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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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हे अश्विनीकुमारो! सभी व्यवहारों को बाधा पहुंचाने वाला अंधकार हमारे पास आए.
प्रकाश वाली रात उस अंधकार का तिरस्कार करे. हमें इस प्रकार की प्रकाश युक्त रात्रि प्रदान
करो. (४)
सूक्त-४१ देवता—तप
भद्रमिच्छन्त ऋषयः स्वर्विदस्तपो दीक्षामुपनिषेदुरग्रे.
ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उपसंनमन्तु.. (१)
सृष्टि के आदि में सब के कल्याण की इच्छा करते हुए ऋषियों ने स्वर्ग प्राप्त करते हुए
तप की दीक्षा प्राप्त की. उस से राष्ट्र, बल और ओज उत्पन्न हुए. देव उस राष्ट्र आदि को इस
पुरुष के लिए प्रदान करें. (१)
सूक्त-४२ देवता—ब्रह्म
ब्रह्म होता ब्रह्म यज्ञा ब्रह्मणा स्वरवो मिताः.
अध्वर्युर्ब्रह्मणो जातो ब्रह्मणो ऽ न्तर्हितं हिवः.. (१)
जगत् की उत्पत्ति का कारण ब्रह्म होता है, ब्रह्म ही यज्ञ है. ब्रह्म ने उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित आदि स्वरों का गमन निश्चित किया है. ब्रह्म से ही अध्वर्यु उत्पन्न हुए. यज्ञ का साधन
हवि ब्रह्म में ही स्थित है. (१)
ब्रह्म सुचो घृतवतीर्ब्रह्मणा वेदिरुद्धिता.
ब्रह्म यज्ञस्य तत्त्वं च ऋत्विजो ये हविष्कृतः. शमिताय स्वाहा.. (२)
घृत से पूर्ण तथा होम का साधन सुवा भी ब्रह्म है. ब्रह्म ने ही यज्ञवेदी को खोदा है. ब्रह्म
यज्ञ का तत्त्व है. हवि तैयार करने वाले ऋत्विज् भी ब्रह्म ही हैं. अभेद को प्राप्त ब्रह्म के लिए
आहुति उत्तम हो. (२)
अंहोमुचे प्र भरे मनीषामा सुत्राव्णे सुमतिमावृणानः.
इममिन्द्र प्रति हव्यं गृभाय सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः.. (३)
पापों से छुटकारा दिलाने वाले तथा भलीभांति रक्षा करने वाले इंद्र के लिए मैं उत्तम
स्तुति बोलता हुआ उपासना पूर्ण करता हूं. हे इंद्र! तुम मेरा हव्य स्वीकार करो. तुम्हारी कृपा
से यजमान की इच्छाएं पूर्ण हों. (३)
अंहोमुचं वृषभं यज्ञियानां विराजन्तं प्रथममध्वराणाम्.
अपां नपातमश्विना हुवे धिय इन्द्रियेण त इन्द्रियं दत्तमोजः.. (४)
यज्ञ के योग्य देवों में श्रेष्ठ, पाप से मुक्त कराने वाले तथा यज्ञों में प्रमुख रूप में