (२)
कालो ह भूतं भव्यं च पुत्रो अजनयत् पुरा.
कालादृचः समभवन् यजुः कालादजायत.. (३)
पहले काल से भूत, भविष्य, पुत्र तथा ऋचाएं उत्पन्न हुईं. काल से ही यजुर्वेद का जन्म
हुआ. (३)
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