अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
इन्द्रो मा तत्र नयतु बलमिन्द्रो दधातु मे. इन्द्राय स्वाहा.. (६)
सगुण ब्रह्म का स्वरूप जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं, इंद्र देव
मुझे वहां ले जाएं. इंद्र देव मुझ में बल धारण करें. यह आहुति इंद्र को भलीभांति प्राप्त हो.
(६)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
आपो मा तत्र नयन्त्वमृतं मोप तिष्ठतु. अद्भ्यः स्वाहा.. (७)
सगुण ब्रह्म का स्वरूप जानने वाले अपनी दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं,
जल देवता मुझे वहां ले जाएं. जल देवता मुझ में अमृत धारण करें. यह आहुति जल देवता
को भलीभांति प्राप्त हो. (७)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
ब्रह्मा मा तत्र नयतु ब्रह्मा ब्रह्म दधातु मे. ब्रह्मणे स्वाहा.. (८)
सगुण ब्रह्म का स्वरूप जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां पहुंचते हैं,
ब्रह्मा मुझे वहां ले जाएं. ब्रह्मा मुझ में ब्रह्म की उपासना करें. यह आहुति ब्रह्मा को भलीभांति
प्राप्त हो. (८)
सूक्त-४४ देवता—आंजन, वरुण
आयुषो ऽ सि प्रतरणं विप्रं भेषजमुच्यसे.
तदाञ्जन त्वं शंताते शमापो अभयं कृतम्.. (१)
हे आंजन! तुम सौ वर्ष की आयु देने वाले हो. तुम प्रसन्न करने वाली ओषधि कहे जाते
हो, इसलिए हे आंजन! तुम सुख रूप कहे जाते हो. हे जल के लक्षण आंजन! तुम और जल
देवता मुझे सुख प्रदान करें तथा अभय प्रदान करें. (१)
यो हरिमा जायान्यो ऽ ङ्गभेदो विसल्पकः.
सर्वं ते यक्ष्ममङ्गेभ्यो बहिर्निर्हन्त्वाञ्जनम्.. (२)
हल्दी के समान पीले रंग का जो पांडु रोग कठिनता से चिकित्सा करने योग्य है, वह
अंगों को भिन्न करता है और अनेक प्रकार के घाव कर देता है. यह आंजन के अंगों से सभी
रोगों को बाहर निकाल कर नष्ट करे. (२)
आञ्जनं पृथिव्यां जातं भद्रं पुरुषजीवनम्.
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