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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 898 of 1063

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Page 898

से दूर चले जाएं. (७)
अध रात्रि तृष्टधूममशीर्षाणमहिं कृणु.
हनू वृकस्य जम्भयास्तेन तं द्रुपदे जहि.. (८)
हे रात्रि! प्यास उत्पन्न करने वाले तथा धुआं छोड़ने वाले सर्प को तुम बिना शीश वाला
बनाओ अर्थात् मार डालो. दृढ़ दाढ़ों के कारण दूसरों का भक्षण करने वाले भेड़ियों को टूटी
हुई ठोड़ी वाला बना कर नष्ट करो. हे सर्वत्र व्याप्त रात्रि उस भेड़िए को मारो. (८)
त्वयि रात्रि वसामसि स्वपिष्यामसि जागृहि.
गोभ्यो नः शर्म यच्छाश्वेभ्यः पुरुषेभ्यः.. (९)
हे रात्रि! हम तुझ में निवास करते हैं. हम रात्रि के समय सोते हैं, पर तुम जाग्रत रहो.
तुम हमारी गायों को, घोड़ों को तथा परिवारी जनों को सुख प्रदान करो. (९)
सूक्त-४८ देवता—रात्रि
अथो यानि च यस्मा ह यानि चान्तः परीणहि.
तानि ते परि दद्मसि.. (१)
मुझ से संबंधित जो बाहरी वस्तुएं गोचर तथा खुले प्रदेश में हैं तथा जो आसपास के
घरों में विद्यमान हैं, मैं वे सभी वस्तुएं तुझे देता हूं. (१)
रात्रि मातरुषसे नः परि देहि.
उषा नो अह्वे परि ददात्वहस्तुभ्यं विभावरि.. (२)
हे माता रात्रि! हमें उषाःकाल को प्रदान करो तथा उषाःकाल हमें दिन को प्रदान करे. हे
रात्रि! दिन हमें तुम को प्रदान करें. (२)
यत् किं चेदं पतयति यत् किं चेदं सरीसृपम्.
यत् किं च पर्वतायासत्वं तस्मात् त्वं रात्रि पाहि नः.. (३)
जो पक्षी आदि आकाश में संचरण करते हैं, जो धरती पर सरकने वाले सर्प आदि हैं,
जो पर्वत संबंधी जीव—जंतु हैं, हे रात्रि उन से हमारी रक्षा करो. (३)
सा पश्चात् पाहि सा पुरः सोत्तरादधरादुत.
गोपाय नो विभावरि स्तोतारस्त इह स्मसि.. (४)
हे पूर्व उक्त लक्षणों वाली रात्रि! तुम पश्चिम दिशा में, पूर्व दिशा में, उत्तर दिशा में तथा
दक्षिण दिशा में हमारी रक्षा करो. हे रात्रि! हमारी रक्षा करो. हम इस समय तुम्हारी स्तुति
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