अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइस वर्तमान सृष्टि के पहले परमेश्वर के मन में काम भलीभांति व्याप्त हो गया. माया में
विलीन अंतःकरण में वही काम बीज बना. हे काम! सारे संसार का निर्माण करने के लिए
उत्पन्न किए गए तुम महान परमेश्वर के द्वारा समान कारण बने. हे काम! तुम यजमान को
धन की अधिकता प्रदान करो. (१)
त्वं काम सहसासि प्रतिष्ठितो विभुर्विभावा सख आ सखीयते.
त्वमुग्रः पृतनासु सासहिः सह ओजो यजमानाय धेहि.. (२)
हे काम! तुम अपने सामर्थ्य से प्रतिष्ठित हो. हे व्यापक एवं विशेष दीप्ति वाले! तुम
हमारे प्रति मित्र के समान आचरण करते हो. हे काम! तुम क्रोधित होने पर शत्रु सेनाओं को
सहन करते हो. तुम यजमान को ऐसा बल प्रदान करो जो शत्रु को पराजित करने में समर्थ
हो. (२)
दूराच्चकमानाय प्रतिपाणायाक्षये.
आस्मा अशृण्वन्नाशाः कामेनाजनयन्त्स्वः.. (३)
अति दुर्लभ फल की इच्छा करने वाले मुझ को सभी ओर से रक्षा करने के लिए तथा
अनिष्ट के निवारण के लिए सभी दिशाएं काम के सहयोग से सुख उत्पन्न करें. (३)
कामेन मा काम आगन् हृदयाद् हृदयं परि.
यदमीषामदो मनस्तदैतूप मामिह.. (४)
फल विषयक इच्छा से काम मेरे समीप आए. ब्राह्मणों का फल प्राप्त करने वाला मन
भी मुझे प्राप्त हो. (४)
यत्काम कामयमाना इदं कृण्मसि ते हविः.
तन्नः सर्वं समृध्यतामथैतस्य हविषो वीहि स्वाहा.. (५)
हे काम! जिस फल की इच्छा करते हुए हम तेरे लिए हवि प्रदान करते हैं, उस हवि का
तुम भक्षण करो. यह हवि तुम्हें भलीभांति प्राप्त हो. हम ने जो कामना की है, यह सभी प्रकार
से पूर्ण हो. (५)
सूक्त—५३ देवता—काल
कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः.
तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा.. (१)
सात किरणों अथवा रस्सियों वाला, हजार नेत्रों वाला, वृद्धावस्था रहित तथा अत्यधिक
वीर्य से युक्त कालरूपी घोड़ा रथ को खींचता है. सभी लोक उस के चक्र अर्थात् पहिए हैं.
विद्वान् पुरुष उस रथ पर सवार होते हैं. (१)
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