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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 888 of 1063

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Page 888

यं त्वा वेद पूर्व इक्ष्वाको यं वा त्वा कुष्ठ काम्यः.
यं वा वसो यमात्स्यस्तेनासि विश्वभेषजः.. (९)
हे कुष्ठ नाम की ओषधि! तुम को इक्ष्वाकु वंश के प्राचीन राजा जानते थे तथा तुझ को
कामदेव का पुत्र जान गया था. तुम्हें वसु नाम का देवता जानता था. इस कारण तुम सभी
रोगों की ओषधि हो, तुम्हें सभी रोगों के विनाश के रूप में जाना जाता है. (९)
शीर्षलोकं तृतीयकं सदन्दिर्यश्च हायनः.
तक्मानं विश्वधायीर्याधराञ्चं परा सुव.. (१०)
तृतीय लोक अर्थात् स्वर्ग को तुम्हारा शीश कहा जाता है. वह सभी रोगों का खंडन
करने वाला हो. हे सभी प्रकार की शक्तियों से युक्त कुष्ठ! तुम सभी रोगों को तथा नीचे होने
वाले पतन को हम से दूर करो. (१०)
सूक्त-४० देवता—विश्वे देव, बृहस्पति
यन्मे छिद्रं मनसो यच्च वाचः सरस्वती मन्युमन्तं जगाम.
विश्वैस्तद् देवैः सह संविदानः सं दधातु बृहस्पतिः.. (१)
जो मेरे मन का छिद्र अर्थात् दोष है तथा वाणी का दोष है, उस के कारण सरस्वती क्रोध
से युक्त मुझ को छोड़ कर चली गई है. सभी देवों के साथ एकमत हुए बृहस्पति मेरे इन दोषों
को दूर करें. (१)
मा न आपो मेधां मा ब्रह्म प्र मथिष्टन.
सुष्यदा यूयं स्यन्धध्वमुपहूतो ऽ हं सुमेधा वर्चस्वी.. (२)
हे जल देवता! तुम मेरी बुद्धि को भ्रष्ट मत करो. ब्रह्मा मेरे द्वारा अध्ययन किए गए वेद
को भ्रष्ट न करें. मेरा जो जो कर्म सूख रहा है अर्थात् नष्ट हो रहा है, उसे लक्ष्य बना कर तुम
सभी ओर से उसे गीला बनाओ अर्थात् सुरक्षित करो. आप सभी की अनुमति से मैं उत्तम
बुद्धि वाला बनूं तथा ब्रह्म के तेज से युक्त हो जाऊं. (२)
मा नो मेधां मा नो दीक्षां मा नो हिंसिष्टं यत् तपः.
शिवा नः शं सन्त्वायुषे शिवा भवन्तु मातरः.. (३)
हे द्यावा पृथ्‍वी! तुम मेरी बुद्धि को तथा दीक्षा को नष्ट मत करो. जल देवता मेरे लिए
सुखकारी हों तथा मेरी आयु वृद्धि के लिए कहें. माता के समान हितकारी जल मेरे लिए
कल्याणकारी हों. (३)
या नः पीपरदश्विना ज्योतिष्मती तमस्तिरः. तामस्मे रासतामिषम्.. (४)
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